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बी.ए. प्रथम वर्ष (DSC-1)

आदिकाल में रचित धार्मिक साहित्य

हिंदी साहित्य के आदिकाल में रचित सिद्ध, नाथ और जैन साहित्य को धार्मिक साहित्य के अंतर्गत रखा गया है।  इस साहित्य का विकास जिन परिस्थितियों में हुआ  वह परिस्थितियां भारतीय समाज में रूढ़िवादी विचार परंपरा के विरुद्ध लोक जीवन के विद्रोह को स्पष्ट करती है तथा नए विचारों का समर्थन करती है। साहित्य में जन भाषा की प्रतिष्ठा के लिए भी साहित्यकारों ने व्यापक संघर्ष किया।  सिद्ध, नाथ और जैन साधक घोषित रूप में रचनाकार नहीं थे वह तो सामाजिक विषमता के खिलाफ आवाज उठा रहे थे।  इसी प्रक्रिया को वे अपने अनुभवों में व्यक्त कर रहे थे और यही अनुभव उनका साहित्य बन गया जिसका प्रभाव आगे आने वाले साहित्यकारों पर पड़ा।  आदिकालीन साहित्य का एक बड़ा भाग धर्माश्रित साहित्य है, जिसे आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने सांप्रदायिक साहित्य कहकर साहित्य के क्षेत्र में स्थान नहीं दिया।  परंतु इस साहित्य के महत्व को सामाजिक एवं साहित्यिक दृष्टिकोण से ठुकराया नहीं जा सकता।  यह साहित्य उस युग की सामाजिक तथा सांस्कृतिक परिस्थितियों के साथ-साथ धार्मिक विश्वासों का वर्णन करता है।  इस साहित्य का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-

1- सिद्ध साहित्यः

महात्मा बुद्ध  ने जिस बौद्ध धर्म की स्थापना की थी उसने उनके काल में अत्यधिक उन्नति की।  उनके बाद यह धर्म दो शाखाओं में बंट गया-  महायान और हीनयान। उत्तरी भारत में वैष्णव धर्म व भक्ति के प्रचार प्रसार से बौद्ध धर्म को अत्यधिक हानि हुई। अंततः बौद्ध धर्म की महायान शाखा पुनः दो भागों में विभाजित हो गई वज्रयान तथा सहजयान।  सिद्धों को वज्रयान संप्रदाय से संबंधित माना जाता है।  यह बौद्ध सिद्ध जादू टोना, मंत्र-तंत्र आदि के द्वारा सिद्धि प्राप्त करना चाहते थे, इसीलिए इन्हें सिद्ध कहा गया तथा श्री पर्वत इन शब्दों का मुख्य केंद्र था।  छठी शताब्दी से लेकर ग्यारहवीं शताब्दी तक यह सिद्ध साहित्य रचना करते रहे और समाज पर इनका पर्याप्त प्रभाव पड़ा।  विद्वानों ने सिद्धों की संख्या 84 मानी है।  सिद्ध अपने नाम के अंत में पा शब्द का प्रयोग करते थे जो आदर सूचक प्रत्यय है। इनमें लुईपा, डोम्भिपा, सरहपा, कण्हपा, जालंधरपा, कपालपा, गौरक्षपा, चौरंगीपा, मीनपा आदि  प्रमुख है।   राहुल सांकृत्यायन ने सरहपा को हिंदी का प्रथम कवि माना है। ये कवि प्रायः देश के पूर्वी अंचल में रहते थे तथा नालंदा और विक्रमशिला के विश्वविद्यालय इनकी साधना  के केंद्र थे।

इन सिद्ध कवियों ने अपने विचारों, मतों आदि को जनसाधारण तक पहुंचाने के लिए उस समय की जन सामान्य भाषा का प्रयोग किया तथा उसी भाषा में अपने संप्रदाय के सिद्धांतों और विचारधाराओं को लिपिबद्ध कराया।  सिद्ध की भाषा को संधा भाषा या सांध्य भाषा (साधनात्मक अनुभूतियों का संकेत करने वाली प्रतीक भाषा) का नाम दिया गया।  सिद्ध साहित्य की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार है –

