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बी.ए. प्रथम वर्ष (DSC-1)

अष्टछाप के प्रमुख कवि

भक्तिकाल की सगुण भक्तिधारा में कृ्ष्ण काव्य का विशेष महत्व है। कृष्ण भक्ति काव्य धारा से अभिप्राय उस काव्यधारा से है जिसमें कवियों ने भगवान विष्णु के अवतार कृष्ण के चरित्र को आधार बनाकर अपने काव्य ग्रंथों की रचना की। इस परंपरा के कवियों ने कृष्ण के बाल रूप के एवं उनकी विविध लीलाओं के हृदयग्राही चित्र अपने काव्य में अंकित किए हैं। भागवत पुराण इस काव्यधारा का आधार ग्रंथ है। कृष्ण भक्ति के प्रचार में वल्लभाचार्य के ‘पुष्टि संप्रदाय’ का बहुत बड़ा योगदान माना जाता है। इन्होंने शुद्धाद्वैतवाद की स्थापना की । इनकी उपासना की पद्धति पुष्टिमार्ग के नाम से जानी जाती है। पुष्टिमार्ग में भगवान के अनुग्रह को पाने पर सर्वाधिक जोर दिया गया है। वल्लभ संप्रदाय के इस पुष्टिमार्ग में अनेक भक्त कवियों ने दीक्षित होकर कृष्ण भक्ति का प्रसार किया। वल्लभाचार्य द्वारा प्रवर्तित पुष्टिमार्ग उनके पुत्र गोसाईं विट्ठलनाथ के प्रयत्नों से विकसित हुआ। विट्ठल नाथ ने सम्वत 1602 (सन् 1565 ई.) में अपने पिता वल्लभाचार्य के 84 शिष्यों में से चार तथा अपने 252 शिष्यों में से चार को लेकर आठ प्रसिद्ध भक्त कवि संगीतज्ञों की मंडली की स्थापना की। जो अष्टछाप के नाम से प्रसिद्ध है। ये आठों भक्त कवि दिन के आठों पहर क्रम से कृष्ण भक्ति का गुणगान करते थे। अष्टछाप के प्रमुख कवि इस प्रकार हैं-

श्री वल्लभाचार्य के शिष्यः

गोस्वामी बिट्ठलनाथ के शिष्यः

ये आठों भक्त कवि श्रीनाथजी के मन्दिर की नित्य लीला में भगवान श्रीकृष्ण के सखा के रूप में सदैव उनके साथ रहते थे, इस रूप में इन्हे ‘अष्टसखा’ की संज्ञा से जाना जाता है।

इनमें सबसे जयेष्ठ कवि कुंभनदास हैं जबकि कनिष्ठ कवि नंददास हैं। काव्य -सौष्ठव की दृष्टि से सर्वप्रथम स्थान सूरदास का है। इन कवियों का जीवन परिचय गोकुलनाथ द्वारा रचित ‘चौरासी वैष्णवन की वार्ता’ तथा ‘दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता’ में प्राप्त होता है। इन कवियों का परिचय इस प्रकार है-

कुम्भनदास:

कुम्भनदास का जन्म सन् 1468 ई. में, सम्प्रदाय प्रवेश सन् 1492 ई. में और गोलोकवास सन् 1582 ई. के लगभग हुआ था।। अष्टछाप के कवियों में सबसे पहले कुम्भनदास ने महाप्रभु वल्लभाचार्य से दीक्षा ली थी। उनके पिता एक साधारण श्रेणी के व्यक्ति थे और खेती करके जीविका चलाते थे। कुंभनदास ने पैतृक वृत्ति में ही आस्था रखी और किसानी का जीवन ही उन्हें अच्छा लगने लगा। पैसो का अभाव अपने जीवन में हमेशा खटकता रहा पर उन्होंने किसी के सामने हाथ नहीं फैलाएं। भगवद्भक्ति ही उनकी संपत्ति थी। कुंभनदास का परिवार बड़ा था और खेती के माध्यम से ही भी वे अपने परिवार का पालन-पोषण करते थे। उनके परिवार में उनकी पत्नी के अलावा कुंभनदास के 7 पुत्र व 7 पुत्र वधु है और एक विधवा भतीजी थी। कुंभनदास परम भक्त भगवद्भक्त,आदर्श गृहस्थ और महान व्यक्ति थे और इसके साथ ही वे त्यागी और महान संतोषी व्यक्ति भी थे।

