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बी.ए. द्वितीय वर्ष (अनिवार्य हिंदी)

घनानंद का जीवन परिचय और विशेषताएं

 हिंदी साहित्य के रीतिकाल में तीन काव्य धाराएं प्रचलित हुई-  रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त। घनानंद रीतिमुक्त काव्य धारा के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं।  घनानंद का जन्म संवत् 1730 ईस्वी में तथा मृत्यु संवत् 1817 ईस्वी में स्वीकार की गई है। घनानंद जाति से कायस्थ थे। घनानंद के लगभग 22 नाम प्राप्त हुए हैं जैसे कि आनंद घन,  घन आनंद, आनंद पयोद, घनानंद, सच्चिदानंद घन आदि। इनकी शिक्षा फारसी भाषा के द्वारा शुरू हुई थी।  जनश्रुति के आधार पर अबुल फजल इनके गुरु माने जाते हैं। इन्होंने अपनी असाधारण प्रतिभा एवं बुद्धि से शीघ्र ही फारसी का अच्छा ज्ञान अर्जित कर लिया। इसी प्रतिभा के कारण घनानंद दिल्ली के शासक मोहम्मद शाह रंगीला के मीर मुंशी अथवा खास कलम के पद पर रहे थे।  घनानंद को काव्य लेखन और संगीत का अद्भुत ज्ञान था।  घनानंद के बारे में यह प्रसंग प्रसिद्ध है कि यह मोहम्मद शाह रंगीला के दरबार में नृत्य करने वाली सुजान से बेहद प्रेम करते थे। शीघ्र पदोन्नति के कारण अन्य दरबारी उनसे ईर्ष्या करने लगे थे।  अतः एक दिन दरबारियों ने षड्यंत्र करके बादशाह से यह कहा कि घनानंद भले ही उनका मीर मुंशी है परंतु उनके कहने से अपनी कविताएं गाकर नहीं सुनाएगा हाँ अगर सुजान कहेगी तो वह कुछ भी कर सकता है।  बादशाह ने जब दरबार में घनानंद को गाना गाने के लिए कहा तो उसने इंकार कर दिया।  तभी सुजान ने उनसे गाने का निवेदन किया तो वे सुजान की ओर मुंह तथा बादशाह की ओर पीठ करके गाने लगे।  इस पर बादशाह क्रोधित हो गए और घनानंद को देश निकाला दे दिया।  घनानंद महल छोड़ते हुए सुजान से आग्रह किया कि वह भी उसके साथ चले परंतु सुजान महलों का सुख और ऐश्वर्या छोड़ कर उसके साथ जाने को तैयार नहीं हुई।  इस पर घनानंद का ह्रदय टूट गया और वह विरक्त होकर मथुरा में आ बसे।  धीरे-धीरे उनका सुजान प्रेम कृष्ण प्रेम में परिवर्तित हो गया और वह वृंदावन जाकर बस गए।  सुजान के प्रति उनकी आसक्ति राधा-कृष्ण भक्ति में बदल गई और  वे आजीवन  इसी भक्ति में लीन रहे। घनानंद के काव्य में सुजान शब्द का प्रयोग बार बार हुआ है जिसका अर्थ उनकी प्रेमिका सुजान के रूप में तथा प्रिय, चतुर, नागर कृष्ण के रूप में भी किया जाता है। घनानंद की मृत्यु के बारे में विद्वानों के दो प्रसिद्ध हैं-   एक मत के अनुसार घनानंद नादिरशाह के आक्रमण के समय मथुरा में सैनिकों द्वारा मारे गए  परंतु यह मत स्वीकार नहीं हुआ।  दूसरा मत यह है कि संवत 1817 ई. में अब्दुल शाह अब्दाली ने मथुरा पर आक्रमण किया और इसी आक्रमण में घनानंद की मृत्यु हुई।

