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unit-2 Bhkti-kaal बी.ए. प्रथम वर्ष (DSC-1)

भक्ति काल की परिस्थितियां

हिंदी साहित्य के काल विभाजन में दूसरे काल को भक्ति काल की संज्ञा दी गई है। भक्ति काल का समय संवत 1375 से लेकर सवत 1700 तक निर्धारित किया गया है। साहित्य समाज की उपज होता है और समाज से कटकर साहित्य की कोई उपयोगिता नहीं रहती। साहित्यकार स्वयं भी समाज की उपज होता है और सामाजिक परिस्थितियां उसे बनाती हैं। किसी भी युग के साहित्य को जाने के लिए उस युग की परिस्थितियों को जाना नितांत आवश्यक माना गया है। भक्ति काल में भक्ति भावना की प्रधानता होने के कारण आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इस काल को भक्ति काल का नाम दिया।

आदिकाल के वीरता और श्रृंगार से परिपूर्ण साहित्य से एकदम भिन्न इस काल के साहित्य में भक्ति का शांत झरना बहता है। कोई भी साहित्यिक प्रवृत्तियाँ यूं ही अचानक विकसित नहीं होती, उसके पीछे कई सारे प्रमुख कारक, शक्तियां और तमाम परिस्थितियां सक्रिय रहती हैं। लगभग 300 वर्षों के भक्ति साहित्य का सृजन कोई सहज सरल घटना नहीं थी। ऐतिहासिक दृष्टि से भक्ति आंदोलन के विकास को दो चरणों में बांटा जा सकता है- पहले चरण के अंतर्गत दक्षिण भारत का भक्ति आंदोलन आता है, और दूसरे चरण में उत्तर भारत का भक्ति आंदोलन आता है। हिंदी साहित्य के भक्ति काल का संबंध उत्तरी भारत के भक्ति आंदोलन से है। इस युग की राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों का विवेचन इस प्रकार है-

राजनीतिक परिस्थितियां

राजनीतिक दृष्टि से भक्ति काल का युग व्यवस्था का युग कहा जा सकता है।इस युग में मुख्य रूप से तुगलक वंश से लेकर मुगल वंश के बादशाह शाहजहां के शासनकाल तक का समय संकलित है। सर्वप्रथम तुगलक और लोधी वंश के शासकों ने यह राज्य किया। यह शासक प्रयोग अत्याचारी होने के साथ-साथ सत्ता के लालची भी थे। इनमें सांप्रदायिकता की भावना अधिक थी और उन्होंने इस्लामी कानूनों को आधार बनाकर शासन किया। इस युग में बलबन और अलाउद्दीन जैसे क्रूर शासकों ने तलवार के बल पर अपने साम्राज्य का अत्यधिक विस्तार किया। उत्तरी भारत का अधिकांश भाग विदेशी हमलावरों के अधीन हो चुका था। विशेषकर अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा, महाराष्ट्र और गुजरात को जीतकर राजस्थान का भी कुछ क्षेत्र जीत लिया। अलाउद्दीन की मृत्यु के पश्चात पंजाब के गयासुद्दीन तुगलक ने दिल्ली का शासन संभाल लिया। उसने बंगाल, महाराष्ट्र तथा आंध्र को जीतकर अपने राज्य का विस्तार किया किंतु धीरे-धीरे मेवाड़ में राजपूतों की,  तिरहुत में ब्राह्मणों की, बुंदेलखंड में बुंदेलों की, उड़ीसा में सूर्यवंशियों की, दक्षिण भारत में बहमनी शासकों की शक्ति बढ़ी। इसके पश्चात पठानों ने दिल्ली पर विजय प्राप्त की और उन्होंने बिहार तक अपने राज्य को फैला दिया। 1526 में बाबर के आक्रमण से न केवल दिल्ली का इब्राहिम लोधी पराजित हुआ बल्कि राणा सांगा की पराजय से राजपूत शक्ति भी बिखर गई। मुगल शासकों ने भी भारत वासियों पर मनमाने अत्याचार किए। अनेक हिंदुओं को मुसलमान बनाया गया। यही नहीं मुसलमानों में भी शिया और सुन्नी के नाम पर झगड़े होने लगे। हुमायूं और शेर शाह का संघर्ष हुआ। शेरशाह अधिक दिनों तक दिल्ली पर शासन नहीं कर सका। अकबर, जहांगीर और शाहजहां के काल में थोड़ी बहुत शांति बनी रही।अकबर की धार्मिक सहिष्णुता एवं राजपूत नीति ने उसके साम्राज्य को दृढ़ता प्रदान की। महाराणा प्रताप जैसे योद्धा उस समय भी आजादी के लिए संघर्ष करते रहे। कुल मिलाकर कहा जाए तो पूरे देश में गृह-कलह, हिंसा और अत्याचार का वातावरण फैला रहा। इसलिए भक्ति कालीन परिस्थितियां भारत वासियों के लिए सर्वथा प्रतिकूल ही थी। यद्यपि भक्ति कालीन कवियों ने धर्म और शांति के प्रचार पर बल दिया लेकिन फिर भी तुलसीदास जैसे कभी को यह कहना पड़ा कि वैदिक धर्म नष्ट हो गया और राजा भूमि चोर बन गए हैं। अतः राजनीतिक दृष्टि से यह काल युद्ध संघर्ष और अशांति का काल था।

