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बी. ए./बी. कॉम प्रथम वर्ष अनिवार्य हिन्दी

अनुवाद का महत्त्व

बीसवीं सदी को अनुवाद का युग कहा गया है। यद्यपि अनुवाद सबसे प्राचीन व्यवसाय या व्यवसायों में से एक कहलाता है तथापि उसे जो महत्त्व बीसवीं सदी में प्राप्त हुआ वह उससे पहले उसे नहीं मिला ऐसा माना जाता है। वर्तमान यग में अधिकतर राष्ट्रों में यदि एक भाषा प्रधान है तो एक या अधिक भाषाएँ गौण पद पर दिखाई देती हैं। दूसरे शब्दों में, एक ही राजनीतिक-प्रशासनिक इकाई की सीमा के अन्तर्गत भाषायी बहुसंख्यक भी रहते हैं और भाषायी अल्पसंख्यक भी। लोकतन्त्र में सब लोगों का प्रशासन में समान रूप से भाग लेने का अधिकार तभी सार्थक माना जाता है, जब उनके साथ उनकी भाषा के माध्यम से सम्पर्क किया जाए। इससे बहुभाषिकता की स्थिति उत्पन्न होती है और उसके संरक्षण की प्रक्रिया में अनुवाद कार्य का आश्रय लेना अनिवार्य हो जाता है।

इसके अतिरिक्त अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न राष्ट्रों के बीच राजनीतिक, आर्थिक, वैज्ञानिक और प्रौद्योगिक तथा साहित्यिक और सांस्कृतिक स्तर पर बढ़ते हुए आदान-प्रदान के कारण अनुवाद कार्य की अनिवार्यता और महत्ता की नई चेतना प्रबल रूप से विकसित होती हुई दिखती है। उत्तर-आधुनिक युग में अनुवाद की महत्ता व उपादेयता को विश्वभर में स्वीकारा जा चुका है। वैदिक युग के ‘पुन: कथन’ से लेकर आज के ‘ट्रांसलेशन’ तक आते-आते अनुवाद अपने स्वरूप और अर्थ में बदलाव लाने के साथ-साथ अपने बहुमुखी व बहुआयामी प्रयोजन को सिद्ध कर चुका है। प्राचीन काल में ‘स्वांत: सुखाय’ माना जाने वाला अनुवाद कर्म आज संगठित व्यवसाय का मुख्य आधार बन गया है।आज विश्वभर में अनुवाद की आवश्यकता जीवन के हर क्षेत्र में किसी-न-किसी रूप में अवश्य महसूस की जा रही है और इस तरह अनुवाद आज के जीवन की अनिवार्य आवश्यकता बन गया है।

बीसवीं शताब्दी के अवसान और इक्कीसवीं सदी के स्वागत के बीच आज जीवन का कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है जहाँ पर हम चिन्तन और व्यवहार के स्तर पर अनुवाद के आग्रही न हों। अनुवाद के महत्त्व को निम्नलिखित बिंदुओं द्वारा स्पष्ट किया जा रहा है-

विश्व संस्कृति में अनुवाद का महत्त्व

विश्व की सभ्यताओं और संस्कृतियों के विकास में अनुवाद की विशेष भूमिका रही है।यूनान मिश्र चीन आदि की प्राचीन सभ्यताओं से भारत का घनिष्ठ संबंध रहा है और इस संबंध में अनुवाद की विशेष महत्ता रही है। बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार समूचे एशिया में अनुवाद की जीवंत परंपरा का परिणाम है। विश्व भर में गीता तथा उपनिषद के ज्ञान का अनुवाद अपने ढंग से किया जाता रहा है। पंचतंत्र के लघु संग्रहों का अनुवाद अरबी तथा अन्य यूरोपीय भाषाओं में हुआ है। वास्तव में अनुवाद एक सांस्कृतिक सेतु का काम करता है। विश्व की विभिन्न संस्कृतियों को जानने व समझने में इसकी निश्चित रूप से भूमिका सिद्ध हो। विश्व की सांस्कृतिक एकता में इसका महत्वपूर्ण योगदान है। आज की भारतीय संस्कृति जिसे हम सामासिक संस्कृति कहते हैं उसके निर्माण में हजारों वर्षों के विभिन्न धर्मों, मतों एवं विश्वासों की साधना छिपी हुई है। इन सभी मतों एवं विश्वासों को आत्मसात कर जिस भारतीय संस्कृति का निर्माण हुआ है उसके पीछे अनुवाद की महत्त्वपूर्ण भूमिका असंदिग्ध है। अनुवाद एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा विभिन्न राष्ट्रों की सांस्कृतिक निधियां आज हमारे सामने हैं। अनुवाद के माध्यम से ही हम एक दूसरे की सांस्कृतिक विरासत के भागीदार बनें हैं।

