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बी.ए. प्रथम वर्ष (DSC-1)

आदिकालीन हिंदी साहित्य की विशेषताएँ

हिंदी साहित्य के इतिहास में संवत् 1050 से संवत् 1375 के समय में रचित  साहित्य को आदिकालीन साहित्य के नाम से जाना जाता है। इस युग में तीन प्रकार के साहित्य की रचना हुई। सर्वप्रथम धार्मिक साहित्य है जिसके अंतर्गत सिद्ध, नाथ एवं जैन मुनियों द्वारा रचित साहित्य को रखा गया है, दूसरे स्थान पर वीरगाथात्मक या रासो साहित्य को रखा जाता है तथा तीसरे स्थान पर लोकाश्रित साहित्य है जिसमें अब्दुल रहमान द्वारा रचित ‘संदेश रासक’, भक्ति एवं श्रृंगार रस से पूर्ण मैथिल कोकिल विद्यापति का साहित्य तथा अमीर खुसरो द्वारा रचित लोकरंजक साहित्य को रखा गया है।

हिंदी साहित्य के आरंभिक काल को आदिकाल कहने से उस व्यापक पृष्ठभूमि का बोध होता है जिस पर आगे का साहित्य खड़ा है। भाषा की दृष्टि से हम इस काल के साहित्य में हिंदी के आदि रूप का बोध प्राप्त कर सकते हैं, तो भाव की दृष्टि से इसमें भक्ति काल से लेकर आधुनिक काल तक की सभी प्रमुख प्रवृत्तियों के आदिम बीज खोज सकते हैं। जहां तक रचना शैलियों का प्रश्न है उनके भी वह सभी रूप जो आगे आने वाले काव्य में प्रयुक्त हुए अपने आदि रूप में मिल जाते हैं। इस काल की आध्यात्मिक, शृंगारिक तथा वीरता की प्रवृत्तियों का विकसित रूप बाद के साहित्य में स्वतः मिलता चलता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, “आदिकाल की इस दीर्घ परंपरा के  भीतर रचना की किसी विशेष प्रवृत्ति का निश्चय नहीं होता है। धर्म, नीति, श्रृंगार, वीर सब प्रकार की रचनाएं इस युग में मिलती है।” आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार, “ दसवीं से चौदहवीं शताब्दी तक के समय में लोक भाषा में लिखित जो साहित्य उपलब्ध हुआ है उसमें परिनिष्ठित अपभ्रंश से कुछ आगे बढ़ी हुई भाषा का रूप दिखाई देता है।  10 वीं शताब्दी की भाषा के गद्य में  तत्सम शब्दों का व्यवहार बढ़ने लगा था परंतु पद्य की भाषा में तद्भव शब्दों का ही एकछत्र राज्य था। चौदहवीं शताब्दी  तक के साहित्य में  इसी प्रवृत्ति की प्रधानता मिलती है।… इसी समय से हिंदी भाषा का आदि काल माना जा सकता है।”

संक्षेप में कहा जाए तो आदिकाल में साहित्य की श्रृंगार, भक्ति, वीर तथा ऐतिहासिक, अलौकिक, धार्मिक एवं सामाजिक आदि कई प्रवृतियां एक साथ मिलती है।  इन सभी प्रवृत्तियों के निर्माण विकास तथा परिवर्तन-संवर्धन में बहुत सी स्थितियों-परिस्थितियों ने तरह-तरह से अपना योगदान दिया है।  आदिकालीन साहित्य की विशेषताओं को निम्नलिखित बिंदुओं द्वारा स्पष्ट किया जा रहा है-

1. दरबारी साहित्यः

आदिकालीन साहित्य रचने वाले कवि प्रायः दरबारी कवि थे। अपने सुख के लिए नहीं बल्कि अपने स्वामी के सुख के लिए काव्य की रचना की है।  प्रायः तत्कालीन सभी राजपूत राजाओं के दरबारों में आश्रित चारण या भाट रहते थे जो अवसर आने पर अपने राजाओं की प्रशंसा व उनके युद्ध कौशल का चित्रण करते थे। अतः आदिकालीन साहित्य को दरबारी साहित्य भी कहा जा सकता है।

2. ऐतिहासिकता का अभावः

इस युग में ऐतिहासिक व्यक्तियों के आधार पर चरित काव्य लिखने का चलन हो गया था। जैसे – पृथ्वीराज रासो, परमाल रासो, कीर्तिलता आदि । यद्यपि इनमें प्रामाणिकता का अभाव है। इस काल के कवियों ने अपने आश्रयदाताओं का अपनी कल्पना से अतिशयोक्ति पूर्ण वर्णन किया है। जिसमे न ऐतिहासिक तथ्य है न सत्यता। इन कवियों के चरित्रनायक ऐतिहासिक तो है लेकिन कवियों द्वारा दिये गये घटनाओं के क्रम, विभिन्न नामावली, संवत तथा तिथियां संधिग्ध है। जिसमें ऐतिहासिकता का अभाव स्पष्ट रुप से दिखाई देता है। अतः इनमें इतिहास की अपेक्षा कल्पना अधिक मिलती है।