एक बार मुग़ल बादशाह अकबर की राजसभा में एक गायक ने कुम्भनदास का पद गाया। बादशाह ने उस पद से आकृष्ट होकर कुम्भनदास को फ़तेहपुर सीकरी बुलाया। पहले तो कुम्भनदास जाना नहीं चाहते थे,  पर सैनिक और दूतों का विशेष आग्रह देखकर वे पैदल ही गये। श्रीनाथ जी के सभा सदस्य को अकबर का ऐश्वर्य दो कौड़ी का लगा। कुम्भनदास की पगड़ी फटी हुई थी, तनिया मैली थी, वे आत्मग्लानि में डूब रहे थे कि किस पाप के फलस्वरूप उन्हें इनके सामने उपस्थित होना पड़ा। बादशाह ने उनकी बड़ी आवभगत की, पर कुम्भनदास को तो ऐसा लगा कि किसी ने उनको नरक में लाकर खड़ा कर दिया है। वे सोचने लगे कि राजसभा से तो कहीं उत्तम ब्रज है, जिसमें स्वयं श्रीनाथ जी खेलते रहते हैं, अनेकों क्रीड़ाएं करते रहते हैं। अकबर ने पद गाने की प्रार्थना की। कुम्भनदास तो भगवान श्रीकृष्ण के ऐश्वर्य-माधुर्य के कवि थे, उन्होंने पद-गान किया-

भक्तन को कहा सीकरी सो काम।
आवत जात पन्हैयां टूटीं, बिसरि गयो हरिनाम।।
जाको मुख देखैं दुख लागै, ताको करनो पर्‌यो प्रनाम।
कुंभनदास’ लाल गिरिधर बिनु और सबै बेकाम।।

बादशाह सहृदय थे, उन्होंने आदरपूर्वक उनको घर भेज दिया। राजा मानसिंह भी उनकी पद-गान शैली से बहुत प्रभावित थे। जब उनको कुंभनदास की निर्धनता का पता लगा तो उन्होंने सोने का दर्पण देना चाहा, भगवान के भक्त ने अस्वीकार कर दिया, मोहरों की थैली देनी चाही, विश्वपति के सेवक ने उसकी उपेक्षा कर दी। चलते समय मानसिंह ने जमनुवतो गांव कुम्भनदास के नाम करना चाहा, पर उन्होंने कहा कि “मेरा काम तो करील के पेड़ और बेर के वृक्ष से ही चल जाता है।” राजा मानसिंह ने उनकी नि:स्पृहता और त्‍याग की सराहना की, उन्होंने कहा कि “माया के भक्त तो मैंने बहुत देखे हैं, पर वास्तविक भगवद्भक्त तो आप ही हैं।” कुम्भनदास के पदों का एक संग्रह ‘कुम्भनदास’ शीर्षक से श्रीविद्या विभाग, कांकरोली द्वारा प्रकाशित हुआ है

सूरदास:

हिंदी के कृष्ण भक्त कवियों में सूरदास का स्थान सर्वोपरि है।सूरदास का जन्म 1478 ई० में रुनकता नामक गाँव में हुआ। यह गाँव मथुरा-आगरा मार्ग के किनारे स्थित है। कुछ विद्वानों का मत है कि सूर का जन्म सीही नामक ग्राम में एक निर्धन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। सूरदास नेत्रहीन थे यह तो सर्वविदित है परंतु वे जन्म से अंधे थे या बाद में अंधे हुए इस बारे में मतभेद है। सूरदास   की   रचनाओं   में   कई   स्थानों   पर   उनके   अंधे   होने   का   उल्लेख   मिलता   है।   उन्होनें   स्वयं   अपनी   रचनाओं   में   अपने   अंधे ,  निपट   अंधे   होने   की   बात   कही   है।   परन्तु   उन्होनें   कही   यह   उल्लेख   नही   किया   गया   कि   वे   जमान्ध   थे   अथवा   बाद   में   अंधे   हुए   थे।