  1. सिद्धों ने उस समय के समाज में प्रचलित पाखंड, आडंबर, रूढ़ि और बाह्याचार का डटकर विरोध किया।

  2. निराशावाद के भीतर से आशावाद का संदेश देना सिद्धों की कविता का गुण था।

  3. सिद्धों की साहित्यिक रचनाओं का सामाजिक महत्व उल्लेखनीय है। डॉ. बच्चन सिंह के शब्दों में, “जहां तक सिद्ध जाति-पाति की प्रथा, ऊंच-नीच का भेदभाव, शास्त्र विजड़ित तत्त्ववाद और बाह्याडंबर का विरोध करते हैं वहां तक इनकी भूमिका निःसंदेह प्रगतिशील है।”

  4. सिद्धों की रचनाओं में रहस्यवाद की प्रवृत्ति भी मिलती है। वे आत्मा और परमात्मा के मिलन के लिए अनेक प्रतीकों का प्रयोग करते हैं।

  5. सिद्धों ने जहां पाखंड, मूर्ति पूजा, जाति- पाति, वेद, बाह्यचार आदि का विरोध किया, वहीं वे मनुष्य को अंतर्मुखी साधना अपनाने का भी आह्वान करते हैं। अंतर्मुखी साधना के लिए वे शारीरिक शुद्धि होना आवश्यक मानते हैं।

  6. मत्स्य, मांस, मदिरा, मैथुन तथा मुद्रा को सिद्ध अपनी साधना का अंग मानने के कारण भोग द्वारा मुक्ति को आदर्श मानते हैं। इसे वे पाँच मकारों की साधना कहते हैं।

  7. सिद्धों ने गुरु की महत्ता को स्वीकार किया है। उनके अनुसार सहज सुख अथवा महासुख (निर्वाण) की प्राप्ति के लिए गुरु का होना अनिवार्य है। सद्गुरु के बिना साधक अपने भोग साधना में सफल नहीं हो सकता।

  8. सिद्धों की रचनाओं में प्रमुखतः शांत एवं श्रृंगार रस का प्रयोग हुआ है।

  9. दार्शनिक दृष्टि से सिद्ध कवियों ने बौद्धों के शून्यवाद एवं शंकराचार्य के अद्वैतवाद को मिलाकर एक नवीन दार्शनिक मत स्थापित किया। उन्होंने शरीर में ही सारी सृष्टि को स्वीकार किया है।

  10. शैली की दृष्टि से सिद्ध साहित्य में दोहा, पद तथा चर्या गीतों का प्रचलन था।

सिद्ध साहित्य की प्रमुख रचनाएँः

सिद्ध साहित्य को सर्वप्रथम प्रकाश में लाने का कार्य सन् 1916 ई. में हरप्रसाद शास्त्री ने ‘बौद्धगान औ दोहा’ शीर्षक से कविताएँ प्रकाशित करके किया। इसके बाद राहुल सांस्कृत्यायन ने ‘हिंदी काव्यधारा’ के नाम से सिद्धों की रचनाओं को प्रकाशित करवाया। इन रचनाकारों एवं उनकी रचनाओं का परिचय इस प्रकार है-

सिद्ध कविरचना का नाम
सरहपा1. दोहाकोश
2. चर्यागीत कोश
शबरपा1. चर्यापद
2. शुन्यतादुष्टि
लुईपा1. अभिसमयविभंग
2. लुईपादगीतिका
डोम्भिपा1. डोम्बिगीतिका
2. योगचर्या
3. अक्षरादि
कण्हपा1. कण्हपाद गीतिका
2. दोहाकोश
3. योगरत्नमाला