घनानंद की रचनाएँः

घनानंद की कविताओं को ब्रजनाथ नामक व्यक्ति नें घनानंद कवित्त के नाम से संग्रहित किया था। घनानंद के नाम से लगभग 40 रचनाएँ  प्रचलित है जिनमें अधिकांश कवित्त और सवैये है।  इन रचनाओं में  इश्क लता, यमुना यश,  प्रेम पत्रिका,  प्रेम पद्धति,  गोकुलगीत,   छंदाष्टक, नाम माधुरी आदि है। विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने सुजान हित और पदावली को घनानंद की प्रसिद्धि का आधार माना है।

घनानंद के काव्य की विशेषताएं निम्नलिखित हैं-

घनानंद की रीतिकाल की स्वच्छंद काव्य धारा के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। घनानंद ने उत्कृष्ट प्रेम का जो चित्रण किया है वह अपने आप में अनूठा है। उनका काव्य प्रेम की गूढ़ता से भरा हुआ है साथ ही उसमें विरह की जो व्याकुलता है वह लौकिकता और अलौकिता से भरी हुई है। रीतिकाल के अन्य कवियों की तरह घनानंद का काव्य मात्र कल्पना का प्रतिबंध नहीं है अपितु उन्होंने जो कुछ भी रचा वह उनकी आत्मानुभूति पर आधारित है। विद्वानों ने उन्हें प्रेम की पीर का उन्मुक्त गायक कहा है। घनानंद का भाव पक्ष के साथ-साथ भाषा पर भी पूर्ण अधिकार था। वे सचमुच भाव और कला के धनी थे। उनके काव्य की विशेषताएं इस प्रकार है

1- श्रृंगारिक कवि:

रीतिकाल के अन्य कवियों की तरह घनानंद  भी शृंगार प्रेमी थे, परतु उनका श्रृंगार वर्णन  मर्यादित था। उन्होंने श्रृंगार के संयोग और वियोग दोनों भेदो का चित्रण किया है। संयोग का चित्रण वियोग की अपेक्षा कम मात्रा में हुआ है।  संयोग श्रृंगार के अंतर्गत कवि ने नायिका के रूप सौंदर्य का चित्रण किया है, वहीं वियोग श्रृंगार में अपने अनुभूति पूर्ण प्रेम को अभिव्यक्ति दी है। उन्होंने हृदय में उमड़ती हुई तथा रोम-रोम में समाई हुई व्यथा का यथार्थ वर्णन किया है।  उनके श्रृंगार वर्णन का एक उदाहरण देखिए :

झलके अति सुंदर आनन गौर, छके दृग राजती काननी छवे
हंसी बोलनि में छवि फूलन की वर्षा, उर उपर जाती है ह्वे
लट लोल कलोल कपोल करे, कल कंठ बनी जलजावलि द्वे
अंग-अंग तरंग उठे दुति की, परि है मनो रूप अबे धरि च्वे

2- प्रेम की पीर के कवि:

घनानंद को  विद्वानों ने  प्रेम की पीर का कवि माना  है। प्रेम की पीड़ा की तीव्र अनुभूति इनकी कविता में विचित्रता तथा इनकी अभिव्यक्ति में विलक्षणता उत्पन्न करती है।इनकी पीड़ा ऐसी है जो एक सीमा के बाद शब्दातीत हो जाती है इसलिए इनकी कविता में एक प्रकार का मौन है; बहुत  कुछ अनकहा रह जाता  है। परन्तु यह मौन, यह बहुत कुछ अनकहा ही हमें सब कुछ कह जाता है। घनानंद स्वयं अपने प्रिय को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि मैं तुमसे कितना प्रेम करता हूँ यह शब्दों में कैसे व्यक्त करूँ? नहीं कर सकता तथा  करने की आवश्यकता भी नहीं क्योंकि तुम  ‘सुजान’ हो। कुछ भी कह सकने में असमर्थ और चातक की भाँति बादल की ओर दृष्टि लगाये प्रिया का ध्यान सारे संसार से हटकर प्रिय की ओर ही लगा हुआ है। –

“मन जैसे कछू तुम्हें चाहत है सु-बखनीयै कैसे सुजान ही हौ।
इन प्राननि एक सदा गति रावरे, बावरे लौं लगियै नित लौ।
बुधि और सुधि नैननि बैननि मैं करिबास निरंतर अंतर गौ।
उधरौ जग चाय रहे घनआनंद चातिक त्यौं तकिये अब तो।।