सामाजिक परिस्थितियां

मुस्लिम शासन की स्थापना के बाद भारतीय जनता मुस्लिम धर्म से बहुत प्रभावित हुई।कुछ मुगल शासकों ने तो बलपूर्वक हिंदुओं को मुसलमान बनाया। दूसरी ओर हिंदुओं में जाति-पाति और ऊंच-नीच का भेद भाव अत्याधिक कट्टर हो गया था। तत्कालीन भारतीय समाज रूढ़िग्रस्त एवं जातिवादी पर आधारित समाज बनता जा रहा था। निम्न जातियों के लोग अमानवीय जीवन जीने के लिए विवश थे। अकबर की उदार नीतियों का प्रभाव भी समाज पर पड़ रहा था। बाल विवाह, पर्दा प्रथा तथा सती प्रथा का बोलबाला था। स्त्रियों में शिक्षा का प्रचार नहीं था। बहु विवाह का प्रचलन था तथा अमीरों और नवाबों की अंत:पुरों में अनेक रानियां होती थी। भक्ति काल में भारतीय समाज पर मुख्य रुप से दो वर्गों में। एक वर्ग राजा, महाराजा, सेठ, साहूकार, सुल्तान तथा सामंतों आदि का था वहीं दूसरे वर्ग में किसान, मजदुर, दलित, राज्य कर्मचारी और पारंपरिक काम धंधे में लगे लोग आते थे। साधु संतों में पाखंड एवं बाहरी आडंबरों का बोलबाला था। इस काल में मुख्य रूप से हिंदू समाज की स्थिति अत्यंत शोचनीय थी। यह असहाय, दरिद्रता और अत्याचार की भट्टी में झुलस रहा था। इस तरह सामाजिक दृष्टि से हिंदू जाति काफी पिछड़ चुकी थी। उस समय हिंदू और मुसलमान अपने त्यौहार रुचि पूर्वक मनाते थे। आखेट तथा जुआ जैसे व्यसन उच्च वर्ग में थे। तीतरबाजी, कबूतरबाजी, पतंगबाजी आदि का प्रचलन भी समाज में था। सारांश में कहा जा सकता है कि भक्तिकाल में समाज परिवर्तन के दौर से गुजर रहा था। एक तरफ परंपरावादी लोग अपनी परंपराओं को बनाए रखने के पक्ष में थे तो दूसरी तरफ नव इस्लाम के हितैषी लोग स्वयं को प्रगतिशील बता कर समाज में बदलाव लाना चाहते थे।

धार्मिक परिस्थितियां

धार्मिक दृष्टि से यह युग उत्कर्ष काल था। पूर्व में सिद्ध का वामाचार अब समाप्त हो चुका था। अपनी समस्त विकृतियों के साथ वज्रयान अब समाज में प्रभावहीन हो रहा था। शंकराचार्य ने बौद्ध धर्म की विकृतियों पर प्रहार करते हुए फिर से सनातन धर्म की स्थापना की। नाथ मुनियों ने योग साधना पर बल दिया। दक्षिण भारत में 12 आलवार संत हुए जिनमें एक भक्तिन अंडाल भी थी। इन्होंने सगुण भक्ति के लिए लोगों को प्रेरित किया। दक्षिण से शुरू हुई इस भक्ति लहर का उत्तर भारत में व्यापक प्रभाव पड़ा। हिंदू और मुस्लिम दोनों ही धर्मों में पूजा, नमाज, माला, तीर्थ यात्रा, रोजा जैसे बाहरी आडंबरों की अधिकता हो गई थी। इन धर्मों में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों और आडंबर को रोकने में तत्कालीन संतों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कबीर का समाज सुधार, जायसी का प्रेम, तुलसी का समन्वयवाद तथा सूरदास द्वारा कृष्ण का लोकरंजन स्वरूप का चित्रण निश्चय ही तत्कालीन परिस्थितियों की देन है।

