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बी.ए. प्रथम वर्ष (DSC-1)

कृष्ण काव्य धारा का परिचय एवं काव्यगत विशेषताएं

भारतीय धर्म साधना संस्कृति साहित्य तथा कलाएं कृष्ण के विलक्षण व्यक्तित्व से जिस रूप में प्रभावित हैं उतने वे किसी अन्य चरित्र से नहीं। कृष्ण आख्यान की परंपरा अत्यंत प्राचीन है जो कि भारतीय साहित्य में विविध रूपों में उपलब्ध होती है।  वैदिक तथा संस्कृत साहित्य में कृष्ण के तीन रूप मिलते हैं ऋषि एवं धर्म उपदेशक,  नीति विशारद क्षत्रिय राजा,  बाल और किशोर रूप में विभिन्न प्रकार की अलौकिक तथा अलौकिक लीलाकारी अवतार पुरुष के रूप में। 

प्रथम रूप का विकास भागवत गीता में दूसरे का महाभारत में तथा तीसरे का पुराण  ग्रंथों में मिलता है। भारतीय साहित्य और संगीत धर्म और अध्यात्म संस्कृति और सभ्यता कृष्ण के चरित्र से अद्वितीय रूप में प्रभावित हुई है।  महाभारत में अनेक ऐसे स्थल देखे जा सकते हैं जहां कृष्ण के पूजे जाने का उल्लेख है।  वेदव्यास अर्जुन और युधिष्ठिर उन्हें पूज्य  एवं धर्म-धुरंदर मानते हैं।  महाभारत के पश्चात शताब्दियों तक कृष्ण पूजा का प्रचलन रहा।  संस्कृत काव्य में तो कृष्ण भक्ति का स्वरूप बहुत प्राचीन काल से विकसित हो गया था।  इस दृष्टि से जयदेव द्वारा रचित गीतगोविंद राधा माधव के चरित्र पर आधारित अप्रतिम धार्मिक काव्य ग्रंथ है। 

गीतगोविंद का अनुकरण करते हुए संस्कृत साहित्य में अनेक कृष्ण काव्य ग्रंथ लिखे गए।  हिंदी में कृष्ण काव्य का आरंभ करने वाले विद्यापति भी गीत गोविंद से ही प्रभावित दिखाई देते हैं। ईसा की 15वीं शताब्दी में कृष्ण भक्त कवियों ने कृष्ण के रूप और चरित्र का वर्णन किया उससे कृष्ण भक्ति काव्य इतना गहरा और लोकव्यापी हो गया, शायद इससे पहले ऐसा नहीं था।  हिंदी के मध्यकालीन कृष्ण भक्त कवियों के साहित्य में सरसता, माधुर्यता, तल्लीनता और काव्य सुधा अनुपम है।

भक्तिकाल की सगुण भक्तिधारा में कृ्ष्ण काव्य का विशेष महत्व है। कृष्ण भक्ति काव्य धारा से अभिप्राय उस काव्यधारा से है जिसमें कवियों ने भगवान विष्णु के अवतार कृष्ण के चरित्र को आधार बनाकर अपने काव्य ग्रंथों की रचना की। इस परंपरा के कवियों ने कृष्ण के बाल रूप के एवं उनकी विविध लीलाओं के हृदयग्राही चित्र अपने काव्य में अंकित किए हैं। भागवत पुराण इस काव्यधारा का आधार ग्रंथ है। कृष्ण भक्ति के प्रचार में वल्लभाचार्य के ‘पुष्टि संप्रदाय’ का बहुत बड़ा योगदान माना जाता है।

Jeremy McGilvrey, Author of Instagram Secrets and Creator of Instapro Academy
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  पुष्टिमार्ग में ईश्वर के अनुग्रह की याचना की जाती है, इसी अनुग्रह का नाम पुष्टि है।  इस पुष्टि के अनुसार प्रेम और अनुराग के फल स्वरुप ही कृष्ण का अनुग्रह प्राप्त करने के बाद भक्ति की अनुभूति होती है। वल्लभाचार्य ने कृ्ष्ण भक्तों को श्रीकृष्ण की लालाओँ का गुणगान करने की प्रेरणा दी। उनके प्रमुख शिष्य सूरदास थे जो इस शाखा के प्रतिनिधि कवि भी हैं। वल्लभाचार्य के बेटे श्री विट्ठलनाथ ने पुष्टिमार्गी कवियों अर्थात अपने पिता के 84 शिष्यों में से चार  शिष्यों सूरदास, परमानंददास, कुंभनदास और कृष्णदास को तथा अपने  252  शिष्यों में से चार शिष्यों नंददास, चतुर्भुजदास, छीतस्वामी और गोविंदस्वामी को लेकर आठ शिष्यों के एक समूह की स्थापना की जिसेअष्टछाप  के नाम से संबोधित किया गया।