3- लौकिक एवं अलौकिक प्रेम का समन्वय:

घनानंद के काव्य की दो पक्ष हैं-  लौकिक पक्ष जो सुजान प्रेम से जुड़ा है और दूसरा अलौकिक पक्ष जो कृष्ण भक्ति से सराबोर है। कृष्ण चंद्र वर्मा के अनुसार, “घनानंद का संपूर्ण काव्य जगत का चतुर्थांश या उससे भी कुछ कम अंश सुजान प्रेम संबंधित है,  शेष तीन चौथाई अंश राधा-कृष्ण प्रेम अथवा भक्ति भावना से ओतप्रोत है।” उन्होंने  प्रेम को ईश्वर का रूप माना है और यही धारणा लौकिक प्रेम को पवित्र अलौकिता में परिवर्तित करती है-

सोई घनानंद सुजान लगि हेत होत,
ऐसे मथि मन पै सरुप ठहरायौ है।
ताहि एक रस है विवस अवगा हैं दोऊ
नेसी हरि-राधा जिन्हें हेरे सर सायो है।

4- निश्छल प्रेम वर्णनः

घनानंद का प्रेम वर्णन उज्जवल एवं निश्छल है। उनकी दृष्टि में प्रेम का महत्व विराट है। वे मानते हैं कि उज्जवल प्रेम की राह सरल है। इसमें किसी तरह का छल-कपट नहीं होता। एक सच्चे प्रेमी को अपने प्रिय की शुभकामना के लिए अनेक तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। प्रेम मार्ग पर सच्चे  व निष्कपट व्यक्ति ही चल सकते हैं जिनका प्रेम किसी प्रकार के स्वार्थ के अधीन नहीं होता। प्रेम एक ऐसी धारणा है जो मनुष्य के जीवन को सार्थक बना देती है।  इस प्रकार  घनानंद का काव्य प्रेम की एकनिष्ठता की स्थापना करता है-

अति सुधो सनेह को मारग है, जहाँ नेक सयानप बांक नांहि।
जहाँ सांच चले तजि आपनुपौ, झझकै कपटि जै निसांक नांहि।

5- सौंदर्य प्रियताः

प्रेम और सौंदर्य का गहरा नाता है।  घनानंद ने रूप-सौंदर्य के अत्यंत मनोहारी चित्र प्रस्तुत किए हैं। सुजान के रूप-सौंदर्य, लज्जा, व्यवहार आदि का अत्यंत मार्मिकता के साथ अंकन किया है। एक उदाहरण देखिए-

लाजनि लपेटि चितवनि भेद-भाय भरी
लसति ललित लोल चख तिरछानि मैं।
छबि को सदन गोरो भाल बदन, रुचिर,
रस निचुरत मीठी मृदु मुसक्यानी मैं।

6- विरहानुभूतिः

नानंद का जीवन स्वयं विरह की आग में तपा है। अतः उनके काव्य का मूल स्वर विरहानुभूति है। घनानंद का प्रेम कोई घटना मात्र नहीं है।  उन्होंने अपनी प्रेमिका को अपने हृदय में स्थान दिया था अतः वह उसके वियोग को किस प्रकार सहन कर सकता था। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भी इस सन्दर्भ में लिखा है कि, “यद्यपि इन्होंने संयोग और वियोग दोनों पक्षों को लिया है, पर वियोग की अंतर्दशाओं की ओर इनकी दृष्टि अधिक है। इसी से इनके वियोग सम्बन्धी पक्ष ही प्रसिद्ध है।” इनकी विरह-वेदना में ऐसा ताप है जिसके ज़िक्र भर से जीभ में छालें पर जाए और न कहें तो ह्रदय विरह वेदना को कैसे सहे-

पहिले अपनाय सुजान सनेह सों क्यों फिरि तेहिकै तोरियै जू.
निरधार अधार है झार मंझार दई, गहि बाँह न बोरिये जू .
‘घनआनन्द’ अपने चातक कों गुन बाँधिकै मोह न छोरियै जू .
रसप्याय कै ज्याय,बढाए कै प्यास,बिसास मैं यों बिस धोरियै जू .

