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Unit 1 Lok Sahitya बी.ए. तृतीय वर्ष (DSE-1)

लोक साहित्य के अध्ययन की प्रक्रिया

 लोक साहित्य जनमानस की उपज है। इसमें लोक का मानस, लोक जीवन और लोक का भाव जगत् स्पष्ट रुप से परिलक्षित होता है। लोक साहित्य लोक संस्कृति का अभिन्न अंग है। इसका अध्ययन करने के लिए लोक संस्कृति के प्रत्येक पहलु को समझना आवश्यक है। जब हम किसी समाज की लोक-संस्कृति का अध्ययन करते है तो उसमें उस समाज मैं व्याप्त  रीति-रिवाज,  संस्कार,  मान्यताएं,  परंपराएं,  प्रथाएं आदि सभी कुछ समाहित होता है। वास्तव में लोक साहित्य लोक संस्कृति का अंग होने के साथ-साथ मानव की ऐतिहासिक, मनोवैज्ञानिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और भाषावैज्ञानिक व्यवस्था का अध्ययन है।  लोक साहित्य के लिए विद्वानों ने लोकवार्ता, लोकायन, लोकधन जैसे शब्दों का प्रयोग भी किया है।  साहित्य और लोक साहित्य का सबसे बड़ा अंतर यही है कि यदि साहित्य अलंकार, रस, छंद का पालन करता है तो लोक साहित्य में भावनाओं और स्वभाविकता का होना आवश्यक है।  लोक साहित्य का आनंद साक्षर और निरक्षर दोनों वर्ग के लोग उठा सकते हैं। लोक साहित्य के अंतर्गत लोकगीत, लोककथा, लोकगाथा, लोकनाटक, लोकोक्तियां और मुहावरे, पहेलियां आदि शामिल हैं।  लोक साहित्य के अध्ययन की प्रक्रिया इन सब के अध्ययन पर आधारित है। लोक-साहित्य के वास्तविक अध्ययन के सूत्रधार – डार्विन सर फ्रेजर थे। इंग्लैंण्ड में ‘लोक-साहित्य-समाज’ (1878) की स्थापना हुई।  इसके द्वारा विभिन्न देशों की लोक-कथाओं का संग्रह किया गया।   इस आधार पर लोक साहित्य के अध्ययन की प्रक्रिया को निम्नलिखित बिंदुओं में विभाजित किया जाता है-

1- ऐताहासिक दृष्टिकोण की प्रक्रियाः

लोक साहित्य के ऐतिहासिक अध्ययन की प्रक्रिया  में ऐतिहासिक समाजों, एवं विभिन्न जातियों-जनजातियों के विविध पहलुओं का अध्ययन किया जाता है।  इतिहासकार पुरातत्व प्रणाली के आधार पर  लोक साहित्य का अध्ययन करते हैं।

लोकसाहित्य और इतिहास का सम्बन्ध बहुत निकट का और घनिष्ठ है। लोकसाहित्य में एक युग के लोक की तस्वीर रहती है, जबकि इतिहास में व्यक्तियों, विशिष्ट घटनाओं, सामाजिक और सांस्कृतिक स्थितियों के समन्वित एकत्व से लोक का चित्र खड़ा होता है। कथापरक लोकगीतों और लोकगाथाओं में जनपद की उन महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन और पात्रों का चित्रण मिलता है, जिनका इतिहास में उल्लेख तक नहीं है। यदि किसी जनपद के लोक की संस्कृति और सामाजिक स्थिति की वास्तविकता का पता लगाना हो, तो लोकसाहित्य पक्षपातविहीन होने के कारण अनुशीलन का मुख्य विषय है। इसीलिए किसी भी युग का लोकसाहित्य उस युग के सामाजिक इतिहास का मौखिक दस्तावेज है।

