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बी.ए. तृतीय वर्ष (DSE-1)

लोकगीत से क्या अभिप्राय है? लोकगीतों की प्रमुख विशेषताएं बताते हुए उसके विभिन्न प्रकारों पर प्रकाश डालिए।

लोक साहित्य के अंतर्गत लोकगीत सर्व प्रसिद्ध व सर्व प्रमुख प्रकार है।लोकगीतों में जनसामान्य के भाव और अनुभूतियों की व्यापकता सहज रूप से प्राप्त होती है। लोक साहित्य का लगभग अधिकांश भाग लोकगीतों में ही समाया हुआ है।आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लोकगीतों को आर्य सभ्यता की वेद श्रुति कहकर इन्हें वेदों के समान पवित्र कहा है तो महात्मा गांधी ने लोकगीतों को समूची संस्कृति के पहरेदार कहा है। राष्ट्रीय जीवन की सत्य कथा जानने का प्रामाणिक माध्यम है लोकगीत।

मानव हृदय का भाव व विलास जब अपनी उत्कट स्थिति में लयात्मक आरोह-अवरोह के साथ भाषा अबाध होकर प्रवाहित होने लगता है तो उस शब्द शास्त्री उसे गीत कहते हैं और जब यह गीत लोक बोलियों में लोक मानस की भावनाओं को प्रकट करता है तो उसे लोकगीत का नाम दिया जाता है। गीत और संगीत दोनों का प्रभाव मानव के मन और भाव जगत पर पड़ता है। लोकगीत संगीत और साहित्य के मिश्रण का अनूठा उदाहरण है।

लोक साहित्य में समुदायवादी सिद्धांत के प्रतिपादक विलियम ग्रिम के अनुसार, “लोक काव्य का निर्माण अपने आप में विशाल जनसमूह के द्वारा होता है किसी व्यक्ति विशेष के द्वारा नहीं। लोकगीत स्वत: संभूत है।” लोक गीत लोक कंठ के माध्यम से समय और स्थान की सीमाओं को लगते हुए अपने अमर होने का संदेश देते हैं और नित नवीन शरीर धारण करते हैं। मौखिक होने के कारण इनका विकास होता है। लोकगीतों का संसार हृदय का संसार है। हृदय में उत्पन्न होने वाले राग-विराग के सीधे सच्चे भावों का प्रस्तुतीकरण लोकगीत की विशेषता है।

लोकगीत मानवता के आदिकाल से, मानव की आदि व्यवस्था से चले आ रहे हैं। उस समय मनुष्य और प्रकृति का संबंध आत्मीय और प्रगाढ़ था। प्रकृति के हर क्षण से अपनत्व महसूस करने वाले मनुष्य ने जो गीत रचे उनका सर्वप्रथम विषय प्रकृति ही बनी। झरनों की स्वच्छता और चंचलता, फूलों की बहार और सुगंध, वृक्षों की उदारता एवं विनम्रता, नदियों का प्रवाह और शीतल स्पर्श इन गीतों में सहज ही देखा जा सकता है। वर्षा की सजगता, बसंत का उत्साह, कोयल की कूहुक और सूर्य की उज्जवल आभा  इन गीतों में पूर्ण रुप से समाहित है।

राल्फ विलियम्स ने कहा है, ‘लोकगीत न पुराना होता है न नया। वह जंगल के एक वृक्ष के समान है जिसकी जड़ें भीतर तक धरती में धंसी हुई है पर जिस में निरंतर नई-नई डालियां, पल्लव और फल-फूल रहते हैं।’

लोकगीतों की विशेषता प्रकट करते हुए विभिन्न विद्वानों ने उन्हें निम्नलिखित शब्दों में परिभाषित किया है-

डॉ. रामनरेश त्रिपाठी ने लोकगीतों को ग्राम्य गीत कहा है, उनके अनुसार,”ग्राम गीत प्रकृति के उद्गार है।इसमें अलंकार नहीं केवल रस है ,छंद नहीं केवल लय है, लालित्य नहीं केवल माधुर्य है। सभी मनुष्य अर्थात स्त्री-पुरुषों के मध्य में हृदय नामक आसन पर बैठकर प्रकृति गान करती है, प्रकृति के ही गान ग्राम्य गीत है।”

श्याम परमार के अनुसार,“लोकगीतों में विज्ञान की तलाश नहीं मानव संस्कृति का सारल्य और व्यापक भावों का उभार है।”

डॉ. सत्येंद्र के अनुसार, “वह गीत जो लोग मानस की अभिव्यक्ति हो अथवा जिनमें लोकमानस भाव भी हो लोकगीत के अंतर्गत आता है।”

देवेंद्र सत्यार्थी के अनुसार, “लोकगीत किसी संस्कृति के मुंह बोले चित्र होते हैं।”

हीरामणि सिंह साथी के अनुसार,“लोकगीत जनमानस की कोख से उपजे धरती के गीत हैं जिनमें बांसुरी का आकर्षण भी है एवं बीन की मिठास भी, पुरवइया की मादकता भी है और नारीकंठों का इंद्रजाल भी है। इसकी बोल में एक युग बोलता है एक व्यवस्था बोलती है और एक अनुशासित समाज बोलता है।इनमें पीड़ा भी है उल्लास भी है अपमान भी है और प्रेम समर्पण का अगाध विस्तार भी है जहां एक व्यक्ति की बोली समष्टि की बोली बन जाती है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि मानव जीवन के समस्त सुख- दुख, हर्ष-उल्लास की कहानी लोकगीतों में चित्रित है। यह लोकगीत जनमानस के स्वच्छंद एवं निश्चल भाव हैं।