इन आठ कवियों में सूरदास तथा नंददास अग्रणी हैं। इसके अतिरिक्त कृष्ण भक्ति काव्य धारा के कवियों में मीराबाई और रसखान का नाम भी प्रमुख रूप से लिया जाता है। कृष्ण भक्ति काव्य में रस,आनंद, और प्रेम की अभिव्यक्ति का माध्यम श्रीकृष्ण या राधाकृष्ण की लीला बनी है । इस काव्य की प्रवृत्तियाँ इस प्रकार से हैं :-

1. कृष्ण लीलाओं का वर्णनः

कृष्ण भक्त कवि लोकरंजनकारी कृष्ण की लीलाओं का उन्मुक्त गायन किया है।सूरदास की एक ही आशा और अभिलाषा है-कृष्ण-लीलागान। कृष्ण भक्ति के अनुसार कृष्ण ही केवल मात्र पुरुष है, शेष सभी जीवात्माएं हैं जो कि सदा कृष्ण लीला और बिहार में लिप्त रहती हैं। कृष्ण भक्त कवियों ने श्रीकृष्ण की बालरुप में वात्सल्य रस से पूर्ण लीलाएँ, सख्य रूप में लीलाएँ, गोपियों के साथ माधुर्य भावपूर्ण लीलाएँ समस्त कृष्ण भक्ति काव्य में व्याप्त है। सूर ने शुद्ध भक्ति भाव से कृष्ण की बाल लीलाओं के साथ-साथ राधा-कृष्ण की प्रेम लीलाओं का अत्यंत मनोहारी वर्णन किया है। सूर के लीला वर्णन का एक उदाहरण देखिए-

मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै।
जैसे उड़ि जहाज की पंछी, फिरि जहाज पै आवै॥
कमल-नैन को छाँड़ि महातम, और देव को ध्यावै।
परम गंग को छाँड़ि पियासो, दुरमति कूप खनावै॥
जिहिं मधुकर अंबुज-रस चाख्यो, क्यों करील-फल भावै।
‘सूरदास’ प्रभु कामधेनु तजि, छेरी कौन दुहावै॥

2. बालमनोविज्ञान का अद्भूत चित्रणः

कृष्ण भक्त कवियों ने श्रीकृष्ण के बाल-जीवन को जितने विशद्, सूक्ष्म और स्वाभाविक ढंग से वर्णित किया है, वैसा मनोवैज्ञानिक चित्रण अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलता है। बाल मनोविज्ञान की जितनी गहरी पकड़ सूरदास के काव्य नहीं है, उतनी किसी अन्य हिंदी के कवि के काव्य में दिखाई नहीं पड़ती। उन्होंने कृष्ण के बाल्य जीवन की विविध मानसिक अवस्थाओं को बड़े ही सजीव रूप में प्रस्तुत किया है। बच्चे के मन में ईर्ष्या, स्पर्धा, विस्थापन जिज्ञासा, भय, रूठना, मनाना, मानना, लज्जा आदि जो भाव रहते हैं उनका अत्यंत प्रभावशाली चित्रण उनके काव्य में मिलता है। बालकृष्ण को गोद में लेकर नंद बाबा ने घड़े में झांका तो कृष्ण को लगा कि नंद बाबा ने किसी और को गोद में उठा लिया है और अपना बेटा बना लिया है। बालकृष्ण ईर्ष्या वश मां के पास चले जाते हैं और कह देते हैं कि अब मैं नंद का बेटा नहीं हूं। इस प्रसंग को सूरदास ने अत्यंत सुंदर ढंग से वर्णित किया है-

कहियो जाई जसुमति सो तांछन, मैं जनति सुत तेरो
आजु नंद सुत और कियो, कुछ कियौ न आदर मेरौ।

इसी प्रकार बालकृष्ण चाहते हैं कि उनकी छोटी एक बड़े भाई की चोटी की तरह लंबी और मोटी हो जाए इसी स्पर्धा भाव के कारण हो मां यशोदा से कहते हैं-

मैया कबहुं बढ़ैगी चोटी।
किती बेर मोहि दूध पियत भइ यह अजहूं है छोटी॥
तू जो कहति बल की बेनी ज्यों ह्वै है लांबी मोटी।
काढ़त गुहत न्हवावत जैहै नागिन-सी भुई लोटी॥
काचो दूध पियावति पचि पचि देति न माखन रोटी।
सूरदास त्रिभुवन मनमोहन हरि हलधर की जोटी॥

