Categories
unit-2 Bhkti-kaal बी.ए. प्रथम वर्ष (DSC-1)

भक्तिकाल की प्रमुख काव्यधाराएं

हिंदी साहित्य के मध्यकाल को दो भागों में विभाजित किया गया है-पूर्व मध्यकाल तथा उत्तर मध्यकाल। पूर्व मध्यकाल को भक्तिकाल तथा उत्तर मध्यकाल को रीतिकाल कहा गया है। भक्तिकाल हिंदी साहित्य का सर्वश्रेष्ठ युग है जिसे विद्वानों ने स्वर्ण युग की संज्ञा दी गई है। भक्ति काल की समय सीमा संवत 1375 से लेकर संवत 1700 तक निर्धारित की गई है। साहित्य के इस काल को सर्वांगीण विकास का काल कहा गया है जिसमें साहित्य संस्कृत लालित्य भाव और भाषा सभी दृष्टि से श्रेष्ठ साहित्य की रचना हुई है। भक्ति काल का साहित्य भारतीय साहित्य के उत्थान का साहित्य है।

शिवकुमार शर्मा के शब्दों में, “विचारों की उत्तमता, भावना अनुभूतियों की प्रकृष्टता, काव्य संबंधी उद्देश्य और दृष्टिकोण की उदारता, कला पक्ष और भाव पक्ष की उच्चता, भावनाओं की मधुरता, संगीत की आस्वादनीयता, काव्य रूपों, शैलियों तथा भाषाओं की विविधता, सहज रसनीयता और भारतीय संस्कृति की भास्वरता आदि की दृष्टि से भक्तिकालीन साहित्य अतुलनीय है।”

अतः भक्ति कालीन साहित्य प्रत्येक दृष्टिकोण से हिंदी साहित्य का सर्वश्रेष्ठ साहित्य है।

भक्ति काल में प्रमुख रूप से दो काव्य धाराएं विकसित हुई-

निर्गुण काव्य धाराः

निर्गुण काव्य धारा के अंतर्गत उस ईश्वर की भक्ति की गई जो सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान है तथा समस्त गुणों से ऊपर है। वह निराकार, अक्षय पुरुष अजन्मा, अगोचर है तथा सृष्टि के कण-कण में विद्यमान है। निर्गुण काव्यधारा को दो शाखाओं में विभाजित किया गया है-

  • संत काव्य धारा या ज्ञानमार्गी शाखा
    निर्गुण काव्यधारा की एक शाखा को संत काव्य धारा कहा जाता है | इस काव्य धारा को ज्ञानाश्रयी काव्यधारा भी कहा जाता है। अधिकांश विद्वान मानते हैं कि वह व्यक्ति जिसने ‘सत’ रूपी परमतत्व को प्राप्त कर लिया हो, वही संत है | संत काव्य-परंपरा के प्रमुख कवि हैं – नामदेव, कबीरदास, रैदास, नानक, दादू दयाल, रज्जब दास, मलूक दास, सुंदर दास आदि |
  • सूफी काव्य धारा या प्रेममार्गी शाखा
    इस काव्य धारा को प्रेममार्गी/प्रेमाश्रयी/प्रेमाख्यानक आदि नामों से जाना जाता है।इस शाखा को पल्लवित करने का श्रेय सूफी मुसलमान कवियों को जाता है इसीलिए इसे सूफी काव्य धारा भी कहा जाता है। इस काव्य धारा के प्रतिनिधि कवि मलिक मोहम्मद जायसी है। इसके अतिरिक्त कुत्तुबन, मुल्ला दाऊद, मंझन, उसमान, नूर मोहम्मद असायत आदि प्रसिद्ध है।
  • सगुण काव्य धाराः

    सगुण काव्यधारा के अंतर्गत वैष्णव भक्ति की धारा प्रवाहित हुई। इसमें भगवान विष्णु के राम और कृष्ण के रुप में अवतारों की महिमा का वर्णन मिलता है। इस आधार पर सगुण काव्यधारा भी दो भागों में विभाजित हुई-

    • कृष्ण काव्य धाराः
      भक्तिकाल की सगुण भक्ति धारा में कृष्ण काव्य का विशेष महत्व है।इस काव्य धारा में कृष्ण के लोक रंजक स्वरूप व माधुर्य से पूर्ण लीलाओं का चित्रण किया गया है।यह काव्य किशन के प्रति प्रेम की गहन अनुभूति का काव्य है। इस काव्य धारा के प्रतिनिधि कवि सूरदास है।
    • राम काव्य धाराः
      किस काव्य धारा के कवियों ने विष्णु के अवतार राम रूप की उपासना को अपना आधार बनाया है। राम भक्ति साहित्य में राम के लोक रक्षक मर्यादापुरुषोत्तम तथा परब्रह्म स्वरूप के साथ साथ शील, शक्ति और सौंदर्य के समन्वय को प्रस्तुत किया गया है। रामकाव्य-परम्परा के अध्ययन से ऐसा अनुमान होता है कि राम भारतीय-संस्कृति के भाव-नायक हैं। इस काव्य धारा के प्रतिनिधि कवि तुलसीदास है।

Leave a Reply

Your email address will not be published.