लोकगीतों की विशेषताओं को निम्नलिखित बिंदुओं द्वारा स्पष्ट किया जा रहा है-

  1. लोकगीत मौखिक परंपरा से हस्तांतरित विकसित होते चलते हैं।

  2. लोकगीतों का रचनाकार अज्ञात होता है।

  3. यह किसी व्यक्ति विशेष की रचना नहीं बल्कि संपूर्ण समूह की रचना होती है।

  4. इनमें निरर्थक शब्द योजना और पुनरावृति की प्रवृत्ति रहती है।

  5. लोकगीत काव्यशास्त्र और भाषा शास्त्र के नियमों से रहित होते हैं।

  6. लोकगीत स्वाभाविक होती है इन में अलंकारिता का कोई स्थान नहीं होता।

  7. लोकगीत भावों की लयात्मक अभिव्यक्ति है।

  8. लोकगीतों में प्रकृति का संपूर्ण रूप समाहित होता है।

  9. लोकगीत मनुष्य के सामाजिक व पारिवारिक एवं व्यक्तिगत जीवन से जुड़े होते हैं।

  10. इनमें प्रश्नोत्तर प्रणाली तथा वस्तुगणन की प्रवृत्ति रहती है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि लोकगीतों में लोग जीवन की सच्ची झांकी देखी जा सकती है।

लोकगीतों के प्रमुख प्रकार

जीवन के समस्त पहलुओं से संबंधित लोकगीतों को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया गया है-

संस्कारों संबंधी लोकगीत

भारत धर्म प्रधान देश है। यहां धर्म को जीवनचर्या से जोड़कर अपनाने की परंपरा चली आई है। सनातन धर्म में सोलह संस्कार बताए गए हैं। जन्म से पूर्व और मृत्यु के बाद तक इन संस्कारों की श्रृंखला चलती रहती है। इनमें गर्भाधान, जन्म, मुंडन, यज्ञोपवीत, विवाह और मृत्यु प्रधान है। इन सभी संस्कारों में देश के सभी प्रांतों में लोकगीतों की परंपरा है। जन्म के उत्सव और वह आदि में जहां प्रसन्नता के स्वर गूंजते हैं। वहीं मृत्यु के अवसर पर गाए जाने वाला गीत अत्यंत कारुणिक और हृदय विदारक होता है।अतः लोकगीत जीवन के हर छोटे-बड़े सुख दुख से संबंधित है।

– ऋतु संबंधी लोकगीत

भारत में अनेक ऋतुएँ हैं तथा उनसे जुड़े त्योहारों का अत्यधिक महत्व है। वर्षा, बसंत, हेमंत, शिशिर ऋतु में बदलते मौसम का अनुभव और उनसे जुड़े त्योहारों के आनंद की अभिव्यक्ति लोकगीतों में आसानी से मिलती है। ‌जहां आषाढ़ के महीनों में ‘आल्हा’ गाकर उल्लास होते हैं वही सावन के महीने में तो अनुभूतियों का सशक्त संसार देखा जा सकता है। फागुन में फाग का उल्लास है तो चैत में  चैती गाकर वे अपने मनोभावों को शब्द प्रदान करते हैं। लोकगीतों का प्रकृति के साथ गहरा संबंध है। प्रत्येक ऋतु के साथ मानव का बाह्य और आंतरिक परिवेश बदलता है। लोक गायक जहां बाहरी प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों का सूक्ष्म निरीक्षण कर अपनी कलम चलाता है वहीं पर मानव मन प्राकृतिक परिवर्तन के प्रभाव को भी अंकित करता है। लगभग सभी भाषाओं में बारहमासा लिखने की लोक परंपरा आज भी जीवित है।

– व्रत संबंधी लोकगीत

धर्म प्रधान देश होने के साथ भारत में व्रत और अनुष्ठान की अनूठी परंपरा मिलती है। प्रत्येक सोमवार या सावन के पहले महीने तथा शिवरात्रि के दिन शिव की उपासना संबंधी व्रत, गणेश चतुर्थी संबंधी लोकगीत, नवरात्रि के व्रत संबंधी लोकगीत, सत्यनारायण की कथा संबंधी लोकगीत, रामनवमी के व्रत से जुड़े लोकगीत, कृष्ण जन्माष्टमी से जुड़े लोकगीत, तीज व्रत के लोकगीत, नाग पंचमी में नाग देवता संबंधी आदि असंख्य ऐसे लोकगीत हैं जो वह मानव की औरत संबंधी धारणा से जुड़े हुए हैं।

– जाति संबंधी लोकगीतः

कुछ लोकगीत ऐसे भी हैं जो केवल कुछ विशेष जातियों में ही गाए जाते हैं। अहीर जाति के लोगों का जातीय गीत ‘विरहा’ है। इसी प्रकार दु:साध जाति के लोग ‘पचरा’ गाते हैं। इसी प्रकार गोंडों के गीत, कहारों के गीत, धोबियों के गीत, माली के गीत गाए जाते हैं। गेरुआ वस्त्र धारण करके साईं नामक कुछ सारंगी पर गोपीचंद और भरथरी की गाथा गाते हैं। इसी प्रकार गढ़वाल में औजी जाति विशेष प्रकार के गीत गाती है।

– श्रम संबंधी लोकगीतः

कुछ लोकगीत ऐसी है जो विशेष कार्य करते हुए गाए जाते हैं। जैसे खेतों में धान रोपते समय जो गीत गाए जाते हैं उन्हें रोपनी के गीत, खेत निराते समय निरवाही या सोहनी के गीत, जांत पीसते समय जैंतसार , तेल फेरते समय कोल्हू के गीत आज भी गांवों में गाए जाते हैं। इन गीतों को श्रम गीतों के अंतर्गत रखा गया है। गीत गाते समय एक तो थकान का अनुभव नहीं होता और दूसरा काम में मन लगा रहता है।

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