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Unit 1 Lok Sahitya बी.ए. तृतीय वर्ष (DSE-1)

लोक साहित्य के संकलन एवं संरक्षण में आने वाली कठिनाईयां

मनुष्य सामाजिक प्राणी है। जो उसने देखा, महससु किया उसे कविता में विरोया। इसी प्रकार साहित्य का जन्म हुआ। मोटे तौर पर साहित्य के दो प्रकार होते हैं-एक शिष्ट-सुसंस्कृत साहित्य जो शिक्षित लोगों से रचित होता है और लिपिबद्ध होता है उसे शिष्ट साहित्य या परिनिष्ठित साहित्य कहा जाता है। दूसरा साहित्य वह है जो असंस्कॄत, अशिक्षित जनसामान्य का साहित्य होता है और मौखिक होता है, उसे लोक साहित्य कहा जाता है।

लोक साहित्य की एक लंबी एवं प्राचीन परंपरा मिलती है। लोक साहित्य दो शब्दों से बना है- लोक+साहित्य। लोक साहित्य से अभिप्राय उस साहित्य से है जिसकी रचना लोक करता है। ‘लोक’ शब्द समस्त जन समुदाय के लिए प्रयुक्त होता है।  लोक शब्द का अर्थ है- देखने वाला।  वैदिक साहित्य से लेकर वर्तमान समय तक लोक शब्द का प्रयोग जनसामान्य के लिए हुआ है।  लोक शब्द से अभिप्राय उस संपूर्ण जन समुदाय से है जो किसी देश में निवास करता है।  हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार, “ लोक शब्द का अर्थ जनपद या ग्राम्य नहीं है,  बल्कि नगरों और गांव में फैली हुई वह समस्त जनता है, जिसके व्यवहारिक ज्ञान का आधार पोथियाँ नहीं है।”  

कहने का भाव यह है कि जिन का ज्ञान जीवन के अनुभवों पर आधारित है अतः लोक साहित्य जन सामान्य के जीवन अनुभवों की अभिव्यक्ति करने वाले साहित्य का नाम है।लोक साहित्य उतना ही प्राचीन है जितना की मानव क्योंकि इसमें जनजीवन की प्रत्येक अवस्था, प्रत्येक वर्ग प्रत्येक समय और प्रकृति सभी कुछ समाहित है। लोक साहित्य एक तरह सेजनता की संपत्ति है। इसे लोक संस्कृति का दर्पण भी कहा जाता है। जन संस्कृति का जैसा सच्चा एवं सजीव चित्रण लोक साहित्य में मिलता है वैसा अन्य कहीं नहीं मिलता। सरलता और स्वभाविकता के कारण  यह अपना एक विशेष महत्व रखता है।  साधारण जनता का हंसना, रोना खेलना गाना जिन शब्दों में अभिव्यक्त हो सकता है वह सब कुछ लोग साहित्य में आता है।

परिभाषाएँ

धीरेंद्र वर्मा, “ वास्तव में लोक साहित्य वह मौखिक अभिव्यक्ति है जो भले ही किसी व्यक्ति ने गढ़ी हो पर आज इसे सामान्य लोक समूह अपनी ही मानता है। इसमें लोकमानस प्रतिबिंबित रहता है।”

डॉ त्रिलोचन पांडे के अनुसार, “ जन-साहित्य या लोक-साहित्य उन समस्त परंपराओं,   मौखिक तथा लिखित रचनाओं का समूह है  जो किसी एक व्यक्ति या अनेक व्यक्तियों द्वारा निर्मित तो हुआ है परंतु उसे समस्त जन समुदाय अपना मानता है। इस साहित्य में किसी जाति,  समाज या एक क्षेत्र में रहने वाले सामान्य लोगों की परंपराएं,  आचार-विचार,  रीति-रिवाज,  हर्ष-विषाद आदि समाहित रहते हैं।”

उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि लोक साहित्य और लोक जीवन को अभिव्यक्त करने वाला साहित्य है। यह सर्वसाधारण की संपत्ति है लोक साहित्य जीवन का वर समुद्र है जिसमें भूत भविष्य वर्तमान सभी कुछ संचित रहता है। इस साहित्य में लोग जीवन की सच्ची झलक देखने को मिलती है। यह कैसी कृति है जिस पर समस्त लोग का समान अधिकार है।  लोक व्यवहार शिक्षा का आधार कहा जाता है।

