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भवानी प्रसाद मिश्र द्वारा रचित कविता गीत-फ़रोश की विशेषताएं

‘गीत फ़रोश’ कविता भवानी प्रसाद मिश्र द्वारा रचित अत्यंत महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली कविता है| भवानी प्रसाद मिश्र हिन्दी के प्रसिद्ध कवि और गांधीवाद विचारक के रूप में प्रसिद्ध हैं| वे दूसरे ‘तारसप्तक’ के प्रमुख कवि हैं| वे श्रम के महत्त्व को अपनी कविताओं में प्रतिपादित करते हैं तथा श्रमशील व्यक्तियों का गुणगान करते हैं| उनके काव्य में सूक्ष्म से सूक्ष्म मनोभावों एवं जनमानस के विचारों को यथार्थ के धरातल पर पिरोया गया है| भवानी प्रसाद का काव्य कहीं व्यंग्य तो कहीं विद्रोह का स्वर स्पष्ट करता है| वे प्रकृति का सौम्य, सुंदर और सरस एवं सहज रूप प्रदर्शित करते है| वे अपने काव्य में राजनीति व सामाजिक परिवेश में फैली असमानताओं का व्यंग्यात्मक चित्रण प्रस्तुत करते हैं|

          ‘गीत फरोश’ कविता कवि की उस टीस को प्रकट करती है जहाँ कवियों ने अपनी काव्यात्मकता को फिल्म जगत के पूंजीवादी समाज को बेचा और जिनकी तीखी आलोचना हुई थी| भवानी प्रसाद मिश्र ने ‘गीत फरोश’ कविता में यही बताया है कि हम तो गीत बेच रहे हैं, लोगों ने तो अपना ईमान तक बेच दिया है| यह कविता वर्तमान समय में एक कवि, एक साहित्यकार की पीड़ा को दर्शाती है जो अपनी रचना, साधारण वस्तुओं की भांति बाजार में बेचने को विवश है|

 ‘गीत फरोश’ काव्य संग्रह 1935-47 तक के समाज, प्रकृति और सौंदर्यबोध की रचनाएँ संग्रहित है जो स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े किशोर मन की राष्ट्रीय भावनाओं को अभिव्यक्त करती है| कवि या साहित्यकार समाज का मार्गदर्शक होता है परंतु उसे संवेदनविहीन और साहित्य विमुख होते समाज में एक फेरीवाले की तरह अपने गीत बेचने पड़ रहे हैं| उसे अपनी आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु अपनी कलम की बोली लगानी पड़ती है| इस कविता की मूल संवेदना को निम्नलिखित बिंदुओं द्वारा स्पष्ट किया जा रहा है :-

(1) कवि की व्यक्तिगत पीड़ा की अभिव्यक्ति

  ‘गीत-फरोश’ कविता कवि के गहरे दुख और पीड़ा को अभिव्यक्त करती है| उसे गुणहीन लोगों के समक्ष अपनी कविता बेचने के लिए प्रस्तुत होना पड़ रहा है| कवि एक फेरीवाले की भाँति अपनी कविताओं की गठरी बाँधकर उन्हे बाजार में बेचने निकला है| वे स्वयं लिखते हैं, “गीतफरोश शीर्षक हँसाने वाली कविता मैंने बड़ी तकलीफ में लिखी थी| मुझे अपनी बहन की शादी करनी थी| पैसा मेरे पास था नहीं तो मैंने कलकत्ते में बन रही फिल्म के लिए गीत लिखे| लेकिन मुझे इस बात का दुख था कि  मैने पैसे लेकर गीत लिखे”

जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ|
मैं तरह-तरह के
गीत बेचता हूँ;
मैं सभी किसिम के गीत
बेचता हूँ|

(2) उपभोक्तावादी युग की विसंगतियाँ

कवि कहता है कि वर्तमान उपभोक्तावादी युग में हर वस्तु, यहाँ तक कि साहित्य भी भौतिक आवश्यकताओं के लिए ही खरीदा बेचा जाता है| कवि और साहित्यकार भी विवश होकर, बाजार की मांग के अनुरूप गीत लिखने को विवश है| कवि के अनुसार “मैं पैसे को कोई महत्त्व नहीं देता लेकिन पैसा बीच-बीच में अपना महत्त्व स्वयं प्रतिष्ठित कर लेता है”

“ जी, माल देखिए दाम बताऊँगा,
बेकाम नहीं है, काम बताऊँगा,
कुछ गीत लिखे हैं मस्ती में मैने
कुछ गीत लिखे हैं पस्ती में मैने
यह गीत, सख्त सरदर्द भुलायेगा;
यह गीत, पिया को पास बुलायेगा|

(3) व्यंग्यात्मकता

कवि, समाज की स्थिति पर करारा व्यंग्य करते हुए कहता है कि लोगों ने अर्थ की लालसा में अपना धैर्य और ईमान तक बिक्री के लिए बाजार में रख दिया है, वह तो अपना ईमान बचाने के लिए केवल अपने गीत बेच रहा है| व्यंग्य के साथ-साथ इस कविता में वस्तु की मार्मिक स्थिति का निरूपण भी किया गया है:-