आर्थिक परिस्थितियां

इस समय आर्थिक दृष्टि से हिंदू लोग बिछड़ने लगे थे और कुछ लोगों के लिए तो जीवित रहना भी कठिन हो गया था। एक विदेशी यात्री वर्नियर ने लिखा है,“उन हिंदुओं के पास धन संचित करने के लिए कोई साधन नहीं रह गए थे और उनमें से अधिकांश को निर्धनता अभाव एवं आजीविका के लिए निरंतर संघर्ष में जीवन बिताना पड़ता था।प्रजा के रहन-सहन का स्तर बहुत निम्न कोटि का था। करो का सारा भार उन्हीं पर था। राज्य पर उनको अप्राप्त थे।” शेरशाह सूरी का राज्य भले ही अल्पकाल के लिए रहा हो लेकिन उसने जमीदारी प्रथा समाप्त करके राज्य में खुशहाली लाने का प्रयास किया। मुगल राजाओं ने फिर इस प्रथा को आरंभ कर दिया। भक्ति काल में सामंती समाज में आर्थिक उत्पादन का आधार कृषि ही थी। कृषि से जुड़े काम धंधे हस्तकलाएं तथा व्यापार आदि को ही आजीविका का प्रमुख साधन माना जा सकता था। उच्च वर्ग विलासिता पूर्ण जिंदगी जीता था और निम्न वर्ग अत्यंत निर्धनता में जीवन यापन कर रहा था। मजदूरों, कारीगरों तथा मेहनतकश किसानों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी।

सांस्कृतिक परिस्थितियां

भारतीय धर्म और संस्कृति में समन्वय की भावना को अत्यधिक महत्व प्रदान किया गया है। समन्वयात्मकता, भारतीय संस्कृति की विशेषता है। विदेश से आने वाली संस्कृतियों को ही भारतीय संस्कृति ने अपना अंग नहीं बनाया बल्कि देश में उत्पन्न विरोधी विचारधाराओं को भी अपने अनुकूल बनाने का काम किया। सांस्कृतिक दृष्टि से देखा जाए तो भक्ति काल एक मिश्रित तथा समन्वित संस्कृति के विकास का काल है। इस्लाम के आने से एक बार पुनः भारत में सांस्कृतिक संक्रमण का दौर आया और खान-पान, रहन-सहन, शिक्षा साहित्य स्थापत्य कला, मूर्तिकला संगीत एवं चित्रकला में काफी बदलाव देखने को मिले। विदेशी तुर्क एवं भारतीय स्थापत्य शैली के मिश्रण से गुजराती एवं जौनपुरी स्थापत्य शैली का विकास हुआ। एलोरा के समीप कैलाश मंदिर में शिव की मूर्ति के ऊपर बोधि वृक्ष स्थित है, चंबा नरेश अजय पाल के शासनकाल में उत्कीर्ण ब्रह्मा और शिव के साथ बुद्ध भी हैं। ताजमहल तथा लालकिला भारतीय ईरानी वस्तुकलाओं के सम्मिश्रण का उत्तम उदाहरण है। गीता में भगवान कृष्ण ने कर्म योग, ज्ञान योग तथा भक्ति योग को इकट्ठा कर दिया। वैदिक संस्कृति मे कर्म को प्रधानता दी गई। उपनिषदों में ज्ञान पर बल दिया गया, पुराणों में भी भक्ति का विस्तार हुआ। साहित्य के प्रवाह में हिंदू मुस्लिम सगुण, निर्गुण, शैव, शाक्त सभी एक साथ बह गए। भक्ति काल के कवियों ने भक्ति साहित्य को संगीत से जोड़ा। संगीत के साथ ही चित्रकला में भी खूब उन्नति हुई। मुगल शासकों द्वारा चित्रकला को राजाश्रय प्रदान किया गया। भक्ति काल का साहित्य सांस्कृतिक समन्वय का सुंदर उदाहरण है।

साहित्यिक परिस्थितियां

इस समय उच्च हिंदू वर्ग के लोग संस्कृत का अध्ययन करते थे। फारसी राजभाषा थी कुछ हिंदुओं ने रोजगार के लिए इस भाषा को सीखा। हाट बाजार तथा सेना में आम बोलचाल की भाषा उर्दू के रूप में विकसित हो रही थी। पहले की भाषा अवधी और ब्रज बनती जा रही थी। संत कवियों ने बोलचाल की भाषा को महत्व दिया तथा उनकी भाषा सधुक्कड़ी या खिचड़ी भाषा कहलाने लगी। भक्ति काल में प्रबंध काव्य, मुक्तक काव्य तथा गीतिकाव्य लिखे। संस्कृत भाषा के कुछ ग्रंथों की टीकाएं भी इस समय लिखी गई। इस युग के अधिकांश कवि भक्त कवि थे तथा धर्म और भक्ति को आधार बनाकर काव्य रचनाएं लिख रहे थे। कबीर, सूर, तुलसी, जायसी देश के महान कवि हुए हैं। भक्ति कालीन साहित्य को दिखाकर यह कहा जा सकता है जिसने न केवल धर्म की व्याख्या की बल्कि हिंदू समाज को सुख शांति दे प्रदान की। यही कारण है कि भक्ति कालीन साहित्य हृदय, मन और आत्मा की भूख को शांत करता है। इसी आधार पर भक्ति काल को हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग भी कहा जाता है।

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