मेरी तो गतिपति तुम अनतहिं दुख पाउँ।
सूर कूर आँधरौ मैं द्वार परयो गाऊं।

चौरासी वैष्णव की वार्ता के अनुसार सूरदास अपने बहुत से सेवकों के साथ सन्यासी वेश में गऊघाट पर रहा करते थे।  यहीं पर उनकी भेंट वल्लभाचार्य से हुई। वल्लभाचार्य ने उनको पुष्टिमार्ग में दीक्षित कर के कृष्णलीला के पद गाने का आदेश दिया। तत्पश्चात सूरदास आचार्य की आज्ञा से श्री नाथ के मंदिर में कीर्तन करने लगे और भगवान कृष्ण की पावन लीलाओंका गुणगान गाने लगे।  श्री नाथ के मंदिर से कुछ दूरी पर पारसोली नामक स्थान में सूरदास रहा करते थे।  लगभग 33 वर्ष की अवस्था में श्री नाथ के मंदिर में उन्होंने कीर्तन करना आरंभ किया और अपने अंतिम समय तक वे नियमित रूप से वहां कृष्ण लीलाओं का गायन करते रहे। 

पूर्व संस्कार, जन्मजात प्रतिभा, गुणियों के सत्संग और निजी अभ्यास के कारण छोटी सी आयु में ही सूरदास विभिन्न विधाओं के ज्ञाता हो गए । इनकी ख्याति गायक और महात्मा के नाते खूब फैली। कहा जाता है कि सम्राट अकबर ने मथुरा में इनसे भेंट की थी। गोस्वामी तुलसीदास जी इन से मिले और इन्हीं के पदों से प्रभावित होकर उन्होंने कृष्ण गीतावली नामक काव्य ग्रंथ की रचना की थी। सूरदास जी की मृत्‍यु सन् 1583 ई. में गोवर्धन के पास ‘पारसौली’ नामक ग्राम में हुई थी। अपनी मृत्यु के समय इन्होंने गोस्वामी विट्ठलनाथ, रामदास, कुंभनदास, गोविंद स्वामी और चतुर्भुज दास आदि की उपस्थिति में खंजन नयन रूप रस  माते पद का गायन करते हुए अपने भौतिक शरीर को छोड़ा।  गोस्वामी विट्ठलनाथ ने इन्हें अष्टछाप का जहाज कहकर संबोधित किया। 

सूर   की   हिन्दी   साहित्य   को   देन   उनकी   अमर   कृति   ‘ सूरसागर ’   है।

श्रीमद्-भागवत के आधार पर सूरसागरमें सवा लाख पद थे। किन्तु वर्तमान संस्करणों में लगभग सात हज़ार पद ही उपलब्ध बताये जाते हैं, ‘सूरसागर’ में श्री कृष्ण की बाल-लीलाओं, गोपी-प्रेम, उद्धव-गोपी संवाद और गोपी-विरह का बड़ा सरस वर्णन है। इसके अतिरिक्त सुरसारावली और साहित्य लहिरी इनकी प्रमुख काव्य रचनाएं है। इन्हें वात्सल्य रस का सम्राट भी कहा जाता है।

परमानंद दास:

परमानंद दास वल्लभाचार्य जी के शिष्य और अष्टछाप के प्रसिद्ध कवियों में से एक थे। वे भगवान की लीला के मर्मज्ञ, अनुभवी कवि और कीर्तनकार थे। उन्होंने आजीवन भगवान की लीला गायी। श्रीवल्लभाचार्य जी की उन पर बड़ी कृपा रहती थी। वे उनका बड़ा सम्मान करते थे। उनका पद संग्रह ‘परमानंदसागर’ के नाम से विख्या‍त है। उनकी रचनाएं अत्यन्त सरस और भावपूर्ण हैं। लीलागायक कवियों में उन्हें गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त है। परमानंद दास जी का जन्म संवत 1550 विक्रमी (1493 ई.) में मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी को हुआ था। वे कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे और कन्नौज, उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे। संवत् 1602 विक्रमी में गोसाईं विट्ठलनाथ जी ने उनको ‘अष्टछाप’ में सम्मिलित कर लिया। वे उच्चकोटि के कवि और भक्त थे।अष्टछाप में महाकवि सूरदास के बाद आपका ही स्थान आता है। इनके दो ग्रंथ प्रसिद्ध हैं। ‘ध्रुव चरित्र’ और ‘दानलीला’। इनके अतिरिक्त ‘परमानन्द सागर’ में इनके 735 पद संग्रहीत हैं। इनके पद बड़े ही मधुर, सरस और गेय हैं। एक उदाहरण देखिए-

माई मीठे हरि जू के बोलना।
पांय पैंजनी रुनझुन बाजे, आंगन आंगन डोलना ॥
काजर तिलक कंठ कचुलामल, पीतांबर को चोलना।
‘परमानंद दास’ की जीवनी, गोपि झुलावत झोलना ॥

कृष्णदास:

