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Unit 1 Lok Sahitya बी.ए. तृतीय वर्ष (DSE-1)

लोक साहित्य का महत्त्व

मानव को अनुरंजित व आनंदित करने वाले लोक साहित्य की परम्पराएँ प्रत्येक देश व समाज में पाई जाती हैं। लोक साहित्य द्वारा ही युग -युग की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक परिस्थितियों का परिचय मिलता है। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक तथा एक समुदाय से दूसरे समुदाय तक पहुंचने वाले लोक साहित्य की परम्पराएँ आज हम तक पहुंची हैं। यही वह कड़ियां हैं, जिन्होंने हमें इतिहास की लुप्त होती हुई कड़ियों को जोड़ने में सहायता पहुंचाई है। अतीत को वर्तमान से जोड़कर उसमें परस्पर समन्वय स्थापित करना इस साहित्य की एक अलग विशेषता रही है, जिसके परिणाम स्वरूप ही यह केवल सांस्कृतिक धरोहर एवं बीते हुए कल की आवाज मात्र न होकर आज भी जीवन्त सर्जना है। आज लोक साहित्य, वाणी है, इसी कारण लोक साहित्य का महत्व शैक्षणिक एवं ऐतिहासिक क्षेत्रों में भी स्वीकार कर उपयोग किया जाता है।

लोक साहित्य जनता के कंठों में देश के सभी राज्यों, भाषाओं और छोटी -छोटी बोलियों के रूप में भरा हुआ है। भारतीय लोक साहित्य जनता के व्यापक जनसमूह की सभी मौलिक सर्जनाओं का परिणाम है। यह केवल लोक काव्य या गीतों तक ही न सीमित न होकर जनता के जीवन धर्म, संस्कृति तथा परम्पराओं से भी जुड़ा हुआ है।लोक साहित्य में काव्य कला संस्कृति और दर्शन सभी कुछ एक साथ है। यह शब्द विनिमय का प्रथम कला पूर्ण प्रारम्भ भी है, जिसके द्वारा यंत्र -मंत्र, जंत्र -तंत्र, पहेली, मुहावरे, लोकोक्तियों, लोककथाओं, गीतों आदि के रूप में प्रत्येक जाति अपनी जीवन पद्धति और उसकी प्रणालियों को आगे आने वाली पीढ़ी को सौपती रही है। यही कारण है कि इसमें प्राचीन युग का साहित्य, धर्म दर्शन, विश्वास, संस्कार, कर्मकाण्ड तथा काल आदि सभी कुछ एक साथ प्राप्त होता है और इसी के द्वारा किसी भी देश, समाज व जाति की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, धार्मिक तथा बौद्धिक उन्नति को समझा जा सकता है। लोक साहित्य के महत्त्व को निम्नलिखित बिंदुओं द्वारा स्पष्ट किया जा रहा है-

लोक साहित्य का ऐतिहासिक महत्त्वः

किसी देश व समाज के प्राचीन रूप को झांक देख लेने का अनुपम साधन लोक साहित्य है। लोक साहित्य इतिहास को एक प्रतिबिंब की भांति प्रस्तुत करता है। जिसमें ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन इतिहास की भांति न कर सामान्य जनता के दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर किया जाता है। लोक साहित्य में इतिहास की पर्याप्त सामग्री उपलब्ध होती है। लोकगीतों, कथाओं और गाथाओं में स्थानीय इतिहास का पुट मिलता है। लोक मस्तिष्क अपने इतिहास की कड़ियां अपने लोकगीतों में संजो कर रखता है। उदाहरण के लिए मुगल शासन के दौरान किस तरह की सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था थी इसका उदाहरण अनेक लोकगीतों में देखा जा सकता है। किसी भी देश एवं समाज के स्थानीय इतिहास की संपूर्ण जानकारी वहाँ की लोककथाओं, गीतों, गाथाओं एवं नाटकों के माध्यम से स्वतः स्पष्ट हो जाती है। यह कहना समुचित होगा कि अतीत के सूक्ष्म से सूक्ष्म परिचय से वर्तमान को समझने में सुविधा होती है और इस परिचय की जानकारी लोक साहित्य के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं उपलब्ध नहीं हो सकती ।