साहित्य के क्षेत्र में अनुवाद का महत्व

साहित्य के अनुवाद का इतिहास काफी प्राचीन है।अनुवाद ने ना केवल विभिन्न साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है बल्कि भाषा के विकास में भी इसके योगदान को नकारा नहीं जा सकता।विश्व के विभिन्न साहित्य के बीच जो परस्पर आदान-प्रदान हुआ वह अधिकांशतः अनुवाद के माध्यम से ही हुआ है।इसके माध्यम से अन्य भाषाओं के साहित्य का अध्ययन करने से जिन नहीं अभी व्यक्तियों संवेदनाएं विचारधाराओं जीवना अनुभूतियों और साहित्य शैलियों का परिचय मिलता है वह हमारे जीवन के साथ-साथ हमारी चिंतन शक्ति और साहित्य सृजना को भी प्रभावित करती हैं। विभिन्न भाषाओं के साहित्य के तुलनात्मक अध्ययन में भी अनुवाद से काफी सहायता मिली है। ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में साहित्य के अध्ययन में अनुवाद का महत्त्व आज व्यापक हो गया है। साहित्य यदि जीवन और समाज के यथार्थ को प्रस्तुत करता है तो विभिन्न भाषाओं के साहित्य के सामूहिक अध्ययन से किसी भी समाज, देश या विश्व की चिन्तन-धारा एवं संस्कृति की जानकारी मिलती है। अनुवाद का महत्त्व निम्नलिखित साहित्यों के अध्ययन में सहायक है-

  1. भारतीय साहित्य का अध्ययन।
  2. अन्तर्राष्ट्रीय साहित्य का अध्ययन।
  3. तुलनात्मक साहित्य का अध्ययन।

भारतीय साहित्य के अध्ययन से यह पता चलता है कि विभिन्न साहित्यक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक आन्दोलनों में हिन्दी एवं हिन्दीतर भाषा के साहित्यकारों का स्वर प्राय: एक जैसा रहा है। मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन, स्वतन्त्रता आन्दोलन तथा नक्सलबाड़ी आन्दोलनों को प्राय: सभी भारतीय भाषाओं के साहित्य में अभिव्यक्ति मिली है।  

अन्तर्राष्ट्रीय साहित्य के अनुवाद से ही यह तथ्य प्रकाश में आया कि दुनिया के विभिन्न भाषाओं में लिखे गए साहित्य में ज्ञान का विपुल भण्डार छिपा हुआ है। भारत में अन्तर्राष्ट्रीय साहित्य का अनुवाद तो भारत में सूफियों के दार्शनिक सिद्धान्तों के प्रचलन के साथ ही शुरू हो गया था; किन्तु इसे व्यवस्थित स्वरूप आधुनिक युग में ही प्राप्त हुआ। शेक्सपियर, डी.एच. लॉरेंस, मोपासाँ तथा सार्त्र जैसे चिन्तकों की रचनाओं के अनुवाद से भारतीय जनमानस का साक्षात्कार हुआ एवं कालिदास, रवीन्द्रनाथ टैगोर एवं प्रेमचन्द की रचनाओं से विश्व प्रभावित हुआ। 