जी पहले दिन कुछ शर्म लगी मुझको
पर पीछे-पीछे अक्ल जगी मुझको
जी लोगों ने तो बेच दिये ईमान
जी आप ना हों सुनकर
ज्यादा हैरान|
मैं सोच-समझकर आखिर
अपने गीत बेचता हूँ,
जी हाँ, हुजूर मैं गीत बेचता हूँ|

(4) समाज की साहित्यविमुखता

कवि इस कविता के माध्यम से स्पष्ट करता है की इस भौतिकवादी युग में साहित्य प्रेमी अब नहीं रहे, साहित्य के भोक्ता रह गए हैं जो साहित्य को भी अपनी जरूरत के अनुसार अन्य वस्तुओं की तरह आंकते और खरीदते हैं| मद्रास और बंबई में फिल्मों में गीत लिखते समय उन्हें ऐसा ही अनुभव हुआ होगा|

“ना, बुरा मानने की इस में क्या बात,
मैं पास रखे हूँ, कलम और दवात..
इनमें से भाए नहीं, नये लिख दूँ|
इन दिनों की दुहरा है कवि धंधा,
है दोनों चीजे व्यस्त, कलम,कंधा|”

(5) गाँधीवादी विचारधारा की अभिव्यक्ति

भवानी प्रसाद मिश्र गांधीवाद के अनुयायी हैं| उनकी इस कविता में गाँधीवादी विचारधारा की झलक देखने को मिलती है, जहाँ कवि पूर्ण परिश्रम से अपना कार्य करता है| वह परिस्थितियों से विवश होकर कोई गैर कानूनी या अवैध कार्य नहीं करता, अपनी आत्मा नहीं बेच रहा, अपने द्वारा उत्पादित गीत बेच रहा है जो गर्व का विषय है, लज्जा का नहीं| वह ग्राहकों की मनपसंद का पूर्ण ध्यान रख रहा है :-

“कुछ घंटे लिखने के, कुछ फेरी के
जी, दाम नहीं लूँगा इस देरी के
मैं नये पुराने सभी तरह के गीत
बेचता हूँ|”

(6) मानवीय संवेदना की अभिव्यक्ति

‘गीत-फरोश’ कविता मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति प्रस्तुत करता है| यहाँ किस्म किस्म के गीत है जो लोगों के सुख और दुख दोनों में काम आ सकते हैं| यह गीत जन्म से लेकर मरण तक सभी संस्कारों पर रचे गए हैं| यह सुबह से शाम तक की घड़ियों का विवरण देते हैं| कवि के शब्दों में,

यह गीत सुबह का है, जा कर देखें,
यह गीत गज़ब का है, ढा कर देखें,
यह गीत जरा सूने में लिखा था,
यह गीत वहाँ पुने में लिखा था|
यह गीत पहाड़ी पर चढ़ जाता है,
यह गीत बढ़ाए से बढ़ जाता है|

(7) मिश्रित भाषा

‘गीत-फरोश’ कविता की भाषा सरल, बोलचाल की मिश्रित भाषा है| इस भाषा का स्वर व्यंग्यात्मक एवं हास्यपूर्ण है| इसकी शैली संवादात्मक है| ऐसे लगता है कि फेरीवाला अपने सामने बैठे ग्राहकों से सीधे वार्तालाप कर रहा है| कवि के शब्दों में,

जी नहीं, दिल्लगी की इसमें क्या बात?
मैं लिखता ही तो रहता हूँ दिन रात|
तो तरह-तरह के बन जाते हैं गीत|
जी रूठ रूठ कर मन जाते हैं गीत|
जी बहुत ढेर लगाया हटाता हूँ,
ग्राहक की मर्जी- अच्छा जाता हूँ|

(8) कवि के स्वाभिमान और विवशता की अभिव्यक्ति

भवानी प्रसाद मिश्र एक कवि के स्वाभिमान और विवशता का चित्रण करते हैं| कवि का मानना है कि आदमी की जो साधना का विषय है वह उसकी आजीविका का विषय नहीं होना चाहिए| मैं कुछ लिखूँ, इसका पैसा मिल जाए, यह अलग बात है लेकिन कोई मुझसे कहे की इतने पैसे देता हूँ तुम गीत लिख दो| यह स्थिति मुझे नापसंद है| परंतु उन्होंने मजबूरी एवं आर्थिक विवशता के फलस्वरूप अपने गीत बेचे हैं जिनका जीवन  भर उन्हें मलाल रहेगा,

“है गीत बेचना वैसे बिल्कुल पाप;
क्या करूँ मगर लाचार हार कर
गीत बेचता हूँ
जी हाँ, हुजूर
मैं गीत बेचता हूँ|”

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि तकलीफ और बेबसी की पृष्ठभूमि मे लिखी गई ‘गीतफरोश’ कविता कवि के कर्म के प्रति समाज और स्वयं कव कि बदलते हुए दृष्टिकोण को उजागर करती है।

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