उदाहरण के लिए यदि यह अध्ययन करना है  कि  प्राचीन समाज में किस तरह की  सामाजिक व्यवस्था, नीति नियम, रीति-रिवाज एवं प्रथाएं थी, उसके लिए  ऐतिहासिक अध्ययन की प्रक्रिया को ही अपनाना पड़ेगा। एक अन्य उदाहरण लें तो हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिला अतीतकाल से ही अपनी सामाजिक परंपराओं, उच्च आदर्शों तथा समृद्ध इतिहास के लिए प्रसिद्ध रहा है। इन सबका चित्रण वहाँ के लोक साहित्य में स्पष्टतः देखा जा सकता है। अतः कांगड़ा से संबंधित समस्त लोक परंपराओं एवं ऐतिहासिक समृद्धि का अध्ययन करने के लिए ऐतिहासिक दृष्टिकोण को ही अपनाना पड़ेगा। अतः स्पष्ट है कि किसी भी जनपद, उसके इतिहास, उसकी भाषा आदि से कुछ संकेत मिल जाते हैं, जो कृति का काल-निर्धारण करने में सहायक होते हैं। इस प्रकार ऐतिहासिक दृष्टिकोण की प्रक्रिया लोक साहित्य के अध्ययन में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।

2- मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण की प्रक्रियाः

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण के अंतर्गत मानव के व्यवहार एवं मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। मनोविश्लेषणवाद के जन्मदाता फ्रायड ने चेतन और अवचेतन, दो मानसिक अवस्थाएं  बताई है। लोक जीवन से जुड़ी  गाथाएं व कहानियां  एक तरह से अवचेतन मन की ही  धारणाएं हैं। लोक साहित्य के प्रत्येक तत्व में लोकमानस की भूमिका है।  इसी लोक मानस का अध्ययन मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण द्वारा किया जाता है। प्राचीन संस्कृति से जुड़े अनेक ऐसे प्रश्न हैं, जिनका उत्तर मनुष्य प्राप्त करना चाहता है।  प्राचीन समाज की जो लोक नीतियां, लोक अनुष्ठान, लोक विश्वास आज समाज में उसी रूप में विद्यमान है, उनके पीछे क्या कारण है?,  लोगों की  प्राचीन मान्यताओं में आस्था क्यों है?,  ऐसी कौन सी शक्ति है जिस पर न चाहते हुए भी मनुष्य विश्वास करने को  विवश  है?, व्यक्तिगत व सामूहिक रूप से वह  किन परंपराओं और प्रथाओं से बंधा है?  इन सबके पीछे कौन सी मनोवैज्ञानिक धारणा है?  इन सब प्रश्नों के हल करने के लिए मनुष्य आदिम मानस की मनोवैज्ञानिक वृत्तियों को जानने का प्रयास करता है।

साधारण शब्दों में कहा जाए तो इस विधि द्वारा लोक मानस की विविध प्रवृत्तियों की अभिव्यक्ति और उन में होने वाले परिवर्तनों पर विचार किया जाता है। अतः कहा जा सकता है कि किसी जाति वर्ग या समूह की मनोवैज्ञानिक विशेषताओं को जांच परख कर जो परिणाम निकाले जाते हैं वह लोक साहित्य के अध्ययन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।