3.अद्वितीय वात्सल्य चित्रणः

कृष्ण के बाल वर्णन में वात्सल्य वर्णन का अनूठा स्थान है। विशेष रुप से सूरदास का वात्सल्य वर्णन हिंदी साहित्य अद्वितीय काव्य है। सूर वात्सल्य है और वात्सल्य सूर है। हिंदी साहित्य में सूरदास का वात्सल्य रस का सम्राट कहा जाता है।आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ठीक ही लिखा है कि सूरदास बंद आंखों से वात्सल्य रस का कोना कोना झांक आए हैं। यशोदा के हृदय की सहजता और सरलता का कवि अत्यंत मर्मस्पर्शी वर्णन करते हैं। माँ यशोदा अपने शिशु को पालने में सुला रही हैं और निंदिया से विनती करती है की वह जल्दी से उनके लाल की अंखियों में आ जाए |

जसोदा हरी पालनै झुलावै |
हलरावै दुलराय मल्हरावै जोई सोई कछु गावै |
मेरे लाल कौ आउ निंदरिया, काहै मात्र आनि सुलावै |
तू काहे न बेगहि आवे, तो का कान्ह बुलावें |

कृष्ण का शैशव रूप घटने लगता है तो माँ की अभिलाषाएं भी बढ़ने लगती हैं उसे लगता है कि कब उसका शिशु उसका उसका आँचल पकड़कर डोलेगा, कब उसे माँ और अपने पिता को पिता कहके पुकारेगा। सूरदास लिखते है –

जसुमति मन अभिलाष करै,
कब मेरो लाल घुतरुवनी रेंगै, कब घरनी पग द्वैक भरे,
कब वन्दहिं बाबा बोलौ, कब जननी काही मोहि ररै ,
रब घौं तनक-तनक कछु खैहे, अपने कर सों मुखहिं भरे
कब हसि बात कहेगौ मौ सौं, जा छवि तै दुख दूरि हरै|

4. सामाजिक व सांस्कृतिक जीवन की अभिव्यक्तिः

कृष्ण भक्त कवि यद्यपि कृष्ण की लीला वर्णन में तल्लीन रहे परंतु उनके काव्य में तत्कालीन समाज व संस्कृति का भी संयोगवश चित्रण हुआ है। तत्कालीन युग में प्रचलित धर्म साधना अनेक संप्रदाय के साधकों की वेशभूषा, खानपान आदि का वर्णन इन कवियों ने किया है। सूरदास ने अपने भ्रमरगीत में अलख वादियों, निर्गुण संतो तथा अद्वैतवादियों की अच्छी खबर ली है, साथ ही साथ उन्होंने समाज में व्याप्त रूढ़ियों व कुरीतियों पर भी प्रहार किया है। गोपियों के निम्न संवाद के माध्यम से सूरदास ने योग साधकों की वेशभूषा का वर्णन किया है-

सुंगी, मुद्रा, भस्म, त्वचा मृग, अरू अवधारन पौन
हम अबला अहीरी सठ मधुकर, धीर जनहिं कहीं कौन।

5. भक्ति भावनाः

सूरदास श्री कृष्ण के अनन्य भक्त हैं। उन्होंने पुष्टिमार्ग के सिद्धांतों के आधार पर कृष्ण को अपना आराध्य स्वीकार कर उनकी लीलाओं का गान किया है। उनकी भक्ति सगुण भक्ति है। उनकी रचनाओं में प्रेम भक्ति के साथ-साथ दास्य, सख्य, माधूर्य तथा वात्सल्य भावों की अभिव्यक्ति देखी जा सकती है। उनकी दास्य भक्ति का एक उदाहरण देखिए-

प्रभु, हौं सब पतितन कौ राजा।
परनिंदा मुख पूरि रह्यौ जग, यह निसान नित बाजा॥

सूरदास की भक्ति विशेष रूप से सख्य भाव लिए हुए हैं। माधूर्य या प्रेम भाव की भक्ति के कारण धीरे-धीरे कृष्ण भक्ति धारा में श्रृंगारिकता का विकास होता चला गया। सूरदास अपने आराध्य को संसार के समस्त कष्टों को तारणहार के रूप में चित्रित करते हुए हते हैं-

चरन कमल बंदौ हरिराई । जाकी कृपा पंगु गिरि लंघे,अंधे को सब कछु दरसाई ॥१॥ बहरो सुने मूक पुनि बोले,रंक चले सिर छत्र धराई । ‘सूरदास’ स्वामी करुणामय, बारबार बंदौ तिहिं पाई ॥२॥

