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भवानी प्रसाद मिश्र द्वारा रचित कविता कहीं नहीं बचे है

भवानी प्रसाद मिश्र की कविता ‘कहीं नहीं बचे हैं’ वर्तमान समय में पर्यावरण के विनाश की भयावहता का चित्रण करती है| प्रकृति मिश्र जी की कविताओं में सर्वत्र अपने पूरे वैभव के साथ विद्यमान रहती है| प्रकृति के साथ उनका गहरा लगाव है| वर्तमान मानव अपने स्वार्थों की बेदि पर प्रकृति का मनोहारी एवं पालक स्वरूप स्वाह करता जा रहा है| उसने पेड़ों को काटकर उनकी जगह कंकरीट के बड़े-बड़े भवन तैयार कर लिए है| स्वच्छ वायु, जल का संकट इतना गहराता जा रहा है की मनुष्य का जीवन त्वरित गति से विलीन होता जा रहा है| आज वृक्ष, नदी, सागर, सूरज, चाँद, तारे सभी कुछ मनुष्य की पाश्विक वृति के कारण प्रदूषित होते जा रहे हैं| पहाड़ों का रोदन करके सड़के बनाई जा रही है| पहाड़ों की नींव खोखली होती जा रही है| पक्षी जहाँ घोंसले बनाते थे, धूप में छाया का आनंद उठाते थे, उन वृक्षों का नामोनिशान मिटता जा रहा है| धरती  बंजर होती जा रही है| अगर यह स्थिति ऐसी ही रही तो प्रकृति द्वारा मनुष्य को जीवन यापन हेतु दिए यह अनमोल उपहार पूर्णतः समाप्त हो जाएंगे तथा मानव खुली हवा में सांस लेने को तरस जाएगा| प्रकृति का सुरक्षा चक्र नष्ट हो जाने से, वह दिन दूर नहीं जब मानव का जीवन स्वंय उसी की लापरवाहियों का शिकार बन, समाप्त हो जाएगा| अतः भवानी प्रसाद मिश्र अपनी इस कविता के माध्यम से पर्यावरण विनाश की भयावहता का चित्रण करते हुए समय रहते इसके सरंक्षण की गुहार लगाते हैं| इस कविता की प्रमुख विशेषताओं को निम्नलिखित बिंदुओं द्वारा स्पष्ट किया जा रहा है:-

(1) हरे-भरे वन (कहीं नहीं बचे हैं)

कवि इस कविता में सर्वप्रथम वृक्षों की महत्ता को प्रतिपादित करते हुए वर्तमान समय में उनके निरंतर विनाश के प्रति चिंता प्रकट करता है| वह कहता है अब धरती पर पहले की भांति कहीं भी हरे वृक्ष नहीं बचे हैं| मनुष्य ने अपनी असीमित लालसाओं की पूर्ति हेतु उनका अंधाधुंध कटान कर डाला| सारे के सारे जंगलों का विनाश कर हरियाली की जगह उसने कंकरीट के महल खड़े कर लिए हैं| एक समय था जब यह धरती हरे-भरे वृक्षों से भरी थी| वनों से मानव भोजन, लकड़ी, आवास, आदि मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति किया करता था| मनुष्य ही नहीं अपितु पशु-पक्षी भी इन वृक्षों की छाया में अपना आश्रय बनाते थे| ये वन प्राणवायु के संचार आधार थे परंतु सभ्यता की दौड़ में अंधे हुए मानव ने वनों का विनाश कर स्वयं के लिए विनाश के द्वार खोल दिये हैं| आज पूरी धरती पर कहीं भी हरे-भरे पेड़ दिखाई नहीं पड़ते:-

“कहीं नहीं बचे,
ठीक हरे वृक्ष”

हरेपन से हीन
सुखेपन की ओर… बनाते थे वे जिस पर
घोंसले, वे वृक्ष,
कट चुके हैं

(2) शीतलता के प्रतीक चाँद-तारे (कहीं नहीं बचे हैं)

कवि आगे कहते हैं कि यह धरती, जल, वायु ही नहीं अपितु पूरा अंतरिक्ष, उसमें घूमते ग्रह-नक्षत्र, मानव की शीतल चाँदनी, तारों की टिमटिमाहट सभी कुछ पर्यावरण के विनाश की भेंट चढ़ते जा रहे हैं| दिन-प्रतिदिन बढ़ते प्रदूषण की कालिमा चाँद –तारों की चमक को धुंधला बनाती जा रही है| सूरज की रोशनी भी फीकी पड़ती जा रही है | वायु प्रदूषण के कारण आज धरतिवासियों को सही रूप में सूर्य,चाँद और सितारों के दर्शन भी दुर्लभ हो गए है:-