3. आश्रयदाताओं की प्रशंसा :

आदिकालीन साहित्य के चारण कवि राजाश्रित कवि थे।अपने आश्रयदाताओं का यशोगान करने से इन्हें मान तथा धन की प्राप्ति होती थी। इसलिए इस काल के कवियों ने आश्रयदाताओं का काल्पनिक तथा अतिशयोक्ति पूर्ण वर्णन किया है। इतना ही नहीं इन कवियों ने अपने आश्रयदाताओं को देवी-देवताओं से भी श्रेष्ठ बताया है। इससे यही स्पष्ट होता है कि अपनी जीविका तथा स्वार्थ हेतु अपने आश्रयदाताओं की मिथ्या प्रशंसा की है। अत: इन कवियों ने आश्रयदाता की धर्मवीरता, शौर्य, यश ,ऐश्वर्य आदि का बढा़-चढा़कर वर्णन किया है।

4. वीर रस की प्रधानताः

यह सर्वमान्य है कि इस काल में वीर रस प्रधान रचनाएं अधिक हुई है। इसलिए इस काल को वीरगाथा काल कहा गया। लेखक राजा के आश्रित थे,अतः लेखकों को न चाहते हुए भी राजा की वीरता अथवा उसकी महानता और उसके भुजबल का बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन करना पड़ता था। जिससे राजा प्रसन्न होकर रचनाकारों को प्रोत्साहन देता था जिससे उनकी जीविका चलती थी। सभी रासो ग्रंथ वीर रसात्मक ग्रंथ है। वीर रस के प्रधानों का कारण यह है कि उस समय युद्ध के बादल चारों ओर मंडरा रहे थे अर्थात विदेशी आक्रमण निरंतर हुआ करते थे और साम्राज्य के विस्तार के लिए राजा एक दूसरे के प्रति निरंतर युद्ध किया करते थे। देश छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित था। राजा एक दूसरे पर आक्रमण किया करते थे उससे राज्य विस्तार व उनकी सुंदर कन्या व सभी रानियां छीनना चाहते थे। पृथ्वीराज रासो  , बीसलदेव रासो आदि ग्रंथों में युद्ध का मूल कारण रुपवती नारियों को माना गया है।आदिकाल के कुछ ही वीर काव्य में साहित्यिक सौंदर्य मिलता है। अधिकतर में केवल वर्णन की प्रधानता है। हमीर रासो मैं राजा हम्मीर के युद्धों का वर्णन मिलता है। परमाल रासो में राजा परमाल के युद्धों का वर्णन मिलता है।  पृथ्वीराज रासो में राजा पृथ्वीराज के युद्धों का वर्णन मिलता है।

5. युद्धों का सजीव वर्णनः

वीरगाथा काव्य में वीर रस के साथ-साथ कवियों ने युद्ध कौशल की प्रस्तुति अनेक रूपों में की है।आदिकाल के कवि दरबारी कवियों का प्रमुख उद्देश्य अपने आश्रय दाता व राजा की शूरवीरता तथा पराक्रम को दर्शाना रहा है। युद्धों का चित्रण इस काल में मुख्य विषय रहा, वह वर्णन सुंदर सजीव एवं यथार्थ है। इसका कारण यह है कि आश्रयदाताओं के साथ कवि भी तलवार लेकर रणभूमि में उतरते थे। अत: कवियों ने युद्धों को अपनी आँखें से देखा था। इसलिए इन कवियों ने सैन्यबल, युद्ध सामग्री, योद्धाओं की आशा-निराशा, उत्साह तथा विभिन्न मनोदशाओं का वास्तविक वर्णन किया है। युद्ध प्रसंगों में कवियों ने कल्पना के फूल बरसाये है। आदिकाल में युद्धों का सजीव वर्णन जितना मिलता है उतना और किसी काल में नहीं मिलता। डॉ. श्यामसुंदर दास के अनुसार, इस काल के कृतियों का युद्ध वर्णन इतना मार्मिक तथा सजीव हुआ है , कि उनके सामने पीछे के कवियों का अनुप्रात  गर्भित  किंतु निर्जीव रचनाएं नकल सी जान पड़ती है।”

6. लोकाश्रित साहित्यः

आदिकाल में लोकाश्रित काव्यधारा के अंतर्गत कवियों ने श्रृंगारिक एवं लोकरंजक साहित्य भी लिखा है। इन कवियों की काव्यप्रेरणा के स्त्रोत साधारण जन थे। ऐसे कवियों में संदेश रासक के रचयिता अब्दुल रहमान, विद्यापति पदावली के रचयिता विद्यापति तथा अनेक पहेलियों, दो सुखनों एवं मुकरियों के रचयिता अमीर खुसरो का नाम प्रसिद्ध है।