अष्टछाप के प्रथम चार कवियों में अन्तिम कृष्णदास अधिकारी हैं। उनका जन्म सन् 1495 ई. के आसपास गुजरात प्रदेश के एक ग्रामीण कुनबी परिवार में हुआ था। सन् 1509 ई. में वे पुष्टिमार्ग में दीक्षित हुए और सन् 1575 और 1581 ई. के बीच उनका देहावसान हुआ। बाल्यकाल से ही कृष्णदास में असाधारण धार्मिक प्रवृत्ति थी। 12-13 वर्ष की अवस्था में उन्होंने अपने पिता के एक चोरी के अपराध को पकड़कर उन्हें मुखिया के पद से हटवा दिया था। इसके फलस्वरूप पिता ने उन्हें घर से निकाल दिया और वे भ्रमण करते हुए ब्रज में आ गये।

कृष्णदास में असाधारण बुद्धिमत्ता, व्यवहार-कुशलता और संघटन की योग्यता थी। पहले उन्हें वल्लभाचार्य ने भेंटिया (भेंट उगाहनेवाला) के पद पर रखा और फिर उन्हें श्रीनाथजी के मन्दिर के अधिकारी का पद सौंप दिया। अपने इस उत्तरदायित्व का कृष्णदास ने बड़ी योग्यता से निर्वाह किया। बल्लभाचार्य जी से भेंट कर उन्होंने सम्प्रदाय की दीक्षा ग्रहण की। कृष्णदास ने कृष्णलीला के अनेक प्रसंगों पर पद-रचना की है। इनका कविताकाल सन् 1550 के आसपास माना जाता है । जुगलमान चरित,भ्रमरगीत तथा प्रेमतत्त्व निरूपण इनकी प्रसिद्ध काव्य रचनाएँ हैं। इनकी काव्य शैली का एक उदाहरण देखिए-

मो मन गिरिधर छबि पै अटक्यो।
ललित त्रिभंग चाल पै चलि कै, चिबुक चारु गडि ठठक्यो॥
सजल स्याम घन बरन लीन ह्वै, फिर चित अनत न भटक्यो।
‘कृष्णदास किए प्रान निछावर, यह तन जग सिर पटक्यो॥

गोविंदस्वामी:

गोविंदस्वामी जी का जन्म ब्रज के निकट आंतरी नामक ग्राम में संवत 1562 (1505 ई.) विक्रमी में हुआ था। बाल्‍यावस्‍था से ही उनमें वैराग्‍य और भक्ति के अंकुर प्रस्‍फुटित हो रहे थे। कुछ दिनों तक गृहस्‍थाश्रम का उपभोग करने पर उन्‍होंने घर छोड़ दिया और वैराग्‍य ले लिया। महावन में जाकर भगवान के भजन और कीर्तन में समय का सदुपयोग करने लगे। महावन के टीले पर बैठकर शास्‍त्रोक्‍त विधि से वे कीर्तन करते थे। धीरे-धीरे उनकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गयी।गोविंदस्वामी गानविद्या के आचार्य थे। काव्‍य एवं संगीत का पूर्ण रूप से उन्‍हें ज्ञान था।

गोसाईं विट्ठलनाथ जी उनकी भक्ति-निष्‍ठा और संगीत-माधुरी से परिचित थे। गोविंदस्‍वामी ने श्रीविट्ठलनाथ जी से संवत 1592 विक्रमी में गोकुल आकर ब्रह्मसम्‍बन्‍ध ले लिया। उनके परम कृपापात्र और भक्त हो गये। गोसाईं जी ने कर्म और भक्ति का तात्विक विवेचन किया। उनकी कृपा से वे गोविंदस्‍वामी से ‘गोविंददास’ हो गये। उन्‍होंने गोवर्धन को ही अपना स्‍थायी निवास स्थिर किया। गोवर्धन के निकट कदम्‍ब वृक्षों की एक मनोरम वाटिका में वे रहने लगे। वह स्‍थान ‘गोविंददास की कदमखण्‍डी’ नाम से प्रसिद्ध है। गोसाईं विट्ठलनाथ ने उन्‍हें कवीश्‍वर की संज्ञा से समलंकृत कर ‘अष्‍टछाप’ में सम्मिलित किया था। गोविंददास जी की भक्ति सख्‍य भाव की थी। राग सागरोद्भव, राग कल्पद्रुम, राग रत्नाकर तथा अन्य संग्रहों में कुल मिलाकर इनके 257 पद मिलते हैं। इनमें भाव की गहनता एवं अभिव्यक्ति का अनूठापन है। ये कुशल गायक भी थे। उनके पद का एक उदाहरण देखिए-

