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बी.ए. तृतीय वर्ष (GE-1)

1857 क्रांति का भारतीय साहित्य पर प्रभाव

1857 क्रांति का भारतीय साहित्य पर प्रभाव
या
स्वाधीनता संग्राम का भारतीय साहित्य पर प्रभाव

समाज तथा राष्ट्र के संदर्भ में कुछ तत्व ऐसे होते हैं जो मनुष्य के जीवन मूल्यों से जुड़े होते हैं।  व्यक्ति की स्वाधीनता भी ऐसा ही एक तत्व है। किसी भी राष्ट्र अथवा व्यक्ति को सदा के लिए पराधीनता की बेडि़यो में नहीं बांधा जा सकता। पराधीनता की इन बेड़ियों को काटने के लिए स्वाधीनता की प्रबल भावना के कारण जन आंदोलन का जन्म लेना भी स्वाभाविक ही था। भारतवर्ष में 19वीं शताब्दी के आरंभ से ही विभिन्न आंदोलन विकसित हुए जिनका एकमात्र उद्देश्य सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक विषमताओं तथा ब्रिटिश पराधीनता से व्यक्ति को मुक्त करवाना था। देश के प्रत्येक नागरिक ने उस आंदोलन में अपना सर्वस्व अर्पण किया था।  देश का साहित्यकार भी इस संघर्ष में किसी से पीछे न था। 

 भारत में स्वाधीनता संग्राम का इतिहास उतना ही पुराना है जितना हमारी परतंत्रता का इतिहास।  यह देश 1000 वर्ष से भी अधिक समय तक गुलाम रहा,  परंतु इसका सांस्कृतिक स्वरूप अक्षुण्ण बना रहा। भारत की राष्ट्रीयता का आधार राजनीतिक एकता न होकर सांस्कृतिक एकता रही है।  मोहम्मद इकबाल के शब्दों में

“कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौरे जमां हमारा”

व्यापारी बनकर आए अंग्रेजों ने यहां की राजनीतिक अव्यवस्था का लाभ उठाया तथा शासक की गद्दी पर बैठ गए। भारतीय औद्योगिक विकास को रोकना, यहां के व्यापार और लघु उद्योगों को नष्ट करना अंग्रेजी रणनीति का हिस्सा था।  पहली बार इस देश के इतिहास में अंग्रेज के रूप में एक ऐसा शासक आया था, जो राजस्व लेता था, व्यापारिक कर उगाहता था, मनमाना व्यापार करके धन कमाता था परंतु जनहित हेतु एक पैसा भी खर्च नहीं करता था। 

 19वीं शताब्दी तक आते-आते अंग्रेजों का शोषणकारी भयावह रूप सामने आया।  अंग्रेजों का विरोध तो 1760 में ही  प्रारंभ हो गया था जब मीर कासिम के नेतृत्व में मुर्शिदाबाद के बुनकरों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के अत्याचारों के विरुद्ध विद्रोह किया था।  मैसूर में टीपू सुल्तान और कर्नाटक में कितुर की राजकुमारी ने विद्रोह किया। 1773 में हजारों किसान अंग्रेजों के विरोध में खड़े हो गए।  बहावी विद्रोह तथा मराठा प्रतिरोध भी इसी श्रेणी में हुआ। परंतु सन् 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में जगह-जगह हो रहे इस जनाक्रोश को पूर्ण अभिव्यक्ति प्राप्त हुई।  29 मार्च 1857 को मेरठ छावनी में मंगल पांडे का विद्रोह, अवध की बेगम जीनत महल,  झांसी की रानी लक्ष्मीबाई,  नाना साहेब,  तात्या टोपे जैसे योद्धाओं के नेतृत्व में आम जनता ने अंग्रेजों के विरुद्ध आवाज उठाई। 10 मई, 1857 की प्रथम स्वाधीनता क्रांति का परिणाम यह हुआ कि भारत का शासन सीधे रानी विक्टोरिया ने संभाल लिया और सुधारों की प्रक्रिया प्रारंभ हुई।  सन् 1885 में कांग्रेस की स्थापना बंग भंग के दौरान विरोध, गांधीवाद, क्रांतिकारी आंदोलन, नवजागरण आदि धारणाएं प्रथम स्वाधीनता संग्राम के प्रभावस्वरूप जन्मी। वहीं तमाम साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से भारत के स्वर्णिम अतीत में आस्था जगाकर राष्ट्रप्रेम की भावना को बढ़ाया।  