2-  नाथ साहित्यः

सिद्ध साहित्य की भोगवादी प्रवृत्ति की प्रतिक्रिया के रूप में  जिस संप्रदाय का  उदय हुआ उस संप्रदाय को नाथ संप्रदाय का नाम दिया गया। ईसा की आठवीं शताब्दी में वज्रयानी शाखा तथा शैव मत के मिश्रण से ही नाथ संप्रदाय का जन्म हुआ। डॉ. रामकुमार वर्मा ने नाथ पंथ के चरम उत्कर्ष का समय 12 वीं शताब्दी से 14 वीं शताब्दी के अंत तक माना है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने नाथपन्थ या नाथ सम्प्रदाय को ‘नाथ मत’, ‘नाथ मार्ग’, ‘योग मार्ग’, ‘योग संप्रदाय’, ‘अवधूत मत’ एवं ‘अवधूत संप्रदाय‘ के नाम से पुकारा है।  नाथ पंथ के  योगियों को कनफटे योगी भी कहा जाता है।  यह लोग कानों में भारी भारी कुंडल पहनते हैं।  पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, राजस्थान तथा गुजरात में इन योगियों का विशेष प्रभाव रहा है। नाथ कवियों ने सिद्धों की तरह भोग मार्ग नहीं अपनाया बल्कि हठयोग तथा सदाचार का मार्ग अपनाया।  नाथों ने धार्मिक कर्मकांडों से लोगों को मुक्त करवाकर सदाचार की ओर प्रवृत्त किया। शैव मत में  भगवान शिव के लिए नाथ शब्द का प्रयोग हुआ है।  परंतु आदिकाल में नाथ शब्द का प्रयोग उस धार्मिक संप्रदाय के लिए हुआ जिसका विकास बौद्ध धर्म से हुआ। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने तो स्वीकार किया है कि आदिनाथ स्वयं शिव ही है।  इससे यह अर्थ निकलता है कि नाथ संप्रदाय के लोग शैव मत से प्रभावित थे और उनके उपास्य देवता शिव हैं।

चौरासी सिद्धों के समान नौ नाथ भी प्रसिद्ध है।  नवनाथों में मत्स्येंद्रनाथ,  जालंधर नाथ,  गोरखनाथ,  चौरंगीनाथ, कनेरी नाथ,  चरपट नाथ,   भर्तृहरिनाथ,  कंथड़ी नाथ और गहनीनाथ  प्रसिद्ध हैं। नाथों की रचनाओं का संपादन डॉ. पीतांबर दत्त बड़थ्वाल के प्रयत्नों से 1942 ईस्वी में हुआ।  गोरखनाथ नाथ संप्रदाय के सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं प्रमुख कवि माने जाते हैं। गोरखनाथ के ग्रंथों की संख्या लगभग 40 मानी गई है  जिनमें  अवधूत गीता,  गोरक्ष गीता,  गोरक्ष शास्त्र,  ज्ञान प्रकाश शतक,  नाड़ी ज्ञान,  योग चिंतामणि,  गोरख वाणी,  गोरख सार,  हठयोग, सिद्धांत पद्धती  हठसंहिता आदि प्रमुख हैं।  नाथ साहित्य की विशेषताएं इस प्रकार है-