मो मन बसौ श्यामा-श्याम।
श्याम तन मन श्याम कामर, माल की मणि श्याम।
श्याम अंगन श्याम भूषण, वसन हैं अति श्याम।
श्याम-श्याम के प्रेम भीने, ‘गोविंद जन भए श्याम॥

छीतस्वामी:

अष्टछाप के कवियों में छीतस्वामी एक ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने जीवनपर्यन्त गृहस्थ-जीवन बिताते हुए तथा अपने ही घर रहते हुए श्रीनाथजी की कीर्तन-सेवा की। ये मथुरा के रहने वाले चौबे थे। इनका जन्म अनुमानत: सन् 1510 ई. के आसपास, सम्प्रदाय प्रवेश सन् 1535 ई. तथा निधन सन् 1585 ई. में हुआ था। वार्ता में लिखा है कि ये बड़े मसखरे, लम्पट और गुण्डे थे। एक बार गोसाई विट्ठलनाथ की परीक्षा लेने के लिए वे अपने चार चौबे मित्रों के साथ उन्हें एक खोटा रुपया और एक थोथा नारियल भेंट करने गये, किन्तु विट्ठलनाथ को देखते ही इन पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि उन्होंने हाथ जोड़कर गोसाईं जी से क्षमा याचना की और उनसे शरण में लेने की प्रार्थना की।

शरण में लेने के बाद गोसाईं जी ने श्रीनाथ जी की सेवा-प्रणाली के निर्माण में छीतस्वामी से बहुत सहायता ली। महाराज बीरबल के वे पुरोहित थे और उनसे वार्षिक वृत्ति पाते थे। एक बार बीरबल को उन्होंने एक पद सुनाया, जिसमें गोस्वामी जी की साक्षात कृष्ण के रूप में प्रशंसा वर्णित थी। बीरबल ने उस पद की सराहना नहीं की। इस पर छीतस्वामी अप्रसन्न हो गये और उन्होंने बीरबल से वार्षिक वृत्ति लेना बन्द कर दिया। गोसाईं जी ने लाहौर के वैष्णवों से उनके लिए वार्षिक वृत्ति का प्रबन्ध कर दिया। कविता और संगीत दोनों में छीतस्वामी बड़े निपुण थे। प्रसिद्ध है कि अकबर भी उनके पद सुनने के लिए भेष बदलकर आते थे। छीतस्वामी एक अच्छे सुकवि, निपुण संगीतज्ञ तथा गुणग्राही व्यक्ति थे। उनके पद सीधी-सादी सरल भाषा में हैं। ब्रजभूमि के प्रति उनमें प्रगाढ़ अनुराग था। उनकी काव्य शैली का एक उदाहरण देखिए-

भई अब गिरिधर सों पैहचान।
कपट रूप धरि छल के आयौ, परषोत्तम नहिं जान।।
छोटौ बड़ौ कछू नहिं देख्यौ, छाइ रह्यौ अभियान।
“छीतस्वामि” देखत अपनायौ, विट्ठल कृपा निधान।।

चतुर्भुजदास:

चतुर्भुजदास वल्ल्भ संप्रदाय (पुष्टिमार्ग) के आठ कवियों (अष्टछाप कवि) में एक हैं। इनका जन्म 1530 ई० में हुआ। ये कुम्भनदास के पुत्र और गोसाईं विट्ठलनाथ जी के शिष्य थे। इनकी भाषा चलती और सुव्यवस्थित है। इनके तीन ग्रंथ मिलते हैं- द्वादशयश, भक्तिप्रताप तथा हितजू को मंगल। इनका निधन 1585 ई० में हुआ। चतुर्भुजदास की भाषा शुद्ध ब्रजभाषा नहीं है, उस पर बैसवाड़ी और बुन्देली का गहरा प्रभाव है। वे संस्कृत भाषा के भी विद्वान थे, उन्होंने अपने ग्रन्थ की टीका स्वयं संस्कृत में लिखी है। उनकी काव्य रचना का एख उदाहरण देखिए-

तब ते और न कछु सुहाय।
सुन्दर श्याम जबहिं ते देखे खरिक दुहावत गाय।।
आवति हुति चली मारग सखि, हौं अपने सति भाय।
मदन गोपाल देखि कै इकटक रही ठगी मुरझाय।।
बिखरी लोक लाज यह काजर बंधु अरु भाय।
दास चतुर्भुज प्रभु गिरिवरधर तन मन लियो चुराय।।

