Categories
Unit 1 Lok Sahitya बी.ए. तृतीय वर्ष (DSE-1)

लोक नाटकों में स्वांग लोकनाट्य

‘स्वांग’ लोक नाट्य परंपरा का एक महत्वपूर्ण एवं मनोरंजक प्रकार है। भारत के उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा राज्य में स्वांग लोकनाट्य की परंपरा प्रसिद्ध है। लोकनाट्यों में प्रहसनात्मक, संगीत, नृत्य एवं अभिनय प्रधान नाटकों को स्वांग का नाम दिया गया है।स्वांग का अर्थ है नकल करना अथवा नाटक करना। Read More…..

Categories
Unit 1 Lok Sahitya बी.ए. तृतीय वर्ष (DSE-1)

लोकनाटक का अर्थ एवं विशेषताएं

लोक नाटक या लोकनाट्य लोक साहित्य की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा है लोक नाटकों का लोक जीवन से अत्यंत घनिष्ठ संबंध है। लोक नाटक दो शब्दों के योग से बना है ‘लोक’+’नाटक’। जब कोई कृति नाट्य रूप में कथावृत को प्रस्तुत करती है उसे नाटक कहा जाता है परंतु जब जनसमूह या लोक द्वारा अपनाई गई […]

Categories
Unit 1 Lok Sahitya बी.ए. तृतीय वर्ष (DSE-1)

ऋतुगीत

लोकगीतों का प्रकृति के साथ गहरा संबंध है। लोकगीतों का जन्म तब हुआ जब शहरी सभ्यता का विकास नहीं हुआ था और सामान्यतः लोग प्रकृति के प्रांगण में निर्द्वंद्व विचरण करते थे। भारतवर्ष में प्रकृति छह बार अपना रूप परिवर्तित करती है जिससे ऋतु की संज्ञा दी जाती है। यहाँ छह ऋतुओं में ग्रीष्म, वर्षा, […]

Categories
Unit 1 Lok Sahitya बी.ए. तृतीय वर्ष (DSE-1)

व्रत गीत

विभिन्न पर्व-त्योहारों पर व्रत-अनुष्ठान करने की परंपरा भारतीय संस्कृति का मूल आधार है। इन अवसरों देवी-देवताओं की स्तुति की जाती है। भारतीय जनमानस में सदा से धर्म फलता फूलता रहा है। जो समस्त ब्रह्मांड को धारण करें वही धर्म है। महर्षि व्यास ने कहा कि जो धारण करने की योग्यता रखता है वही धर्म है। […]

Categories
Unit 1 Lok Sahitya बी.ए. तृतीय वर्ष (DSE-1)

संस्कार गीत

संस्कार गीत लोक गीतों का अभिन्न अंग है। लोकगीत मानवीय मन की सहज अभिव्यक्ति होते हैं। यह साधारण समाज के बहुसंख्यक वर्ग के मनोभावों की अभिव्यक्ति है। लोकगीत अंग्रेजी की फोक सॉन्ग का पर्याय माना जाता है। सामान्यतः फोक का अर्थ सभ्यता से दूर रहने वाली जाति से लिया जाता है। किंतु हिंदी के लोक […]

Categories
Unit 1 Lok Sahitya बी.ए. तृतीय वर्ष (DSE-1)

लोक साहित्य के प्रकार

लोक साहित्य किसी भी समाज वर्ग या समूह के सामूहिक जीवन का दर्पण होता है।इसमें किसी व्यक्ति विशेष का चिंतन मानव विवेचन विश्लेषण नहीं होता बल्कि सामूहिक चेतना अनुभवों, संवेदनाओं की अभिव्यक्ति रहती है। किसी भी समाज के इतिहास और संस्कृति को भली-भांति समझने के लिए लोक साहित्य का अध्ययन आवश्यक है। लोक साहित्य में […]

Categories
Unit 1 Lok Sahitya बी.ए. तृतीय वर्ष (DSE-1)

लोक साहित्य का महत्त्व

मानव को अनुरंजित व आनंदित करने वाले लोक साहित्य की परम्पराएँ प्रत्येक देश व समाज में पाई जाती हैं। लोक साहित्य द्वारा ही युग -युग की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक परिस्थितियों का परिचय मिलता है। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक तथा एक समुदाय से दूसरे समुदाय तक पहुंचने वाले लोक साहित्य की परम्पराएँ […]

Categories
Unit 1 Lok Sahitya बी.ए. तृतीय वर्ष (DSE-1)

लोक साहित्य के संकलन एवं संरक्षण में आने वाली कठिनाईयां

मनुष्य सामाजिक प्राणी है। जो उसने देखा, महससु किया उसे कविता में विरोया। इसी प्रकार साहित्य का जन्म हुआ। मोटे तौर पर साहित्य के दो प्रकार होते हैं-एक शिष्ट-सुसंस्कृत साहित्य जो शिक्षित लोगों से रचित होता है और लिपिबद्ध होता है उसे शिष्ट साहित्य या परिनिष्ठित साहित्य कहा जाता है। दूसरा साहित्य वह है जो […]

Categories
Unit 1 Lok Sahitya बी.ए. तृतीय वर्ष (DSE-1)

लोक साहित्य के अध्ययन की प्रक्रिया

 लोक साहित्य जनमानस की उपज है। इसमें लोक का मानस, लोक जीवन और लोक का भाव जगत् स्पष्ट रुप से परिलक्षित होता है। लोक साहित्य लोक संस्कृति का अभिन्न अंग है। इसका अध्ययन करने के लिए लोक संस्कृति के प्रत्येक पहलु को समझना आवश्यक है। जब हम किसी समाज की लोक-संस्कृति का अध्ययन करते है […]

Categories
Unit 1 Lok Sahitya बी.ए. तृतीय वर्ष (DSE-1)

लोक साहित्य का अध्ययन करने वाले विभिन्न विद्वानों का परिचय

लोक साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यहां मौखिक रूप में उपलब्ध है।  पिछले अनेक वर्षों में अनेक विद्वान लोक साहित्य को लिखित रूप में लाने के लिए प्रयास कर रहे हैं।  अनेक विद्वानों ने न केवल लोक साहित्य विषयक आलोचना की है अपितु देश भर में बिखरे पड़े लोक साहित्य को संकलित […]