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम भारत के ही नहीं अपितु विश्व के इतिहास पटल पर अंकित एक महत्वपूर्ण एवं अभूतपूर्व घटना है। संसार के किसी भी देश में इससे पहले अहिंसा की धारणा को बल नहीं मिला था। यह धारणा भारतीय संस्कृति की उपज थी। तद्युगीन महापुरुषों के नेतृत्व में स्वतंत्रता संग्राम देश का जीवन दर्शन बन गया था। अतः साहित्य सर्जन में उन आंदोलनों का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक ही था। स्वतंत्रता संग्राम के प्रभाव में एक विशाल साहित्य का निर्माण हुआ और उसे राष्ट्रीय आंदोलन का साहित्य नाम दिया गया। कार्ल मार्क्स ने अपने लेखों में यह विचार व्यक्त किया है कि भारत के सैनिक विद्रोह मात्र सैनिक विग्रह नहीं है वह एक बड़े परिवर्तनकारी राष्ट्रीय विद्रोह का संकेत देते हैं।  देशभर में रचित साहित्य का सार भी यही निकलता है कि यह प्रथम मुक्ति संग्राम ब्रिटिश साम्राज्यवाद द्वारा प्रेरित संप्रदायवाद, धर्मवाद तथा जातिवाद की सबसे करारी हार थी। की क्रांति के फलस्वरूप देश में आधुनिक भारतीय समाज का उदय हुआ।  19वीं शताब्दी के प्रथम स्वाधीनता आंदोलन का रूप गठन अधिक प्रभाव।  स्वाधीनता संग्राम के  भारतीय साहित्य पर प्रभाव को  निम्नलिखित बिंदुओं द्वारा स्पष्ट किया जा रहा है-

  1. भारतीय भाषाएं और स्वाधीनता संग्रामः
    लगभग सभी भारतीय भाषाओं में आधुनिक युग का सूत्रपात सन् 1857 की क्रांति के आसपास ही होता है। तमिल में रामलिंगम स्वामिगल सुब्रह्मण्यम भारती ने, तेलुगु में वीरेशालिंगम, कन्नड़ में श्री कण्ठैया, शंकर भट्ट और मलयालम में केरल वर्मा, वेनमणि आदि गुजराती में नर्मद आदि, बांग्ला में ईश्वर गुप्त, मधुसूदन दत्त आदि ने भारत की सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक क्रांति को अपने काव्य में वाणी दी है। इन सब ने देशभक्ति से परिपूर्ण गीतों की रचना की है। असमिया और उड़िया में भी आधुनिक साहित्य की गतिविधि प्रायः समान रही है।

  2. हिंदी भाषा एवं साहित्य तथा स्वाधीनता संग्रामः
    हिंदी भाषा में स्वाधीनता संग्राम में और स्वाधीनता संग्राम में हिंदी भाषा के विकास एवं संवर्धन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। स्वतंत्रता संग्राम में हिंदी भाषा ने ही देश को जोड़ने में अहम योगदान दिया। हिन्दी के प्रचार-प्रसार एवं उसे राजभाषा की मंजिल तक पहुंचाने में प्रमुख राष्ट्रीय नेताओं के योगदान का योगदान अत्यंत सराहनीय है। हिंदी भाषा और साहित्य में विदेशी शासन ब्रिटिश साम्राज्य को संप्रदायवाद धर्म वाद जातिवाद भड़काने का दोषी स्वीकार करते हुए साहित्य में उसकी नीतियों की भर्त्सना हुई। सामंत प्रायः अंग्रेजों के समर्थक थे, इसलिए उनके विरोध का स्वर आधुनिक भारतीय साहित्य विशेषकर हिंदी में सर्वत्र मिलता है। हिंदी भाषा तो क्रांतिकारियों एवं राष्ट्र भक्तों की हृदय उद्गार भाषा बन गई।