दुनिया के विभिन्न भाषाओं के अनुवाद द्वारा ही तुलनात्मक साहित्य के अध्ययन में सहायता मिलती है। तुलनात्मक साहित्य द्वारा इस बात का पता लगाया जाता है कि देश, काल और समय की भिन्नता के बावजूद विभिन्न भाषाओं के रचनाकारों के साहित्य में साम्य और वैषम्य क्यों है ? अनुवाद के द्वारा ही जो तुलनीय है वह तुलनात्मक अध्ययन का विषय बनता है। प्रेमचन्द और गोर्की, निराला और इलियट तथा राजकमल चौधरी एवं मोपासाँ के साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन अनुवाद के फलस्वरूप ही सम्भव हो सका।

ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में अनुवाद का महत्व

संवाद का महत्वपूर्ण योगदान ज्ञान विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में मिलता है।अनुवाद से मिलने वाले ज्ञान ने मनुष्य के समाजशास्त्र को एक देश की सीमा से निकाल कर दूसरे देश तक पहुंचाया है। संस्कृत और यूनानी साहित्य कला और दर्शन के प्रचार-प्रसार का श्रेय अनुवाद को ही जाता है।आधुनिक नवजागरण काल में पश्चिम के नए ज्ञान विज्ञान से हमारे ज्ञान और चेतना के विकास में अनुवाद ही सबसे बड़ा सहारा बना है। विश्व के सभी विकसित देशों की राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, वैज्ञानिक तथा प्रौद्योगिकीपरक विकास में अनुवाद की उल्लेखनीय भूमिका रही है। आज विज्ञान के तेजी से बदलते हुए विश्व में प्रौद्योगिकी चिकित्सा कृषि आदि के क्षेत्र में हो रहे नए नए अविष्कारों और अनुसंधान हमसे जुड़े रहने के लिए अनुवाद सबसे बड़ा साधन है।

व्यावसायिक क्षेत्र में अनुवाद की भूमिका

वर्तमान युग में अनुवाद ज्ञान की ऐसी शाखा के रूप में विकसित हुआ है जहाँ इज्जत, शोहरत एवं पैसा तीनों हैं। आज अनुवादक दूसरे दर्जे का साहित्यकार नहीं बल्कि उसकी अपनी मौलिक पहचान है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में तेजी से हुए विकास के साथ भारतीय परिदृश्य में कृषि, उद्योग, चिकित्सा, अभियान्त्रिकी और व्यापार के क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुआ है। इन क्षेत्रों में प्रयुक्त तकनीकी शब्दावली का भारतीयकरण कर इन्हें लोकोन्मुख करने में अनुवाद की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। बीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध रोजगार के क्षेत्र में अनुवाद को महत्त्वपूर्ण पद पर आसीन करता है। संविधान में हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिए जाने के पश्चात् केन्द्र सरकार के कार्यालयों, सार्वजनिक उपक्रमों, संस्थानों और प्रतिष्ठानों में राजभाषा प्रभाग की स्थापना हुई जहाँ अनुवाद कार्य में प्रशिक्षित हिन्दी अनुवादक एवं हिन्दी अधिकारी कार्य करते हैं। आज रोजगार के क्षेत्र में अनुवाद सबसे आगे है। प्रति सप्ताह अनुवाद से सम्बन्धित जितने पद यहाँ विज्ञापित होते हैं अन्य किसी भी क्षेत्र में नहीं।