3- भाषा वैज्ञानिक दृष्टिकोण की प्रक्रियाः

भाषा वैज्ञानिक दृष्टिकोण लोक साहित्य एवं भाषा के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लोक साहित्य में भाषा विज्ञान के अध्ययन के लिए अक्षय भंडार उपलब्ध है। इस दृष्टिकोण से यह अध्ययन किया जाता है कि ग्रामीण जनपदों में किस तरह की भाषा एवं बोलियां प्रचलित थी। उन भाषाओं की विकास परंपरा क्या रही तथा आधुनिक भाषा के निर्माण में उनकी क्या भूमिका है? भाषा विज्ञान का विद्यार्थी  लोक साहित्य  के अध्ययन की प्रक्रिया में उसके विभिन्न  तत्वों में  प्रचलित एक एक शब्द के अर्थ को ढूंढना चाहता है, मानो इसके माध्यम से किसी संस्कृति के  लुप्त पृष्ठ को ढूंढना चाहता हो।  लोक भाषाओं में जटिल से जटिल भावों को व्यक्त करने के लिए सरल एवं सटीक शब्दों का भंडार है। इन शब्दों की व्युत्पत्ति का अध्ययन भी अत्यंत रोचक हो सकता है। इन शब्दों के अध्ययन द्वारा हम उस समाज के बौद्धिक स्तर का भी अंदाजा स्वतः ही लगा सकते हैं। लोक साहित्य में असंख्य मुहावरे,  लोकोक्तियां  एवं पहेलियां मिलती है,  जिनके पीछे की भाषागत व्यवस्था का अध्ययन इस दृष्टिकोण द्वारा संभव है।

4- धार्मिक दृष्टिकोण की प्रक्रियाः

इस साहित्य ने अपना एक शीर्षस्थ स्थान भी बनाया है जहाँ उसे वैदिक साहित्य के समकक्ष आसन प्राप्त है। प्रमाण यह है कि हमारे लोकजीवन के बहुत से और विशेषकर सांस्कारिक तथा धार्मिक कार्य वैदिक मंत्रों से पूर्ण होते हैं। जहाँ ये मंत्र संस्कृत में पढ़े जाते हैं वहीं ग्राम्याओं द्वारा गाए जानेवाले लोकगीत तथा लोकाचार पर आधारित अन्य क्रियाकलाप भी चलते रहते हैं। एक ओर पुरोहित मंत्राच्चार करता है तो दूसरी ओर ग्रामीण स्त्रियाँ गीत गाती हैं। मुंडन, कर्णवेध, यज्ञोपवीत तथा विवाह आदि संस्कारों पर और मकान, धर्मशाला, कुंआँ, तालाब तथा पोखर आदि का शुभारंभ करते समय भी मंत्र तथा लोकगीत साथ-साथ चलते हैं। ऐसा एक ही सांस्कारिक एवं धार्मिक तथा परमार्थ का कार्य लोकजीवन में नहीं मिलता जिसमें वैदिक साहित्य के साथ लोकसाहित्य को स्थान न प्राप्त हो। धार्मिक तथा नैतिक भावना तो लोक समाज का प्राण ही है । सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू धर्म है। हमारे वैदिक ऋषियों ने सामाजिक संरचना के समय धर्म को इस भॉंति लोकमानव से जोड़ दिया कि सम्पूर्ण सृष्टि ही धर्ममय हो गयी। लोक – मानव जिन बातों को, जिन गूढ़ रहस्यों को समझने में सदियों लगा देता, धर्म के नाम पर या इस प्रकार की गई शिक्षा को उसने पलभर में सीख लिया।  लोकमानस की  इसी धार्मिक संरचना का अध्ययन  धार्मिक दृष्टिकोण के अंतर्गत किया जाता है।

5- समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण की प्रक्रिया

सामाजिक व्यवस्था और लोक साहित्य का गहरा संबंध है। लोक जीवन से जुड़े समस्त पहलुओं जैसे  सामाजिक रीति-रिवाज,  प्रथाएं,  मान्यताएं,  जन्म से लेकर मृत्यु तक के संस्कार आदि सभी की उत्पत्ति  समाज में ही होती है।  समाज-शास्त्र के समुचित अध्ययन के लिए लोक साहित्य की महत्ता सुविदित है। भारतीय समाज का ढांचा किस प्रकार का रहा है, यह लोक-गीतों, लोककथाओं और लोकोक्तियों से भली-भांति समझ में आ जाता है। समाजशास्त्रियों ने लोकाध्ययन-परिवार, विवाह-व्यवस्था, सामाजिक रिश्तेदारी एवं समाज के स्वरूप पर प्रकाश डालने के लिए किया। उदाहरण के लिए शिशु जन्म पर होने वाले सामाजिक कृत्यों के प्रति क्या इतिहास लेखकों का ध्यान कभी गया है? इन सबके समीचीन अध्ययन के लिए लोक साहित्य ही तो एक मात्र साधन है। लोक साहित्य में सामाजिक प्रथाओं, परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों की जीवंत प्रस्तुतियां होती है।  लोक साहित्य की यह संपूर्ण सामग्री समाजशास्त्रीय अध्ययन में उपयोगी होती है। व्रत, त्योहार, अनुष्ठान संस्कार आदि प्रथाओं का तो लोक साहित्य में भंडार है और एक समाजशास्त्री समाज की इन्हीं प्रथाओं के प्रकाश में किसी समाज की सांस्कृतिक विशेषताओं को उद्घाटित करता है। अतः समाजशास्त्रीय अध्ययन प्रणाली में लोक समाज के जातीय आचार-विचार, व्यक्तिगत और सामाजिक संबंधों श्रम का महत्व, सामाजिक संगठनों में परिवार की महत्ता, आचरण की शुद्धता सामाजिक जीवन शैली आदि तत्वों का अध्ययन किया जाता है।

6- मानव-वैज्ञानिक दृष्टिकोण की प्रक्रियाः

पहले लोक साहित्य को नृशास्त्र (मानव-विज्ञान) के अंतर्गत रखा गया था। परंतु इसका विषय क्षेत्र इतना विशाल बनता गया कि इसे अलग विषय के रुप में पढ़ा जाने लगा। सर्वप्रथम नृतत्ववेताओं ने आदिम समाज के अध्ययन के लिए लोक के अध्ययन की शुरूआत की, ज्योंकि इससे उन्हें आदिम समाज में गोत्र जो नृजातीय इकाई का स्त्रोत माना गया है, उस पर प्रकाश डालने में सहुलियत हुई। समाजशास्त्रियों ने लोकाध्ययन-परिवार, विवाह-व्यवस्था, सामाजिक रिश्तेदारी एवं समाज के स्वरूप पर प्रकाश डालने के लिए किया। नृविज्ञान की शाखा सांस्कृतिक शाखा नृविज्ञान का सीधा संबंध लोक साहित्य से है। इस  प्रक्रिया द्वारा आदिकालीन मानव के विकास एवं उनके जीवन के सांस्कृतिक पहलुओं, धार्मिक विश्वास परंपरा, प्राकृतिक शक्तियों का उनके जीवन पर प्रभाव, लोक कलाओं की महत्ता,  देवी-देवताओं संबंधी धारणाओं आदि का विवेचन-विश्लेषण किया जाता है।  इसी तरह नृविज्ञान की शाखा जाति विज्ञान के अंतर्गत विभिन्न जातियों एवं उप जातियों के मानव समुदाय के विभिन्न चरणों में हुए विकास का अध्ययन किया जाता है।