लोक साहित्य के संग्रहण की आवश्यकता एवं प्रयास

लोक साहित्य नगर में हो अथवा गांव में वह लोक साहित्य जी और दोनों ही स्थानों पर उसके मूल रूप में क्षय की संभावना बढ़ी है।  एक ओर जहां प्रचलित लोक साहित्य को सहेजना कठिन है तो दूसरी ओर लुप्त, बिखरे और फैले हुए लोक साहित्य का संकलन साहित्य कर्ताओं के लिए एक बड़ी चुनौती है।   प्रत्येक क्षेत्र और समाज का अपना लोक साहित्य है।  उस का संकलन करने से विभिन्न क्षेत्रों की संस्कृति और जीवन को नया रंग प्राप्त होगा।  लोक साहित्य का अध्ययन आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है संपूर्ण विश्व में लोक साहित्य का आपसी समन्वय भी बन रहा है लोक साहित्य के संकलन में प्राप्त सामग्री का संपूर्ण विश्व में अनेक क्षेत्रों में उपयोग किया जा सकता है।  लोक साहित्य के सामाजिक सांस्कृतिक धार्मिक शैक्षणिक नैतिक ऐतिहासिक एवं भाषा वैज्ञानिक क्षेत्र में महत्व को देखते हुए आज इसके संकलन की सबसे बड़ी आवश्यकता महसूस होती है।  लोक साहित्य के संकलन का कार्य अनेक विधियों द्वारा किया जा रहा है जिन का परिचय इस प्रकार है-

1- प्राचीन समय में संग्रहणः

    भारत में लोक साहित्य पर शोध कार्य का प्रारंभ दो दिशाओं में हुआ-
  • अंग्रेज प्रशासकों के वर्ग द्वारा
  • ईसाई प्रचारकों द्वारा

इन दोनों का लक्ष्य भारतीय लोक मानस को  समझ कर अपने अनुकूल बनाना था। प्रशंसक वर्ग भारतीयों के आचार विचार परंपराओं विश्वासों को समझ कर उन्हें नियंत्रित करना चाहता था तो ईसाई प्रचारक धर्म परिवर्तन के अवसरों की खोज में थे। सर कर्नल टॉड की पुस्तक   “एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान अथवा सेंट्रल एंड वेस्टर्न राजपूत स्टेट्स ऑफ इंडिया” ने, सर ग्रियर्सन, विलियम क्रुक, ई. थर्सटन आदि विद्वानों ने दक्षिणी भारत, राजस्थान, पंजाब, बंगाल तथा उत्तर भारत के विभिन्न जनपदों की लोक-संस्कृति के संग्रह, संपादन, अध्ययन तथा प्रकाशन में अत्यधिक भूमिका निभाई।

भारतीय लोक साहित्य के संकलन अध्ययन और प्रकाशन का कार्य काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा किया गया।  कोमल कोठारी (Monograph on Langas of Folk Musical Cast of Rajasthan’  और ‘Folk Musical Instruments of Rajasthan Folio’), रामनारायण उपाध्याय ( ‘लोक साहित्य समग्र’), डॉक्टर सत्येंद्र (ब्रज भाषा का लोक साहित्य), रामनरेश त्रिपाठी (कविता कौमुदी), कृष्ण देव उपाध्याय (लोक साहित्य की भूमिका), वासुदेव शरण अग्रवाल, देवेंद्र सत्यार्थी, श्री झवेरचंद मेघाणी (गुजराती लोक साहित्य),  राम प्रसाद दाधीच, श्याम परमार (मालवी लोक साहित्य),  डॉ. सत्या गुप्ता (खड़ी बोली का लोक साहित्य),  डॉ. अर्जुन देव चारण (राजस्थानी ख्याल साहित्य), डॉ.चंद्रशेखर रेड्डी (आंध्र लोक साहित्य),  डॉ. त्रिलोचन पांडे (कुमायूं लोक साहित्य), डॉ. गोविंद चातक (गढ़वाली लोक गीतों का सांस्कृतिकअध्ययन), डॉ.उदय नारायण तिवारी (भोजपुरी मुहावरे और पहेलियां)  इत्यादि अनेक ऐसी विभूतियां हैं जिन्होंने लोक साहित्य के अध्ययन के क्षेत्र में अपना विशिष्ट योगदान दिया है।

2- वर्तमान में संग्रहणः

    वर्तमान में लोक साहित्य के संकलन का कार्य तीन प्रकार से हो रहा है-
  • शौकिया संग्रहकर्ताः शौकिया संग्रह करता अपने शौक के लिए लोक साहित्य का संग्रह करता है। एक शौकिया संग्रह करता व्यवसाय या लेखक कुछ भी हो सकता है जो अपनी जिज्ञासा हुई थी या सूची के अनुसार लोक साहित्य की विधाएं संकलित कर उनका पठन-पाठन करता है। लोक साहित्य की यह सामग्री अत्यधिक महत्वपूर्ण होती है क्योंकि इसमें व्यक्तिगत रूचि एवं महत्वपूर्ण तथ्य शामिल होते हैं।

  • व्यक्तिगत अनुसंधानकर्ताः व्यक्ति अनुसंधानकर्ताओं का अस्तित्व आरंभ से लेकर आज तक मिलता है। जब कोई व्यक्ति अपने शोध से संबंधित, लेख के लिए, पुस्तक के लिए या आलेख पत्र के लिए लोक साहित्य से संबंधित सामग्री की खोज करता है एवं उन्हें प्रामाणिक तथ्यों के साथ पोस्ट करते हुए प्रस्तुत करता है वह व्यक्तिगत अनुसंधानकर्ता कहलाता है। लोक साहित्य का अध्ययन आरंभ से लेकर आज तक व्यक्तिगत अनुसंधानकर्ताओं द्वारा ही किया जा रहा है। अनुसंधानकर्ता विभिन्न शोध दृष्टियों द्वारा लोक साहित्य का संकलन करता है।