व्यापारिक क्षेत्र में अनुवाद का महत्व

प्राचीन काल से ही अनुवाद देश-विदेश में वाणिज्य और व्यापार के क्षेत्र में अत्यंत उपयोगी रहा है।प्राचीन काल से ही भारत और चीन और यूरोप में व्यापारी लोग अपने व्यापार के लिए देश-विदेश जाया करते थे और अनुवाद के सहारे ही व्यापार और वाणिज्य करते थे।वर्तमान समय में भी व्यापारी अपने उत्पादों और वस्तुओं की गुणवत्ता और उनके उत्तर विक्रय के संवर्धन के लिए अनुवाद का ही सहारा लेते हैं। विश्व स्तर पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों की पैठ अनुवाद के सहारे ही जम पाई है।इसके अतिरिक्त अंतरराष्ट्रीय बाजार में उत्पादों और माल को खपाने की प्रतिस्पर्धा में तथा आगे बढ़ने के लिए भी अनुवाद का महत्व बढ़ जाता है। विज्ञापन और पर्यटन के क्षेत्र में अनुवाद की बढ़ती भूमिका  व्यापारिक विकास में अनुवाद के महत्त्व का सबसे बड़ा उदाहरण है।

राष्ट्रीय एकता के विकास में अनुवाद का महत्व

भारत जैसे विशाल राष्ट्र की एकता के प्रसंग मे अनुवाद की आवश्यकता असंदिग्ध है। भारत की भौगोलिक सीमाएँ न केवल कश्मीर से कन्याकुमारी तक बिखरी हुई हैं बल्कि इस विशाल भूखण्ड में विभिन्न विश्वासों एवं सम्प्रदायों के लोग रहते हैं जिनकी भाषाएँ एंव बोलियाँ एक दूसरे से भिन्न हैं। भारत की अनेकता में एकता इन्हीें अर्थों में है कि विभिन्न भाषाओं, विभिन्न जातियों, विभिन्न सम्प्रदायों एवं विभिन्न विश्वासों के देश में भावात्मक एवं राष्ट्रीय एकता कहीं भी बाधित नहीं होती। एक समय में महाराष्ट्र का जो व्यक्ति सोचता है वही हिमाचल का निवासी भी चिन्तन करता है। भारत के हजारों वर्षों के अद्यतन इतिहास चिन्तन ने इस धारणा को पुष्ट किया है कि मध्ययुगीन भक्ति आन्दोलन से लेकर आज के प्रगतिशील आन्दोलन तक भारतीय साहित्य की दिशा एक रही है। यह बात अनुवाद के द्वारा ही सम्भव हो सकी कि जिस समय गोस्वामी तुलसीदास राम के चरित्र पर महाकाव्य लिख रहे थे, हिन्दी के समानान्तर ओड़िआ में बलराम, बांग्ला में कृत्तिवास, तेलुगु में पोतना, तमिल में कम्बन तथा हरियाणवी में अहमदबख्श अपने-अपने साहित्य में राम के चरित्र को नया रूप दे रहे थे। स्वतंत्रता आन्दोलन में जिस साम्राज्यवाद और सामन्तवाद के विरोध की चिंगारी सुलगी थी उसका उत्कर्ष छायावादी दौर की विभिन्न भारतीय भाषाओं की कविता में मिलता है।

मीडिया और सिनेमा के क्षेत्र में अनुवाद का महत्त्व

कोई भी समाचारपत्र, रेडिया व टीवी चैनल ऐसा नहीं है, जिसमें हमें अनुवाद की जरुरत महसूस न होती है। सिनेमा भी अनुवाद का सहारा लेकर बुलंदियों को छू रहा है। टाइटेनिक फिल्म इसका बहुत बड़ा उदाहरण है। अनुवाद को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने नेशनल ट्रासलेशन मिशन का गठन किया है।मीडिया के सभी क्षेत्रों में चाहे वह हिंदी/अंग्रेजी/भारतीय भाषा के समाचार हों चा चैनल हों, सभी जगह अनुवाद अहम भूमिका निभाता है। अंग्रेजी अखबारों के संवाददाताओं को भी समाचार-संकलन के दौरान, साक्षात्कार करते या भाषण की रिपोर्ट करते हुए, दुर्घटना स्थल में जाकर स्टोरी बनाते हुए कई बार अनुवाद का सहारा लेना पड़ता है। संवाददाताओं से लेकर संपादक तक सभी को किसी न किसी स्तर में अनुवाद करना ही पड़ता है। सफल पत्रकर बनने के लिए पत्रकारिता के साथ अनुवाद में दक्ष होना आवश्यक है। फिल्मों की कई भाषाओं में डबिंग अनुवाद के द्वारा ही होती है। गरज यह कि मीडिया का काम अनुवाद के बिना नहीं चह सकता। मीडिया की तरह अनुवाद भी सर्वव्यापी है और दोनों में गहरा अंत-संबंध है।