लोक साहित्य का सामाजिक महत्त्वः

सामाजिक व्यवस्था और लोक साहित्य का गहरा संबंध है। लोक जीवन से जुड़े समस्त पहलुओं जैसे  सामाजिक रीति-रिवाज,  प्रथाएं,  मान्यताएं,  जन्म से लेकर मृत्यु तक के संस्कार आदि सभी की उत्पत्ति  समाज में ही होती है।  समाज-शास्त्र के समुचित अध्ययन के लिए लोक साहित्य की महत्ता सुविदित है। भारतीय समाज का ढांचा किस प्रकार का रहा है, यह लोक-गीतों, लोककथाओं और लोकोक्तियों से भली-भांति समझ में आ जाता है। समाजशास्त्रियों ने लोकाध्ययन-परिवार, विवाह-व्यवस्था, सामाजिक रिश्तेदारी एवं समाज के स्वरूप पर प्रकाश डालने के लिए किया। उदाहरण के लिए शिशु जन्म पर होने वाले सामाजिक कृत्यों के प्रति क्या इतिहास लेखकों का ध्यान कभी गया है? इन सबके समीचीन अध्ययन के लिए लोक साहित्य ही तो एक मात्र साधन है। लोक साहित्य में सामाजिक प्रथाओं, परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों की जीवंत प्रस्तुतियां होती है। व्रत, त्योहार, अनुष्ठान संस्कार आदि प्रथाओं का तो लोक साहित्य में भंडार है और एक समाजशास्त्री समाज की इन्हीं प्रथाओं के प्रकाश में किसी समाज की सांस्कृतिक विशेषताओं को उद्घाटित करता है। अतः सामाजिक दृष्टि से लोक साहित्य का महत्त्व और अधिक बढ़ जाता है।

लोक साहित्य का धार्मिक महत्त्वः

इस साहित्य ने अपना एक शीर्षस्थ स्थान भी बनाया है जहाँ उसे वैदिक साहित्य के समकक्ष आसन प्राप्त है। प्रमाण यह है कि हमारे लोकजीवन के बहुत से और विशेषकर सांस्कारिक तथा धार्मिक कार्य वैदिक मंत्रों से पूर्ण होते हैं। जहाँ ये मंत्र संस्कृत में पढ़े जाते हैं वहीं ग्राम्याओं द्वारा गाए जानेवाले लोकगीत तथा लोकाचार पर आधारित अन्य क्रियाकलाप भी चलते रहते हैं। एक ओर पुरोहित मंत्राच्चार करता है तो दूसरी ओर ग्रामीण स्त्रियाँ गीत गाती हैं। मुंडन, कर्णवेध, यज्ञोपवीत तथा विवाह आदि संस्कारों पर और मकान, धर्मशाला, कुंआँ, तालाब तथा पोखर आदि का शुभारंभ करते समय भी मंत्र तथा लोकगीत साथ-साथ चलते हैं। ऐसा एक ही सांस्कारिक एवं धार्मिक तथा परमार्थ का कार्य लोकजीवन में नहीं मिलता जिसमें वैदिक साहित्य के साथ लोकसाहित्य को स्थान न प्राप्त हो। धार्मिक तथा नैतिक भावना तो लोक समाज का प्राण ही है । सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू धर्म है। हमारे वैदिक ऋषियों ने सामाजिक संरचना के समय धर्म को इस भॉंति लोकमानव से जोड़ दिया कि सम्पूर्ण सृष्टि ही धर्ममय हो गयी। लोक – मानव जिन बातों को, जिन गूढ़ रहस्यों को समझने में सदियों लगा देता, धर्म के नाम पर या इस प्रकार की गई शिक्षा को उसने पलभर में सीख लिया।