6. श्रृंगार वर्णनः

कृष्ण भक्त कवि भक्ति रस के कवि थे। उनके काव्य में श्रृंगार रस का अद्भुत चित्रण हुआ है। सर्वप्रथम तो स्वयं भगवान कृष्ण का चरित्र श्रृंगार प्रधान है। अतः उनकी लीलाओं के वर्णन में श्रृंगार के लिए पर्याप्त स्थान था। इन कवियों ने श्रृंगार के संयोग और वियोग दोनों पक्षों का सुंदर वर्णन किया है। ब्रज की गोपियां श्री कृष्ण के रूप माधुर्य पर आसक्त हो जाती है। श्री कृष्ण की बांसुरी तो मानो गोपियों के लिए जादू का काम करती है। कृष्ण और राधा की प्रथम मिलन का बड़ा सुंदर वर्णन सूरदास द्वारा किया गया है-

बूझत स्याम कौन तू गोरी।
कहां रहति काकी है बेटी देखी नहीं कहूं ब्रज खोरी॥
काहे कों हम ब्रजतन आवतिं खेलति रहहिं आपनी पौरी।
सुनत रहति स्त्रवननि नंद ढोटा करत फिरत माखन दधि चोरी॥
तुम्हरो कहा चोरि हम लैहैं खेलन चलौ संग मिलि जोरी।
सूरदास प्रभु रसिक सिरोमनि बातनि भुरइ राधिका भोरी॥

7. भ्रमरगीत काव्य परंपराः

कृष्ण काव्यधारा के सभी कवियों ने भ्रमरगीत परंपरा को अपनाया। भ्रमरगीत काव्य का आधार कृष्ण के मित्र उद्धव और गोपियों का संवाद है। भ्रमरगीत का मूलस्रोत, श्रीमद्भाग्वत पुराण का दशम स्कंध है। श्रीकृष्ण गोपियों को छोङकर मथुरा चले गए और गोपियां विरह विकल हो गई। कृष्ण मथुरा में लोकहितकारी कार्यों में व्यस्त थे किन्तु उन्हें ब्रज की गोपियों की याद सताती रहती थी। उन्होंने अपने अभिन्न मित्र उद्धव को संदेशवाहक बनाकर गोकुल भेजा। गोपियों ने उद्धव को भ्रमर को प्रतीक बनाकर अन्योक्ति के माध्यम से उद्धव और कृष्ण पर जो व्यंग्य किए एवं उपालम्भ दिए उसी को ’भ्रमरगीत’ के नाम से जाना गया। भ्रमरगीत प्रसंग में निर्गुण का खण्डन, सगुण का मण्डन तथा ज्ञान एवं योग की तुलना में प्रेम और भक्ति को श्रेष्ठ ठहराया गया है। भ्रमर गीत का मूल उद्देश्य निर्गुण पर सगुण की विजय दर्शाना है-

निरगुन कौन देश कौ बासी।
मधुकर, कहि समुझाइ, सौंह दै बूझति सांच न हांसी॥
को है जनक, जननि को कहियत, कौन नारि को दासी।
कैसो बरन, भेष है कैसो, केहि रस में अभिलाषी॥

8. प्रकृति चित्रणः

कृष्ण भक्त कवियों के काव्य में प्रकृति का व्यापक चित्रण हुआ है। इन कवियों ने कृष्ण की लीलाओं की पृष्ठभूमि के रूप में प्रकृति का चित्रण किया है। वृंदावन के वन, नदी, पर्वत, झरने, कुंज-लियां सभी कुध कृष्ण के रंग में रंगे नजर आते हैं। जब तक कृष्ण गोकुल में रहे प्रकृति भी उन्हीं के रास-रंग में रंगती रही। जैसे ही कृष्ण ने मथुरा के लिए प्रस्थान किया प्रकृति का रुप भी मुरझाने लगा। सूरदास ने गोपियों के सुख-दुख की अनुभूतियों को व्यक्त करते समय प्रकृति का हृदयकर्षी वर्णन किया है-

अंखियां हरि-दरसन की भूखी।
कैसे रहैं रूप-रस रांची ये बतियां सुनि रूखी॥
अवधि गनत इकटक मग जोवत तब ये तौ नहिं झूखी।
अब इन जोग संदेसनि ऊधो, अति अकुलानी दूखी॥
बारक वह मुख फेरि दिखावहुदुहि पय पिवत पतूखी।
सूर, जोग जनि नाव चलावहु ये सरिता हैं सूखी॥

अतः कहा जा सकता है कि हिन्दी साहित्य के इतिहास मे कृष्ण की लीलाओ के गान, कृष्ण के प्रति सख्य भावना आदि की दॄष्टि से कृष्ण काव्य का महत्वपूर्ण स्थान है। कृष्ण भक्ति साहित्य ने सैकड़ो वर्षो तक भक्तजनों का हॄदय मुग्ध किया। यह काव्य हिंदी साहित्य की अद्वितीय निधि है।

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