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सूरदास का जीवन परिचय एवं काव्यगत विशेषताएँ

हिंदी के कृष्ण भक्त कवियों में सूरदास का स्थान सर्वोपरि है।सूरदास का जन्म 1478 ई० में रुनकता नामक गाँव में हुआ। यह गाँव मथुरा-आगरा मार्ग के किनारे स्थित है। कुछ विद्वानों का मत है कि सूर का जन्म सीही नामक ग्राम में एक निर्धन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। सूरदास नेत्रहीन थे यह तो […]

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मलिक मोहम्मद जायसी का जीवन परिचय और काव्यगत विशेषताएँ

मलिक मोहम्मद जायसी हिन्दी साहित्य के भक्ति काल की निर्गुण प्रेमाश्रयी धारा के प्रतिनिधि कवि हैं। वे अत्यंत उच्च कोटि के सरल और उदार सूफ़ी महात्मा थे। हिंदी साहित्य में तुलसीदास और सूरदास के समान ही उनका पर्याप्त महत्त्व है। वे प्रेम की पीर के कवि माने जाते हैं। जायसी के जन्म के संबंध में […]

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सूफी काव्य की प्रमुख विशेषताएं

हिंदी साहित्य में निर्गुण काव्यधारा दो शाखाओं में विभाजित हुई- संत काव्य धारा और सूफी काव्य धारा। सूफी काव्य परंपरा हिंदी साहित्य के भक्ति काल की एक प्रमुख काव्य परंपरा है। भारत के मध्य युग के इतिहास में जहां संत कवियों ने भक्ति के साधारण मार्ग की प्रतिष्ठा की और ईश्वर को ज्ञान और प्रेम […]

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सूफी काव्य धारा एवं प्रमुख सूफी कवि

हिंदी साहित्य में निर्गुण काव्यधारा दो शाखाओं में विभाजित हुई- संत काव्य धारा और सूफी काव्य धारा। सूफी काव्य परंपरा हिंदी साहित्य के भक्ति काल की एक प्रमुख काव्य परंपरा है। भारत के मध्य युग के इतिहास में जहां संत कवियों ने भक्ति के साधारण मार्ग की प्रतिष्ठा की और ईश्वर को ज्ञान और प्रेम […]

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कबीरदास का जीवन परिचय एवं काव्यगत विशेषताएँ

हिंदी साहित्य के इतिहास को चार भागों में विभाजित किया गया है- आदिकाल, भक्ति काल,  रीति काल और आधुनिक  काल। आदिकाल साहित्य का आरंभिक काल था तो वही भक्ति काल को हिंदी साहित्य के स्वर्ण युग की संज्ञा दी गई है।  भक्ति काल में दो काव्य धाराएँ विकसित हुई-  निर्गुण काव्यधारा और सगुण काव्य धारा।  […]

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संत काव्यधारा की विशेषताएँ

हिंदी साहित्य के भक्ति काल में निर्गुण और सगुण दो काव्य धाराएं विकसित हुई। निर्गुण काव्यधारा की दो शाखाओं में विभाजित किया गया संत काव्य धारा तथा सूफी काव्य धारा। संत काव्य धारा को ज्ञानमार्गी या ज्ञानाश्रयी शाखा भी कहा जाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने निर्गुण संत काव्य धारा को निर्गुण ज्ञानाश्रयी शाखा नाम […]

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संत काव्यधारा एवं प्रमुख कवि

हिंदी साहित्य के भक्ति काल में निर्गुण और सगुण दो काव्य धाराएं विकसित हुई। निर्गुण काव्यधारा की दो शाखाओं में विभाजित किया गया संत काव्य धारा तथा सूफी काव्य धारा। संत काव्य धारा को ज्ञानमार्गी या ज्ञानाश्रयी शाखा भी कहा जाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने निर्गुण संत काव्य धारा को निर्गुण ज्ञानाश्रयी शाखा नाम […]

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भक्तिकाल की प्रमुख काव्यधाराएं

हिंदी साहित्य के मध्यकाल को दो भागों में विभाजित किया गया है-पूर्व मध्यकाल तथा उत्तर मध्यकाल। पूर्व मध्यकाल को भक्तिकाल तथा उत्तर मध्यकाल को रीतिकाल कहा गया है। भक्तिकाल हिंदी साहित्य का सर्वश्रेष्ठ युग है जिसे विद्वानों ने स्वर्ण युग की संज्ञा दी गई है। भक्ति काल की समय सीमा संवत 1375 से लेकर संवत […]

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भक्ति आंदोलन के प्रमुख कारण

प्राचीन काल से ही मनुष्य को मोक्ष प्राप्ति के लिए तीन मार्गों का ज्ञान दिया गया है। यह मार्ग है कर्म मार्ग, ज्ञान मार्ग और भक्ति मार्ग। धर्म और ज्ञान का अनुसरण ही भक्ति मार्ग का प्रतीक है। भक्ति का अस्तित्व भारत में प्राचीन काल से ही है। अपने आराध्य देव के प्रति श्रद्धा एवं […]

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भक्ति काल की परिस्थितियां

हिंदी साहित्य के काल विभाजन में दूसरे काल को भक्ति काल की संज्ञा दी गई है। भक्ति काल का समय संवत 1375 से लेकर सवत 1700 तक निर्धारित किया गया है। साहित्य समाज की उपज होता है और समाज से कटकर साहित्य की कोई उपयोगिता नहीं रहती। साहित्यकार स्वयं भी समाज की उपज होता है […]