लोक साहित्य का ज्ञान एवं नीति विषयक महत्त्वः

ज्ञान एवं नीति की दृष्टि से यह साहित्य पर्याप्त समृद्ध है। ग्रामों में चाहे स्कूल, कॉलेज एवं उच्च शिक्षा का समुचित प्रबंध न हो,चाहे ग्रामीण जनता को अक्षर ज्ञान की कोई सुविधा न हो परन्तु जनता के ज्ञान में बराबर वृद्धि होती रहती है। इस ज्ञान को ग्रामीण जनता आँखों द्वारा न लेकर कानों द्वारा ग्रहण करती है। यह कहना अनुचित न होगा कि ग्रामों में मौखिक विश्व विद्यालय खुले हुए हैं। परस (चौपाल) और पूअर (अलाव) इस ज्ञान-वितरण के लिए बड़े उपयुक्त स्थल हैं। इन संस्थाओं में शिक्षा के अलग-अलग स्तर हैं जहाँ आबालवृद्ध को आयु के अनुसार शिक्षा मिलती है। शिक्षार्थी को समयानुसार सब चीजें सीखने को मिलेंगी। कोर्स (पाठ्यक्रम) आयु के अनुसार चलता है। बचपन में बाल सुलभ और बुढ़ापे में बृद्ध सुलभ। इस शिक्षा वितरण के सर्वोत्तम साधन लोक-कथाएँ हैं। यों तो बालक की शिक्षा जननी की गोद में ही आरम्भ होती है। वहीं से वह चंदामामा, झूजू के म्याऊँ  के, आटे बाटे के द्वारा कुछ सीखता चलता है। कैसा सुन्दर ढंग है, शिक्षा की शिक्षा और मनोविनोद का मनोविनोद। माता-पिता, भाई-बहन, दादी-दादा, अड़ोसी-पड़ोसी अबोध बालक की ज्ञान झोली में कोई न कोई रत्न बिना मांगे डालते रहते हैं। बालिकाओं के दृष्टिकोण से देखें तो लोक साहित्य बड़ा उपयोगी मिलेगा। उनके लिए सामाजिक एवं कौटुम्बिक शिक्षा का समुचित प्रबन्ध यहाँ मिलता है। उदार जननी एवं सद्गृहस्थ बनना भारतीय पुत्रियों का प्रथम व पुरातन उद्देश्य रहा है। बालिकाएँ जीवन के आरम्भ से ही गुडिय़ों के साथ खेल-खेलकर अपना मनोरंजन करती हैं और गृहस्थ के अनेक रहस्यों को अनायास सीख लेती हैं, समझ लेती हैं। कुछ सयानी होती हैं तो गीतों की दुनिया में पदार्पण करती हैं। यह संसार उन्हें पर्याप्त मात्रा में शिक्षित कर देता है। यहीं से उन्हें ऐसे असंख्य नुस्खे (योग) मिलते हैं। जो भावी जीवन के लिए लाभप्रद एवं हितकर सिद्ध होते हैं। जिन बातों को ये गुड्डे-गुडिय़ों के रूप में कहती सुनती है उन्हीं से अपने भावी जीवन की दिशा निर्धारित करती चलती हैं। डॉ. वैरियर एलविन ने अपनी पुस्तक में एक स्थान पर लोक गीतों की महत्ता को प्रतिपादित करते हुए लिखा है कि-‘इनका महत्व इसलिए नहीं है कि इनके संगीत, स्वरूप और विषय में जनता का वास्तविक जीवन प्रतिबिम्बित होता है, प्रत्युत इनमें मानवशास्त्र (सोशियोलाजी) के अध्ययन की प्रामणिक एवं ठोस सामग्री हमें उपलब्ध होती है।

लोक साहित्य का भाषा-वैज्ञानिक महत्त्वः

भाषा वैज्ञानिक दृष्टिकोण लोक साहित्य एवं भाषा के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लोक साहित्य में भाषा विज्ञान के अध्ययन के लिए अक्षय भंडार उपलब्ध है। इस दृष्टिकोण से यह अध्ययन किया जाता है कि ग्रामीण जनपदों में किस तरह की भाषा एवं बोलियां प्रचलित थी। उन भाषाओं की विकास परंपरा क्या रही तथा आधुनिक भाषा के निर्माण में उनकी क्या भूमिका है? भाषा विज्ञान का विद्यार्थी  लोक साहित्य  के अध्ययन की प्रक्रिया में उसके विभिन्न  तत्वों में  प्रचलित एक एक शब्द के अर्थ को ढूंढना चाहता है, मानो इसके माध्यम से किसी संस्कृति के  लुप्त पृष्ठ को ढूंढना चाहता हो।  लोक भाषाओं में जटिल से जटिल भावों को व्यक्त करने के लिए सरल एवं सटीक शब्दों का भंडार है। इन शब्दों की व्युत्पत्ति का अध्ययन भी अत्यंत रोचक हो सकता है। इन शब्दों के अध्ययन द्वारा हम उस समाज के बौद्धिक स्तर का भी अंदाजा स्वतः ही लगा सकते हैं। लोक साहित्य में असंख्य मुहावरे,  लोकोक्तियां  एवं पहेलियां मिलती है,  जिनके पीछे की भाषागत व्यवस्था का अध्ययन इस दृष्टिकोण द्वारा संभव है। भाषा-शास्त्री के लिए शिष्ट साहित्यिक भाषाएँ उतनी उपयोगी नहीं है जितनी कि  बोलचाल की भाषाएँ। इसलिए लोक साहित्य लोक-भाषा की वस्तु हाने के कारण भाषा-वैज्ञानिकों के लिए बड़ा महत्वपूर्ण है यही वह धरातल है जहाँ पर भाषातत्ववेत्ता भाषा के परतों को उघाड़कर देखते हैं और गंभीर से गंभीर स्तरों में प्रवेश पाते हैं।