    • भारतेंदु हरिश्चंद्र ने जिस आधुनिक युग प्रारंभ किया उसकी जड़े स्वाधीनता आंदोलन में ही थी। भारतेंदु और भारतेंदु मंडल के साहित्यकारों ने युग चेतना को पद्य और गद्य दोनों में अभिव्यक्ति दी। इसके साथ इन साहित्यकारों ने स्वाधीनता संग्राम और सेनानियों की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए भारत के स्वर्णिम अतीत में लोगों की आस्था जगाने का प्रयास किया। वहीं दूसरी ओर उन्होंने अंग्रेजों की शोषणकारी नीतियों का खुलकर विरोध किया। भारतीय इंदु हरिश्चंद्र अंग्रेजों की शोषण नीति के बारे में लिखते हैं-
      भीतर भीतर सब रस चुसै, हंसी हंसी के तन मन धन मुसै।
      जाहिर बातिन में अति तेज, क्यों सखि साजन, न सखि अंगरेज।

    • द्विवेदी युग के साहित्यकारों ने भी स्वाधीनता संग्राम में अपनी लेखनी द्वारा महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महावीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिलीशरण गुप्त, श्रीधर पाठक, माखनलाल चतुर्वेदी आदि ने भारतीय स्वाधीनता हेतु अपनी तलवार रूपी कलम को पैना किया। इन कवियों ने आम जनता में राष्ट्रप्रेम की भावना जगाने तथा उन्हें स्वाधीनता आंदोलन का हिस्सा बनने हेतु प्रेरित किया। ‘भारत-भारती’ के रचयिता मैथिलीशरण गुप्त राष्ट्रकवि कहलाए, तो वही माखनलाल चतुर्वेदी ने ‘पुष्प की अभिलाषा’ लिखकर जनमानस में सेनानियों के प्रति सम्मान के भाव जागृत किए। सुभद्रा कुमारी चौहान ने ‘झांसी की रानी’’ आदि कविताओं के माध्यम से स्वाधीनता आंदोलन को तेज करने में अद्वितीय भूमिका अदा की। मैथिलीशरण गुप्त ने भारत वासियों को स्वर्णिम अतीत की याद दिलाते हुए वर्तमान और भविष्य को सुधारने की बात की-
      हम क्या थे, क्या है, और क्या होंगे अभी
      आओ विचारे मिलकर यह समस्याएं सभी।

    • छायावादी काव्यधारा के तीनों बड़े कवियों जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के काव्य में स्वाधीनता संग्राम का समर्थन हुआ है। प्रसाद के साहित्य में भारत के स्वर्णिम अतीत का वरदान है ‘हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती’ जैसा गीत लिखने वाले प्रसाद ने ‘पेशोला की प्रतिध्वनि’ जैसी राष्ट्रभक्ति की कविताएं लिखी है। पंत प्रकृति के सुकुमार कवि होते हुए भी राष्ट्रीय नेताओं के जीवन को भलीभांति चित्रित करते हैं और ‘ग्राम्या’ जैसे काव्य में भारत माता की दुर्दशा का चित्र अंकित करते हैं। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की ‘तुलसीदास ‘ भारत के सांस्कृतिक सूर्य के अस्त होने के चित्र से प्रारंभ होती है तो ‘राम की शक्ति पूजा ‘ संघर्ष के लिए शक्ति का आह्वान है। ‘जागो फिर एक बार’ कविता में भारत की संपूर्ण सांस्कृतिक विरासत का गान करते हुए निराला शिवाजी, राणा प्रताप, गुरु गोविंद सिंह जैसे राष्ट्र नायकों का यशोगान करते हैं।

    • आजादी आंदोलन के दौरान वैचारिक आजादी में साहित्‍य की भूमिका निर्विवाद रही है। देश की स्वतंत्रता के लिए 1857 से लेकर 1947 तक क्रांतिकारियों व आंदोलनकारियों के साथ ही लेखकों, कवियों और पत्रकारों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी गौरव गाथा हमें प्रेरणा देती है कि हम स्वतंत्रता के मूल्य को बनाये रखने के लिए कृत संकल्पित रहें। प्रेमचंद की ‘रंगभूमि, कर्मभूमि’ उपन्यास, भारतेंदु हरिश्चंद्र का ‘भारत-दूर्दशा’ नाटक, जयशंकर प्रसाद का ‘चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त’ नाटक देशप्रेम की भावना जगाने के लिए रचे गए। वीर सावरकर की ‘1857 का प्रथम स्वाधीनता संग्राम’ हो या पंडित नेहरू की ‘भारत एक खोज’ या फिर लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की ‘गीता रहस्य’ या शरद बाबू का उपन्यास ‘पथ के दावेदार’, आदि पढ़कर व्यक्ति ने घर-परिवार की चिंता छोड़ देश की खातिर अपना सर्वस्व अर्पण करने के लिए स्वतंत्रता के महासमर में कूदते देर नहीं लगाई। अतः स्पष्ट है कि उन दिनों साहित्यकारों ने जिम्मेदारी के साथ अपनी भूमिका निभाई।