  1. नाथ पंथियों ने ईश्वर प्राप्ति के लिए पतंजलि के हठयोग की साधना को अपनाया। हठयोग के पारिभाषिक शब्द जैसे सुरति, निरति, इड़ा, पिंगला, सूर्य तथा चंद्र आदि को इन्होंने अपने साहित्य में स्थान दिया।
  2. नाथपंथी भी शून्यवाद में विश्वास रखते हैं तथा ईश्वर को शून्य अर्थात परम तत्व, निरंजन और परम शिव मानते हैं। नाथ योगी इस शून्यसाधना को प्रज्ञा, उपाय, वज्र तथा सहज मार्ग द्वारा पूरा करता है।
  3. नाथ पंथियों ने सहज दशा को महादशा कहा है, जहां पहुंचकर जीव अर्थात मनुष्य और शून्य अर्थात् परमात्मा एक हो जाते हैं।
  4. नाथ योगियों ने रूढ़िवाद और बाहरी आडंबर का विरोध किया है तथा मन की पवित्रता पर बल दिया है। नाथपंथी व्रत, मूर्ति पूजा, उपवास आदि का खंडन करते हैं तथा निर्गुण और निराकार ईश्वर की आराधना करते हैं।
  5. नाथ योगियों ने ज्ञान प्राप्ति के लिए गुरुकृपा को अत्यंत आवश्यक माना है। इनके अनुसार गुरु वह है जो स्वयं प्रकाश है अर्थात यदि गुरु को स्वयं ज्ञान नहीं होगा तो वह शिष्य का क्या मार्गदर्शन करेगा। सच्चा गुरु ही तारणहार होता है।
  6. नाथ साहित्य में मद्य तथा मांस सेवन का बहिष्कार किया गया है। इनके अनुसार मांस, मदिरा का सेवन करने से मानव में काम, क्रोध, लोभ, मोह, इर्ष्या जैसी तामसिक वृत्तियाँ उत्पन्न होती है जिसके कारण वह वास्तविक ज्ञान की प्राप्ति नहीं कर पाता।
  7. नाथ साहित्य में सदाचार और नैतिकता पर बल दिया गया है। नाथ पंथियों के अनुसार योगी को सहज एवं सरल जीवन पद्धति अपनानी चाहिए तथा काम, क्रोध, लोभ और मोह को छोड़कर चित्त को सुदृढ़ करना चाहिए।
  8. नाथों ने अपने साहित्य में सांसारिकता से दूर रहकर कठोर ब्रह्मचर्य, वाणी का संयम, ज्ञान में विश्वास तथा मानसिक शुद्धता जैसी विशेषताओं पर बल दिया।
  9. नाथपंथियों ने नारी को माया कहकर उसकी उपेक्षा की है। उनके अनुसार नारी योग साधना में बाधा का काम करती है।
  10. नाथ साहित्य की भाषा पुरानी पश्चिमी हिंदी है जो ब्रज-मिश्रित सधुक्कड़ी भाषा से मिलती जुलती है। दोहा छंद को नाथों ने विशेष महत्व दिया।
  11. नाथ साहित्य की सबसे बड़ी देन यह है कि इनकी समस्त विशेषताओं का प्रभाव भक्ति काल की निर्गुण काव्यधारा पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। भाव एवं शैली दोनों ही दृष्टियों से नाथ साहित्य ने निर्गुण साहित्य को प्रभावित किया है। कबीर साधना और भावना दोनों स्तर पर नाथ पंथ को अपनाते हैं। नाथ पंथ ने एक तरह से निर्गुण पंथ के लिए एक मार्ग तैयार किया।

 3- जैन साहित्यः

ईसा की आठवीं शताब्दी से लेकर तेरहवीं शताब्दी तक जो अपभ्रंश साहित्य उपलब्ध होता है उसमें जैन मुनियों द्वारा रचित साहित्य भी शामिल है। जैन मुनियों ने भारत के पश्चिमी क्षेत्र में अपने धर्म का प्रचार प्रसार करते हुए साहित्य का निर्माण किया।  इस साहित्य में अपभ्रंश भाषा का प्रयोग हुआ है अतः इसे जैन साहित्य के साथ-साथ अपभ्रंश साहित्य के नाम से जाना जाता है। इसके अतिरिक्त इस साहित्य को आदिकालीन रास साहित्य के अंतर्गत रखा जाता है। आदिकाल में जितने भी प्रकार के साहित्य मिलते हैं उनमें लगभग सभी प्रकार के साहित्य की प्रामाणिकता पर प्रश्नचिह्न लगा हुआ है परंतु जैन साहित्य के संबंध में ऐसा नहीं है। इसकी लगभग सभी रचनाएं प्रामाणिक मानी गई है।  जैन साहित्य में आदिकाल की भाषा और सामाजिक गति का महत्वपूर्ण तथ्य छिपा हुआ है। जैन मुनियोंने अपभ्रंश भाषा में प्रचुर मात्रा में रचनाएँ लिखी है, जो धार्मिक है। वैसे तो जैन उत्तर भारत में जहां तहाँ फैले रहे। किंतु आठवीं से 13 वी शताब्दी तक काठियावाड गुजरात में इनकी प्रधानता रही है। वहां के चालुक्य राष्ट्रकूट और सोलंकी राजाओं पर इनका पर्याप्त प्रभाव रहा।