डबिंग के क्षेत्र में अनुवाद का महत्त्व

डबिंग एक भाषा से दूसरी भाषा में किए गए अनुवाद को दर्शकों तक पहुँचाने का माध्यम है। आज डबिंग का महत्व मनोरंजन के हर क्षेत्र में दिखाई दे रहा है, चाहे वह कार्टून फिल्म हो, ऐनिमेशन फिल्म हो, फीचर फिल्म हो या कुछ और किपलिंग की पुस्तक ‘जंगल बुक’ का मोगली ‘जंगल- जंगल बात चली है, चड्डी पहन के फूल खिला है’ हिंदी में गाते हुए बच्चों के समक्ष टेलीविजन पर आता था तब वे टेलीविजन से ऐसे चिपक जाते थे कि उन्हें अपनी मुंह मांगी हुई कोई वस्तु मिल गई हो। यहीं  प्रमाद आज बच्चों को ‘डोरेमन’, ‘सिनचॉन’ ,बार्बी, ‘निंजा हथौड़ी’  ‘ऑगी एंड काकरोच, ‘टोम एंड जेरी’ ‘छोटा भीम’ जैसे अन्य कार्टून फिल्म या एनिमेशन फिल्म देखकर मिलता है। इसी तरह जापान में बनी ‘रामायण’ और अंग्रेजी में बनी ‘अलादीन’ को बच्चे अपनी भाषा में देखकर गौरवान्वित महसूस करते हैं। डबिंग के माध्यम से ही डिस्कवरी और नेशनल ज्योग्राफिक चैनलों की पहुँच भारत के कोने-कोने में है। पिछले  कुछ वर्षों से हिंदी में अंग्रेजी से डब की गई अनेक फिल्में प्रदर्शित हुई है। यही नहीं दक्षिण भारतीय भाषाओं में बनी फिल्में आज प्रत्येक टी.वी. चैनल में भारतीय भाषाओं में देखी जा सकती है।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि अनुवाद विश्व-संस्कृति, विश्व-बंधुत्व, एकता और समरसता स्थापित करने का एक ऐसा सेतु है जिसके माध्यम से विश्व ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में क्षेत्रीयतावाद के संकुचित एवं सीमित दायरे से बाहर निकल कर मानवीय एवं भावात्मक एकता के केन्द्र बिन्दु तक पहुँच सकता है और यही अनुवाद की आवश्यकता और उपयोगिता का सशस्त एवं प्रत्यक्ष प्रमाण है।बीसवीं शताब्दी में देशों के बीच की दूरियाँ कम होने के परिणामस्वरूप विभिन्न वैचारिक धरातलों और आर्थिक, औद्योगिक स्तरों पर पारस्परिक भाषिक विनिमय बढ़ा है और इस विनिमय के साथ-साथ अनुवाद का प्रयोग और अधिक किया जाने लगा है। आज के वैज्ञानिक युग में अनुवाद बहुत महत्त्वपूर्ण हो गया है। यदि हमें दूसरे देशों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना है तो हमें उनके यहाँ विज्ञान के क्षेत्र में, सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में हुई प्रगति की जानकारी होनी चाहिए और यह जानकारी हमें अनुवाद के माध्यम से मिलती है।संचार माध्यमों में गतिशीलता बढ़ाने का कार्य अनुवाद द्वारा ही सम्भव हो सका है तथा गाँव से लेकर महानगरों तक जो भी अद्यतन सूचनाएँ हैं वे अनुवाद के माध्यम से एक साथ सबों तक पहुँच रही हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि अनुवाद ने आज पूरे विश्व को एक सूत्र में पिरो दिया है।

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