नंददास:

नंददास 16वीं शती के अंतिम चरण के कवि थे। वे ‘अष्टछाप’ के प्रमुख कवियों में से एक थे, जो सूरदास के बाद सबसे अधिक प्रसिद्ध हुए। नंददास भक्तिरस के पूर्ण मर्मज्ञ और ज्ञानी थे। नंददास जी का जन्म संवत् 1570 (1513 ई.) विक्रमी में हुआ था। एक मान्यता के अनुसार इनका जन्म उत्तर प्रदेश के एटा ज़िले में सोरों के पास रामपुर गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम जीवाराम और चाचा का आत्माराम था। वे शुक्ल ब्राह्मण थे और रामपुर ग्राम के निवासी थे। कहते हैं कि गोस्वामी तुलसीदास उनके गुरुभाई थे। नंददास उनको बड़ी प्रतिष्ठा, सम्मान और श्रद्धा की दृष्टि से देखते थे। नंददास ने गोसाईं जी के चरण-कमल के स्‍थायी आश्रय के लिये उत्‍कट इच्‍छा प्रकट की। श्रीवल्‍लभनन्‍दन दास कहलाने में उन्‍होंने परम गौरव अनुभव किया। नंददास ने उनके चरण-कमलों पर सर्वस्‍व निछावर कर दिया। उनका मन भगवान श्रीकृष्‍ण में पूर्ण आसक्‍त हो गया। उन्‍होंने गोवर्धन में श्रीनाथ जी का दर्शन किया। वे भगवान की किशोर-लीला के सम्‍बन्‍ध में पद रचना करने लगे।

श्रीकृष्‍ण लीला का प्राणधन रासरस ही उनकी काव्‍य-साधना का मुख्‍य विषय हो गया। वे कभी गोवर्धन और कभी गोकुल में रहते थे।भगवान श्रीकृष्‍ण का यश-चिन्‍तन ही नंददास के काव्‍य का प्राण था। वह कहा करते थे कि- “जिस कविता में ‘हरि’ के यश का रस न मिले, उसे सुनना ही नहीं चाहिये।” भगवान श्रीकृष्‍ण की रूप-माधुरी के वर्णन में उन्‍होंने जिस योग्‍यता का परिचय दिया, वह अपने ढंग की एक ही वस्‍तु है। नंददास ने गोपी प्रेम का अत्‍यन्‍त उत्‍कृष्‍ट आदर्श अपने काव्‍य में निरूपित किया है। ब्रज-काव्‍य साहित्‍य में रासरस का पारावार ही उनकी लेखनी से उमड़ उठा। नित्‍य नवीन रासरस, नित्‍य गोपी और नित्‍य श्रीकृष्‍ण के सौन्‍दर्य-माधुर्य में वे रात-दिन सराबोर रहते थे। रसिकों के संग में रहकर हरि-लीला गाते रहने को ही वे जीवन का परमानन्‍द समझते थे। उनकी दृढ़ मान्‍यता थी-

“रूप प्रेम आनन्‍द रस जो कछु जग में आहि।
सो सब गिरिधर देव को, निधरक बरनौं ताहि।।”

इनके काव्य के विषय में यह उक्ति प्रसिद्ध है-

‘और कवि गढ़िया, नंददास जड़िया’

इससे प्रकट होता है कि इनके काव्य का कला-पक्ष महत्त्वपूर्ण है। इनकी रचना बड़ी सरस और मधुर है।

रासपंचाध्यायी, भागवत दशमस्कंध, रुक्मिणी मंगल, सिद्धांत पंचाध्यायी, रूपमंजरी, मानमंजरी, विरहमंजरी, नामचिंतामणिमाला, अनेकार्थनाममाला, दानलीला, मानलीला, अनेकार्थमंजरी, ज्ञानमंजरी, श्यामसगाई, भ्रमरगीत, सुदामाचरित्र इनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं। इनका प्रसिद्ध पद है-

दौरि-दौर् आवत मोहि मनावत, दाम खरच कछु मोल लई री।
अंचरा पसारति मोहि खिजावति, तेरे बाबा की कहा चेरि भई री।
जा री जा दूती तू भवन आपने, लख बातन की एक कही री
नंददास पभु वे क्यों नहीं आवत, उनके पायन क्या मेंहदी दई री।