महावीर स्वामी का जैन धर्म हिंदू धर्म के अधिक समीप है। जैनों के यहां भी परमात्मा तो है पर वह सृष्टि का नियामक न होकर चित्त और आनंद का स्रोत है। उनका संसार से कोई संबंध नहीं प्रत्येक मनुष्य अपनी साधना और पुरुष से परमात्मा बन सकता है। इन्होंने जीवन में अहिंसा, त्याग, करुणा, दया का महत्वपूर्ण स्थान बताया है। जैन साहित्य में तीन प्रकार की रचनाएं मिलती हैं-  प्रथम प्रकार की रचनाएं वे हैं जो पौराणिक काव्य के अंतर्गत आती हैं,  दूसरी श्रेणी में मुक्तक रचनाओं को रखा गया है जिसमें रास, फाग, चर्चरी आदि काव्यों का विवेचन किया गया है,  तीसरी प्रकार की रचनाओं में हेमचंद्र और मेरुतुंग आदि कवियों की रचनाएँ अर्थात व्याकरण और छंद शास्त्र आदि को लिया जा सकता है।  जैन साहित्य की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार है-

  1. जैन साहित्य को धार्मिक साहित्य कहा गया क्योंकि इसमें जैन धर्म के सिद्धांतों और नियमों का प्रतिपादन किया गया है। इस साहित्य में जैन तीर्थंकरों की जीवनीयों का वर्णन है, साथ ही जैन धर्म में शिक्षा-दीक्षा लेने वाले श्रावकों के जीवन चरित्र भी वर्णित किए गए हैं।
  2. जैन धर्म के साहित्यकारों ने भी बाहरी आडंबर ओ तथा धार्मिक रूढ़ियों का खंडन करते हुए उस समय के समाज की विसंगतियों को दूर करने का प्रयास किया है। उन्होंने केवल चारित्रिक गुणों और मन की शुद्धता को महत्व देते हुए अपने धर्म का प्रचार प्रसार किया।
  3. जैन साहित्य में प्रकृति चित्रण एवं पर्यावरण संरक्षण की भावना प्रमुख रूप से उद्धृत हुई है।
  4. जैन कवि साधना का लक्ष्य आत्मानुभूति को मानते हैं। जब तक आत्मा का घर स्वच्छ है तब तक ही उसमें ईश्वर रमण करता है। जिसका मन शुद्ध है वही निर्वाण को पा सकता है दूसरा कोई नहीं।
  5. जैन साहित्य में श्रृंगार शांत और करुण रसों का सुंदर वर्णन हुआ है। साथ ही इसमें प्रेम को विशेष महत्व दिया गया है। इन कवियों ने प्रेम के 5 रूपों का वर्णन किया है विवाह के लिए प्रेम, विवाह के बाद का प्रेम, सामाजिक प्रेम रोमांटिक प्रेम तथा विषम प्रेम।
  6. जैन कवियों ने पौराणिक साहित्य लिखने के लिए राम और कृष्ण को अपना आराध्य बनाया और ‘चरिउ’ अर्थात चरित्र महाकाव्य लिखकर हिंदी के आने वाले कवियों के लिए मार्ग प्रशस्त किया।
  7. जैन कवियों ने साहित्य में महाकाव्य, खंडकाव्य, मुक्तक काव्य, गीति काव्य धार्मिक रूपक साहित्य तथा कथा साहित्य जैसी विविधताएँ मिलती है।
  8. जैन कवियों ने काव्य में धोखा तथा चौपाई शैली को अपनाया। 25 चौपाइयों के बाद एक दोहा लिखने की शैली उनके द्वारा ही आरंभ की गई जिसका प्रभाव तुलसीदास के रामचरितमानस पर देखा जा सकता है।
  9. जैन साहित्य पर भी रहस्यवाद का प्रभाव देखा जा सकता है। यह कवि मानव शरीर को मंदिर की संज्ञा देते हैं।
  10. जैन रचनाकारों ने अपभ्रंश में व्याकरण ग्रंथ का निर्माण भी किया जिसमें आचार्य हेमचंद्र का शब्दानुशासन सर्व प्रसिद्ध है। इस ग्रंथ में संस्कृत और प्राकृत भाषाओं का भी उदाहरण देखने को मिलता है। यह ग्रंथ एक तरह से संस्कृत प्राकृत और अपभ्रंश का मिलाजुला रूप है।