7- भौगोलिक अध्ययन प्रक्रियाः

लोक साहित्य का अध्ययन  भौगोलिक प्रणाली द्वारा भी किया जा सकता है। भौगोलिक प्रणाली के अंतर्गत विभिन्न समाज एवं जातियों  भौगोलिक परिस्थितियों का अध्ययन किया जाता है।  अनेक ऐसे लोकगीत एवं लोक गाथाएं हैं जिनमें प्राचीन ग्रामीण परिवेश की जलवायु, कृषि व्यवस्था,  नगरों की संरचना,  नदियों एवं पर्वतों के नाम  आदि की जानकारी मिलती है। उदाहरण के लिए हिमालय की जनजातीय संस्कृति को जानने के लिए आवश्यक है कि जनजाति क्षेत्र के साथ-साथ पूरे भू भाग को देखा जाए। कुछ क्षेत्र जनजाति के तौर पर घोषित नहीं हैं किंतु उन की सांस्कृतिक विरासत जनजाति से भिन्न नहीं है, वे भी उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं। संस्कृति एकदम से किसी भी सीमारेखा पर नहीं बदलती, यह बदलाव धीरे-धीरे आता है जैसे कि बोली एकदम नहीं बदल जाती, यह बदलाव भी शनैः शनैः आता है और यह बदलाव किन कारणों से आया है,  इसका अध्ययन भौगोलिक प्रणाली द्वारा किया जाता है।  इसी तरह प्राकृतिक आपदाएं भौगोलिक परिवर्तन का परिणाम है। जैसे कि सरस्वती नदी लुप्त हो गई , उसका स्थान कहां था, जैसी जानकारी,  अनेक नदियों, नगरों, जनपदों के नाम, व्यवसायिक स्थानों का पता,  अनेक राज्यों की राजधानियों के नाम,  जंगलों का परिचय आदि जाने के लिए लोक साहित्य का भौगोलिक अध्ययन किया जाता है। इसी तरह अनेक जड़ी बूटियों एवं वनस्पतियों के महत्व की जानकारी भौगोलिक अध्ययन द्वारा संभव है।

8- आर्थिक दृष्टिकोण से अध्ययन की प्रक्रियाः

लोक साहित्य के आर्थिक दृष्टिकोण से अध्ययन के द्वारा हमें विभिन्न सामाजिक व्यवस्थाओं, जातियों एवं जनजातियों के आर्थिक स्तर की भी विधिवत् जानकारी प्राप्त होती है। ग्रामीण समाज का खान-पान, रहन-सहन तथा रीति-रिवाज की ही नहीं अपितु उनकी जीवन शैली से जुड़े हर पहलु को उद्घाटित किया जाता है। अनेक लोकगीतो तथा लोकगाथाओं में स्त्रियों के आभूषणों का परिचय, छप्पन भोग की व्यवस्था, कृषि व्यवस्था के विविध चरण, घर एवं नगरों की स्थितियाँ, लेन-देन की विधियाँ आदि की जानकारी लोक साहित्य के आर्थिक विश्लेषण द्वारा प्राप्त होती है। अनेक लोकगीतों में माताओं द्वारा शिशु को सोने-चाँदी के कटोरे में भात खिलाने की प्रथा का चित्रण मिलता है।

9-सांस्कृतिक दृष्टिकोण की प्रक्रियाः

लोक साहित्य का सांस्कृतिक पक्ष बड़ा विशद है। विश्व की संस्कृतियाँ कैसे उद्भूत हुई, कैसे पनपी, इस रहस्य की कहानी अथवा इतिहास हमें लोक साहित्य के सम्यक् अध्ययन से मिलता है। संस्कृतियों के पुनीत इतिहास की परख अनेकांश में लोक साहित्य से संभव है। सच पूछा जाये तो लोक साहित्य ही संस्कृति का अमूल्य निधि है। जब लोक साहित्य का अध्ययन सांस्कृतिक आधार पर किया जाता है तब संस्कृति के विभिन्न तत्वों की क्रमिक विकास और उनकी विशेषताओं पर विचार किया जाता है। किसी जाति का सांस्कृतिक अतीत कैसा रहा है इसका पता इतिहास से नहीं बल्कि लोक साहित्य द्वारा की लगाया जा सकता है। लोक साहित्य एक ऐसा पालना है कि जिसमें लेखन प्रणाली से पूर्व की मानव संस्कृति की अमूल्य निधि, धर्म, दर्शन, संस्कृति, परम्परायें, रीति -रिवाज, लोकाचार, संस्कार, कर्मकाण्ड, नृत्यगान काव्य -कथायें, नाटक आदि झूलते और खेलते रहे हैं। इन सबकी विशद जानकारी के लिए लोक साहित्य का सांस्कृतिक दृष्टिकोण से अध्ययन आवश्यक है।

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