लोक साहित्य का सांस्कृतिक महत्त्वः

लोक साहित्य का सांस्कृतिक पक्ष बड़ा विशद है। विश्व की संस्कृतियाँ कैसे उद्भूत हुई, कैसे पनपी, इस रहस्य की कहानी अथवा इतिहास हमें लोक साहित्य के सम्यक् अध्ययन से मिलता है। संस्कृतियों के पुनीत इतिहास की परख अनेकांश में लोक साहित्य से सँभव है। सच पूछा जाये तो लोक साहित्य ही संस्कृति का अमूल्य निधि है। गुजराती मनीषी काका कालेलकर ने लोक साहित्य के सांस्कृतिक पक्ष को इन शब्दों में व्यक्त किया है- ‘लोक साहित्य के अध्ययन से, उसके उद्धार से हम कृत्रिमता का कवच तोड़ सकेंगे और स्वाभाविकता की शुद्ध हवा में फिरने-डोलने की शक्ति प्राप्त कर सकेंगे। स्वाभाविकता से ही आत्मशुद्धि संभव है। अंत में यदि हम यह कहें कि लोक साहित्य जन-संस्कृति का दर्पण है तो अत्युक्ति न होगी। संस्कृति की आधारशिला पुरातन होती है। इसके मूल तत्वों के संबंध में जो तत्व सबसे महत्वपूर्ण एवं विचारणीय हैं, वह है विगत का प्रभाव। आज भी हमारा आदर्श हमारा अतीत है। झूला-झूलते, चाकी पीसते, यात्रा करते हमारे आदर्श राम-लक्ष्मण के पुण्य चरित्र ही हैं। यही लोक साहित्य का सांस्कृतिक पक्ष है।निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि लोक साहित्य अतीत की आवाज मात्र ही न होकर ऐसी कड़ी भी है जिसके अध्ययन के बिना किसी भी देश, समाज व संस्कृति से परिचित नहीं हुआ जा सकता है। लोक साहित्य मानव जीवन के आदिम रागों के साथ चलने वाला साहित्य है जो कि युगीन परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होता रहता है। वर्तमान समय में ज्ञान-विज्ञान की प्रगति, तकनीकि उपकरणों का आविष्कार, भूमण्डलीकरण, भौतिकवाद एवं आर्थिक उदारवाद से जहाँ नये मानव मूल्यों का जैसे- व्यक्ति स्वातन्त्र्य की भावना, मानव स्वाभिमान व विश्व बंधुत्व की भावना का विकास हुआ है, वहीं मानव जीवन का महत्व कम हो गया है। सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों का क्षरण होता जा रहा है। व्यक्ति यंत्र बनता जा रहा है। अधिक से अधिक इंद्रिय भोग प्राप्त कर वह सबसे आगे निकल जाना चाहता है। उसकी सहृदयता समाप्त हो रही है। वह संवेदन शून्य बनता जा रहा है। मनुष्य जीवन की समस्त मर्यादाओं को तोडकर वह अहंकार, छल, कपट एवं षडयंत्रों में फँस हुआ स्वयं अपने ही बनाये मकडजाल में उलझ कर रह गया है। अर्थ की प्रधानत ने जीवन मूल्यों को जड बना दिया है। उसके भीतर का रस सूख चुका है। प्रेम, सौहार्द, बंधुत्व एवं मानवीय सम्बन्धों कर प्राचीन परम्पराओं को नष्ट कर वह प्रकृति को भी अपनी दासी बनाना चाहता है। इसी से पारिस्थिति की असंतुलन, असामंजस्य एवं प्रदूषण जैसी विकट समस्याएं पैदा की है। ऐसे में लोक साहित्य का महत्व बढ जाता है।

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