7. उच्च कोटि का धार्मिक साहित्यः

आदिकालीन साहित्य का एक बड़ा भाग धर्माश्रित साहित्य है। सिद्ध, नाथ एवं जैन मुनियों द्वारा रचित साहित्य इस युग की विशिष्ट उपलब्धि है। सिद्ध साहित्य मूलतः बौद्ध धर्म की ब्रजयान शाखा से संबंधित है जिसमें सामाजिक कुरीतियों, पाखंड़ों आदि पर प्रहार किया तथा तत्कालीन जनभाषा को अपनी भावाभिव्यकित का माध्यम बनाया। नाथ मुनियों ने जनमानस में अपनी विशेष छवि कायम की तथा धर्म को विकृत करने वाली परंपरागत रूढ़ियों, संस्कारों, बाह्य आडंबरों तथा पाखंडों पर कठोर आघात किया।पतंजलि के हठयोग को इन्होंने साधना और साहित्य का आदार बनाया। परवर्ती भक्तिकालीन निर्गुण साहित्य पर इनका व्यापक प्रभाव पड़ा। जैन मुनियों द्वारा रचित साहित्य उच्च कोटि का धार्मिक साहित्य है, जिसमें मानव हृदय को स्पर्श करने वाली सहज अनुभूतियाँ अभिव्यक्त है। इन कवियों ने जनभाषा में पौराणिक चरित काव्य लिखे तो व्याकरण शास्त्र का निर्माण भी किया।

8. डिंगल तथा पिंगल भाषा का प्रयोग :

आदिकालीन साहित्य में डिंगल भाषा  (राज्यस्थानी मिश्रित अपभ्रंश भाषा) का वीर रचनाओं में प्रयोग हुआ है। इस काल के रासो ग्रंथ पृथ्वीराज रासो, परमाल रासो,बीसलदेव रासो, खुमान रासो आदि मेें डिंगल भाषा का प्रयोग अधिक मात्रा में पाया जाता है।वीर रस के कठोर भावों को व्यक्त करने के लिए डिंगल भाषा का उपयोग होता था। इसे उँचे स्वर मेें पढ़ना पडता था। कोमल भावों की अभिव्यक्ति के लिए पिंगल भाषा (ब्रज मिश्रित अपभ्रंश भाषा) का प्रयोग होता था। इस मेें कोमल शब्दों का प्रयोग होता था।

9. विविध छंदों, अलंकार एवं काव्य रूपः

इस काल के साहित्य में दोहा, गाथा,तोमर,तोटक,रोला ,उल्लाला, साटक,कुण्डलिया,आर्या आदि विविध छंदों का प्रयोग किया गया है।छदों का विविधमुखी प्रयोग तथा कलात्मकता इस युग के साहित्य मेंपरिलक्षित होती है।इसके साथ-साथ इन कवियों ने चौपाई तथा आल्हा छंद का भी प्रयोग किया है। इस साहित्य में अतिशयोक्ति तथा उत्प्रेक्षा अलंकारों की प्रधानता रही है। अतः इस साहित्य में अतिशयोक्ति,उत्प्रेक्षा, यमक, उपमा, रुपक, वक्रोक्ति तथा अनुप्रास आदि अलंकारों का उपयोग अधिक मात्रा में पाया जाता है।आदिकालीन साहित्य में काव्यों के दो रुप दिखाई देते है। एक प्रबंध काव्य जिसमें खंडकाव्य तथा महाकाव्य आते है ,तो दुसरा मुक्तक काव्य है। मुक्तक काव्य कथाविरहीत तथा अल्पस्वरूप का होता है। महाकाव्य में सर्ग या अध्याय होते है। पृथ्वीराज रासो महाकाव्य है। इस में 69 अध्याय (सर्ग) है। मुुुक्तक काव्य केे अंंतर्गत बीसलदेव रासो आता है।अत: इस काल में प्रबंध तथा मुक्तक काव्य के साथ-साथ फुटकर पद भी मिलते है।

10. हिंदी कविता का प्रारंभिक रूपः

आदिकाल साहित्य की प्रमाणिकता संदिग्ध होते हुए भी उसके महत्व को भुलाया नहीं जा सकता। इसका आरंभ कविता से ही हुआ है। संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश में गद्य-पद्य दोनों रूपों में काव्य रचना की प्रधानता थी। हिंदी से पहले की सभी भाषाएं जन भाषाएं न हुआ करती थी वह किसी विशिष्ट जाति समुदाय अथवा वर्ग के लिए हुआ करता था।वह साहित्यिक रूप जनसामान्य के लिए न होकर उच्च व श्रेष्ठ कुल के लिए हुआ करता था। हिंदी का साहित्य में पदार्पण तब हुआ जब मुद्रण का प्रचार प्रसार हुआ। जिसके कारण एक नया पाठक वर्ग सामने आया। वह वर्ग मध्यम वर्ग था, जिसने हिंदी को अपनाया और उसे साहित्य रूप में स्वीकार किया। हिंदी जनसामान्य की भाषा है इसमें जो हम बोलते हैं वही लिखित रूप में भी होता है। अतः लोगों को बोलने अथवा समझने में कोई कठिनाई नहीं होती है यह एक आम भाषा है।

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