जैन साहित्य के प्रमुख कवि एवं उनकी रचनाओं का परिचय इस प्रकार है-

  1. स्वयम्भू (8वीं सदी) : पउम चरिउ (रामकाव्य) ,रिट्ठणेमि चरिउ, स्वयम्भू छंद। पउम चरिउ (रामकाव्य) के कारण स्वयंभू को अपभ्रंश का वाल्मीकि कहा जाता है।
  2. पुष्पदंत (10वीं सदी) : महापुराण, णायकुमार चरिउ, जसहर चरिउ, कोश ग्रंथ। महापुराण में इन्होंने कृष्णलीला का वर्णन किया है, इसलिए अपभ्रंश का वेदव्यास कहा जाता है।
  3. धनपाल (10वीं सदी) : भविष्यतकहा धनपाल जैन काव्यधारा के सबसे प्राचीन कवि हैं।
  4. देवसेन : श्रावकाचार (933 ई., डॉ. नगेन्द्र के अनुसार हिन्दी का पहला काव्यग्रंथ, सावधम्म दोहा), लघुनयचक्र, दरेशनसार
  5. शालिभद्र सूरि : भरतेश्वर बाहुबलीरास (1184 ई., मुनि जिन विजय के अनुसार जैन साहित्य की रास परम्परा का प्रथम ग्रंथ)
  6. सोमप्रभ सूरि : कुमारपाल प्रतिबोध (1195 ई., चम्पूकाव्य)
  7. आसगु : चन्दनबालारास (1200 ई., खंडकाव्य, करुण रस की रचना)
  8. जिनधर्म सूरि : स्थूलीभद्ररास (1209 ई.)
  9. जिनदत्त सूरि : उपदेश रसायन रास
  10. हेमचंद्र सूरि (1085 ई.-1172 ई.) : कुमारपाल चरित, हेमचंद्रशब्दानुशासन, देशी नाममाला, छन्दानुशासन।
  11. मुनि राम सिंह (11वीं शती) : पाहुड़ दोहा
  12. जोइन्दु (छठी शती) : परमात्म प्रकाश (मुक्तक काव्य), योगसार
  13. मेरुतुंग : प्रबंध चिंतामणि (1304 ई.)
  14. माधवदास चारण : राम रासो
  15. श्रीधर : रणमल छंद
  16. रोडा कवि : राउलवेल (10वीं शती)

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि जैन साहित्य का हिंदी साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान है।  हिंदी  भाषा और साहित्य को भली-भांति समझने के लिए जैन ग्रंथों का अध्ययन उपयोगी है।  इस साहित्य ने हिंदी के आदि काल,, भक्ति काल तथा रीति काल को किसी ना किसी तरह से प्रभावित अवश्य किया है।

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