  3. स्वाधीनता संग्राम एवं साहित्यिक पत्रकारिताः
    स्वाधीनता संग्राम को गति देने का कार्य साहित्यिक पत्रिकाओं द्वारा बढ़-चढ़कर किया जाने लगा। स्वाधीनता आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने में पत्रकारिता ने अनूठी भूमिका निभाई। ‘मराठा’, ‘केसरी’, ‘सुधारक’ जैसे समाचार पत्रों के माध्यम से बाल गंगाधर तिलक ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को आजादी की लड़ाई का हिस्सा बनाया तो वहीं महात्मा गांधी द्वारा संपादित पत्र पत्रिकाओं ने आम आदमी को संघर्ष में उतारने का काम किया। इसी तरह ‘भारतीय समाजशास्त्री’, ‘ग़दर’, ‘बंगदूत’, ‘प्रजा मित्र’, ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’, ‘प्रताप विशाल’, ‘भारत’, ‘कर्नाटक वृत’, ‘कर्मवीर’, ‘चंद्रोदय’, ‘विजय’, ‘आज समाज’ आदि पत्रिकाओं ने जन आंदोलन को तीव्र गति प्रदान की। भारतेंदु युग से ही साहित्य और पत्रकारिता का अटूट गठबंधन दिखाई पड़ने लगा। साहित्यकार अपने सामाजिक दायित्व का निर्वाह करने के लिए साहित्य रचना के साथ-साथ समसामयिक विषयों पर समाज का मार्ग प्रशस्त करते दिखाई पड़ते हैं। राष्ट्रप्रेम एवं समाज सुधार का साहित्य एवं क्रांतिकारी लेख इस पत्रकारिता का अहम हिस्सा बने। इस पत्रकारिता ने समाज में नई चेतना जगाने और स्वाधीनता संग्राम को आगे ले जाने हेतु महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

  4. राष्ट्रीय एकता का साहित्यः
    राष्ट्रप्रेम एवं समाज सुधार का भावपूर्ण चित्रण साहित्य का अहम हिस्सा रहा। स्वाधीनता संग्राम के बाद भारतीयों के लिए देश की परिकल्पना एक ऐसी चीज बन गई जिसमें क्षुद्रता के लिए कोई स्थान नहीं रहा। छोटे बड़े, ऊंच-नीच के सारे अंतर यहां तिरोहित हो गए और देश के लिए सभी एक मंच पर उतर आए। कवियों एवं साहित्य लेखको ने इस राष्ट्रीय एकता की भावना को बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान देते हुए इस भावना को स्वर्ण अक्षरों में अपने साहित्य में स्थान दिया। एक कवि ने लिखा है, “एक देह के विविध अंग हम, दुखै-पुखै साथ संग हम।” प्रारंभ में साहित्यकारों ने समसामयिक राजनीति की अपेक्षा अतीत के गौरव का गान कर राष्ट्रप्रेम की भावना को सुदृढ़ किया। इसके बाद स्वाधीनता संग्राम को आगे बढ़ाने हेतु छापेखाने का विकास हुआ तथा असंख्य पत्र-पत्रिकाओं ने राष्ट्रीयता की भावना को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इससे स्पष्ट होता है कि संपूर्ण भारतीय समाज स्वाधीनता के लिए एकजुट होकर प्रयासरत हो गया था।