7- स्वानुभूति पर आधारित काव्य:

घनान्द की प्रेमानुभूति अद्भुत है, अद्वितीय है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनकी स्वभुक्त अनुभूति है न की किताबी अथवा सुनी-सुनाई। अर्थात उन्होने जो भी लिखा वह उन्होने स्वयं भोगा था। इनका पूर्ण काव्य इनके अपने जीवन की दास्तां प्रस्तुत करता है। इनका काव्य गहरी अनुभूतियों का काव्य है। इनकी अनुभूति कृत्रिम नहीं बल्कि स्वअर्जित अनुभवों से युक्त है। इसी संदर्भ में दिनकर लिखते हैं- “दूसरों के लिये किराए पर आँसू बहाने वालों के बीच यह एक ऐसा कवि है जो सचमुच अपनी पीड़ा में ही रो रहा हैं।”

एक उदाहरण देखिये-

हीन भएँ जल मीन अधीन कहा कछु मो अकुलानि समाने।
नीर सनेही कों लाय अलंक निरास ह्वै कायर त्यागत प्रानै।
प्रीति की रीति सु क्यों समुझै जड़ मीत के पानि परें कों प्रमानै।
या मन की जु दसा घनआनँद जीव की जीवनि जान ही जानै।।

8- ब्रजभाषा प्रवीण कविः

घनानंद ने अपने भावों को व्यक्त करने के लिए सरस एवं सरल ब्रजभाषा का प्रयोग। मन की ब्रजभाषा में सर्वत्र स्वच्छता एवं एकरुपता के दर्शन होते हैं। विद्वानों ने घनानंद को ब्रजभाषा का प्रवीण कवि कहा है।आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, “इनकी सी विशुद्ध सरस और शक्तिशाली ब्रजभाषा लिखने में और कोई कवि समर्थ नहीं हुआ विविधता के साथ-साथ इनकी भाषा में प्रौढ़ता और माधूर्य भी अपूर्व बन पड़े हैं यह नि:संकोच कहा जा सकता है कि भाषा पर जैसा अचूक अधिकार उनका था वैसा और किसी कवि का नहीं। उनके काव्य में अरबी-फारसी शब्दावली की भरमार मिलती है।

वहै मुसक्यानि, वहै मृदु बतरानि, वहै
लड़कीली बानि आनि उर मैं अरति है।
वहै गति लैन औ बजावनि ललित बैन,
वहै हँसि दैन, हियरा तें न टरति है।
वहै चतुराई सों चिताई चाहिबे की छबि,
वहै छैलताई न छिनक बिसरति है।
आनँदनिधान प्रानप्रीतम सुजानजू की,
सुधि सब भाँतिन सों बेसुधि करति है।।

9- रस, छंद एवं अलंकारः

घनानंद को रस की साक्षात मूर्ति माना गया है।  उनका प्रमुख श्रृंगार रस है जिसका उन्होंने अत्यंत रमणीय चित्रण किया है।  शब्द शक्तियों की दृष्टि से उन्होंने लक्षणा को अपनाया है। घनानंद के काव्य में सर्वत्र माधुर्य गुण विद्यमान है। अलंकारों की दृष्टि से अनुप्रास,  रूपक, उपमा, अतिशयोक्ति, श्लेष, उत्प्रेक्षा आदि का प्रयोग हुआ है।  कवित्त और सवैया घनानंद के प्रिय छंद है।

निष्कर्ष कहा कहा जा सकता है कि घनानंद के काव्य का भाव पक्ष जितना उत्कृष्ट है उसी के समान कला पक्ष भी श्रेष्ठ है। अनुभूति की सत्यता, वेदना की गहराई और व्यथा की कसक उनके काव्य का प्राण है, तो भावों के अनुरूप चलने वाली उनकी भाषा उनके कथ्य को और भी श्रेष्ठ बना देती है।  निःसंदेह घनानंद रीतिकाल के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं।

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