“ कहीं नहीं बचा
ठीक चमकता सूरज,
चाँदनी उछालता चाँद
स्निग्धता बिखेरते तारे”

(3) मौसम की नियमावली ( कहीं नहीं बची है)

भवानी प्रसाद मिश्र लिखते हैं कि अब मौसम और ऋतुओं की नियमावलियाँ भी भंग हो गई है| कहने का भाव यह है कि मानव ने प्रकृति के संसाधनों में इतना अधिक हस्तक्षेप कर दिया है कि अब सर्दी, गर्मी, वर्षा, बसंत का निश्चित समय ही नहीं रह गया है| मौसम और ऋतुएँ भी अब उत्साहित सी दिखाई नहीं देती हैं क्योंकि वह भी मनुष्य के क्रूर एवं उपेक्षित व्यवहार से क्षुब्ध एवं दुःखी रहने लगी हैं:-

“कभी की उत्साह
वन्त सदियाँ
इसलिए चली
जा रही वे
सिर झुकाए”

(4) पक्षियों की चहचहाहट (कहीं नहीं बची है)

पर्यावरण प्रदूषण की भयावहता से प्रत्येक जीव परेशान है| पक्षियों के घोंसलों के लिए अब हरे वृक्षों की शाखाएं शेष नहीं रही हैं| वे जिस आकाश में पंख फैलाए उड़ रहे हैं, वह अआसमान भी प्रदूषित वायु के कारण धुँधलाता जा रहा है| कवि कहते हैं कि मनुष्य की लालसा ने पक्षियों को बेसहारा और बेघर कर दिया है| किसी से उसका घर छिन लेना एक  प्रकार की हिंसा ही है:-

“पंछियोंके आसमान में
चक्कर काटते दल
नजर नहीं आते
क्यूंकि बनाते थे
वे जिस पर घोंसले
वे वृक्ष कट
चुके हैं”

(5) धरती की उर्वरता (कहीं नहीं बची है)

कवि इस कविता के माध्यम से कहना चाहता है कि जिस धरती ने अन्नपूर्णा बनकर हमारे भंडारों को भरा, हमें आश्रय प्रदान किया आज वही भूमि कचरे के ढेर में बदलती जा रही है| तरह-तरह के प्रदूषणों ने उसकी उर्वरता को बंजर बना दिया है| अत्यधिक खनन से उसकी परत क्षीण होती जा रही है|

(6) नदियों की कलकल (कहीं नहीं बची है)

नदियों की शीतलता एवं उसके जल की निर्मलता को प्रदूषण ने तो कलुषित किया ही है, परंतु विभिन्न परियोजनाओं ने उनकी धाराओं को मोड़कर उनमे  पत्थर और मिट्टी के ढेर को लाकर रख दिया है| अब पहले की भांति नदियों का जल पवित्र नहीं रह गया है और न ही उनकी कलकल बहती धाराएं आनंद की अनुभूति करवा पाती है| सागर, झरने सभी इस विनाश की काली छाया में डरे-सहमे से दुबके बैठे हैं:-

“न ठीक सागर बचे हैं,
और झरने लगभग चुप
आँखों में घिरता अंधेरा घुप”

(7) प्रकृति सरंक्षण की परंपराएं ( कहीं नहीं बची हैं)

कवि कहता है कि मनुष्य प्रकृति के सरंक्षक से भक्षक की श्रेणी में पहुँच गया है| सदियों से जो पर्यावरण सरंक्षण की भारतीय परंपरा रही है, वह पूर्णतः नष्ट होती जा रही है| अब हम अपने प्रकृति स्वर्णिम अतीत से कटते जा रहें हैं| अपनी प्रकृति और संस्कृति की विरासत को कोसों दूर छोड़कर कृत्रिम सभ्यता की और बढ़ते जा रहे हैं | पर्यावरण का यह विनाश मानव की सभ्यता का विनाश बनकर बढ़ता जा रहा है| अतः कवि समय रहते धरती की हरियाली, नदियों-झरनों की स्निग्धता , पक्षियों के आश्रयों को बचाने की गुहार लगा रहा है, क्योंकि पर्यावरण संरक्षण के साथ ही मानव का अस्तित्व जुड़ा हुआ है:-

“ उठते क्यूँ नहीं है यों
कि भर दें फिर से
धरती को
ठीक निर्झर
नदियों पहाड़ों
वन से |”

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि  वर्तमान में पर्यावरण प्रदूषण का संरक्षण ज्वलंत समस्याएं है| पूरा विश्व इन समस्याओं को लेकर चिंतित है| एक सजग एवं मानवताप्रिय साहित्यकार होने के नाते कवि अपनी प्रकृति एवं पर्यावरण के संरक्षण की कामना करता है तथा अपनी कविता के माध्यम से मानव की सुप्त चेतना को जागृत करने का प्रयास करता है|

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