  5. विभाजन की त्रासदी पर आधारित साहित्यः
    भारतीय साहित्य विशेष रूप से हिंदी साहित्य में विभाजन की त्रासदी का यथार्थ चित्रण हुआ है। विशेष रूप से हिंदी उपन्यास तो विभाजन की त्रासदी एवं विभीषिकाओं के साक्षी बनकर सामने आए हैं। विभाजन की इस विभीषिका ने संवेदनशील साहित्यकारों को झकझोर कर रख दिया। ‘गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान’, ‘झूठा सच’, ‘देशद्रोही’, ‘तमस’, ‘आधा गांव’, ‘छाको की वापसी’, ‘कितने पाकिस्तान’ आदि उपन्यासों में संपूर्ण स्वाधीनता संग्राम का दर्द अंकित है। इसके अतिरिक्त अन्य भारतीय भाषाओं में भी आजादी की लड़ाई का विश्लेषण देखने को मिलता है। इस साहित्य में प्रमुख राजनीतिक दलों विचारधाराओं आंदोलनों तथा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाओं की गूंज सुनाई पड़ती है। विभाजन ने केवल उपमहाद्वीप के टुकड़े नहीं किए, बल्कि जिस समावेशी संस्कृति को पाने में सदियां लगी थीं, उसके टुकड़े-टुकड़े करते हुए लोगों के दिलों में भी खाई बना दी। इन बचे हुए लोगों के लिए विभाजन कोई घटना नहीं है बल्कि एक संघर्ष है, जो अब तक जारी है। इसी संघर्ष को साहित्यकारों ने यथार्थ एवं मार्मिक अभिव्यक्ति दी है।

  6. स्वाधीनता संग्राम से जुड़ी साहित्यिक विचारधाराएंः
    स्वाधीनता संग्राम से जुड़ी विचारधाराओं में राष्ट्रवाद, गांधीवाद, उदारवाद, गदर आंदोलन, ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज, थियोसॉफिकल सोसाईटी आदि प्रमुख थी जिनसे स्वाधीनता से जुड़ी धारणाओं को बल मिला। अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों का बेबाक चित्रण, भारत की बिगड़ती दशा पर चिंतन, स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने पर बल, स्वतंत्रता सेनानियों एवं राजनेताओं के चरित्र का गुणगान आदि को साहित्यकारों ने अपनी लेखनी का विषय बनाया। इन विचारधाराओं के चलते अंग्रेजी पढ़-लिखा मध्य वर्ग भी समाज में बढ़ते असंतोष और आंदोलनों में भाग लेने लगा, क्योंकि वह भी बेकारी और अंग्रेजी भेदभाव का शिकार था। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को आजादी का लड़ाई का हिस्सा बनाया गया और कर्म का संदेश देकर लिलक जैसे राजनेताओं ने आजादी की लड़ाई को नई दिशा दी।

  7. लोक साहित्य और स्वाधीनता संग्रामः
    स्वाधीनता संग्राम के उपरांत लोक साहित्य में भी भारतीय स्वाधीनता मुक्ति एवं राष्ट्रीय चेतना का स्वर गूंज उठा। मराठी भाषा की लावणियाँ, गुजराती भवाई, बांग्ला तमिल कन्नड़ के लोकगीत, राजस्थानी लोकगीत एवं लोक कथाएं आदि सभी में देशप्रेम, जन जागरण, स्वदेशाभिमान, चुनौतियां, स्वतंत्रता प्राप्ति और उससे उपजी आशाओं के शब्द सुनाई देने लगे। संपूर्ण लोक साहित्य में दासता से उत्पन्न हीन भावना का विरोध, अपने अधिकारों को पाने हेतु संघर्ष तथा स्वाधीनता प्राप्ति की तीव्र ललक केंद्रीय बिंदु बन गए।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि स्वाधीनता आंदोलन ने साहित्य को जन चेतना की आधार भूमि प्रदान की।  लगभग सभी भाषाओं के साहित्यकारों ने युग चेतना को गद्य और पद्य के माध्यम से आवाज दी। 1857 की क्रांति की असफलता के पश्चात समाज में जो सन्नाटा व्याप्त हुआ, उस सन्नाटे को तोड़ते हुए साहित्यकारों ने जन भावनाओं को माध्यम बनाया।  प्रत्येक व्यक्ति को मुक्ति संघर्ष एवं अधिकार चेतना की दृष्टि से जागृत करने का कार्य साहित्यकार अपनी लेखनी के माध्यम से करने लगा।  सामाजिक, राजनीतिक, जातीय, धार्मिक, सांस्कृतिक सभी प्रकार के पहलुओं को साहित्य द्वारा अभिव्यक्ति दी जाने लगी।  स्वाधीनता संग्राम के प्रभाव में रचे गए साहित्य में उस समय की सामाजिक व्यवस्था, राजनीतिक दलों तथा विचारधाराओं का स्वर स्पष्ट रूप से सुनाई देता है।  वास्तव में भारत माता विविध भाषाओं में एक ही बात बोलती है, जिसका जीता जागता प्रमाण हमारा भारतीय साहित्य है।

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