  • संगठित अनुसंधानकर्ताः संगठित अनुसंधानकर्ता दो तरह के होते हैं-
    1. विश्वविद्यालयों के संगठन- जिनमें विभिन्न शोधकर्ता या विभाग अपने अपने हिसाब से लोक साहित्य संबंधी आंकड़ों को एकत्रित करते हैं।

    2. संस्थाओं के संगठन- विभिन्न संस्थाएं भी अपने स्तर पर लोक साहित्य के संकलन का कार्य कर रही हैं।

लोक साहित्य के संकलन एवं संग्रहण से जुड़ी समस्याएं

लोक साहित्य का अध्ययन आज सबसे बड़ी आवश्यकता है।  शिक्षा में इसे महत्वपूर्ण स्थान मिल चुका है तथा विश्वविद्यालयों में भी इसी विषय के रूप में स्वीकारा जा रहा है।  संपूर्ण विषय में लोक साहित्य का आपसी समन्वय भी बन रहा है परंतु लोक साहित्य के संगठन का कार्य अत्यंत कठिन है।  यह मानवीय क्षेत्र है।  हस्तलिखित ग्रंथों की खोज तो कठिन है ही साथ ही उसके प्रकाशन और प्रचार-प्रसार का कार्य भी उतना ही कठिन है।  लोक साहित्य  तो मौखिक अभिव्यक्ति है अतः इसका संकलन अत्यंत कठिन कार्य है। लोक साहित्य के संकलन में  निम्नलिखित बाधाएं उत्पन्न होती है-

1. श्रम साध्य कार्यः

लोक साहित्य  का संकलन अत्यंत परिश्रम का कार्य है।  धरती पुत्रों  द्वारा सहज भाव  गाए जाने वाले गीतों,  सुनाई जाने वाली कथाएं और खेले जाने वाले नाटकों को लिपिबद्ध करना अत्यंत कठिन होता है। वर्तमान में लोक गायक धीरे-धीरे कम होती जा रहे हैं।  पाश्चात्य शिक्षा के प्रचार-प्रसार ने लोकगीतों के प्रति लोगों के मन में उपेक्षा का भावना दिया है केवल वृद्ध पीढ़ी इन गीतों को सुरक्षित रखे हुए है।  दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों के अधिकांश गीत या गाथाएं स्त्रियों द्वारा गाए व सुनाई जाती है।  मित्रों की अधिकांश स्त्रियां पर्दे का व्यवहार करती है तथा ऐसे में पूर्ण जानकारी एकत्रित करना एक दुष्कर कार्य है।  कुछ लोकगीत या लोक गाथाएं ऐसी हैं जो विशेष समय पर ही गई व सुनाई जाती है अतः इनका संग्रह उसी समय किया जा सकता है।  इस तरह लोक साहित्य का संग्रह कठिन काम बन जाता है

2. संदिग्ध विश्वसनीयताः

लोक साहित्य संबंधी आंकड़े मानवीय हृदय के भावों पर निर्भर होते हैं यह आंकड़े प्रत्येक समाज में परिवेश के अनुकूल परिवर्तित होते रहते हैं।  ऐसी स्थिति में लोक साहित्य का संग्रह करने वालों पर विश्वसनीयता संदिग्ध रहती है  अर्थात संग्रह कर्ताओं ने सही आंकड़ों का चयन किया है या नहीं इस पर पूर्ण विश्वास करना कई बार कठिन हो जाता है।

3. प्राचीन परंपराओं पर आधुनिकता का प्रभावः

आधुनिक समय में परंपराओं की महत्ता कम होती जा रही है।  पाश्चात्य सभ्यता का अनुकरण करने वाली आधुनिक पीढ़ी प्राचीन संस्कारों में अधिक विश्वास नहीं रखती।  आधुनिक युग में रात रात भर अलाव के पास बैठकर कथा कहानियां कहने वाले  रिवाज भी समाप्त होते जा रहे हैं।  धार्मिक अवसरों पर गाए सुनाए जाने वाले गीत और कथाएं भी नाममात्र ही शेष रह गई है। आधुनिक संचार माध्यमों जैसे रेडियो और टेलीविजन ने सामूहिक ग्रामीण जीवन को छिन्न-भिन्न कर दिया है।  ऐसी स्थिति में लोक साहित्य  विधाओं का संग्रहण कठिन हो जाता है।

4. धार्मिक अंधविश्वासः

धार्मिक अंधविश्वास भी लोक साहित्य को लिपिबद्ध करवाने में बाधक बनते हैं लोक में निजी ज्ञान को गुप्त रखने की प्रवृत्ति सदा से रही है।  लोक साहित्य का संबंध पर्व त्यौहार,  पूजा-जात्रा,  श्रम-विश्राम, मेले, व्रत, अनुष्ठान आदि से रहता है। लोक गायक समय के विरुद्ध इन्हें गाने सुनाने में सदा आनाकानी करते हैं। लोग अपने धार्मिक विश्वासों को बाहरी लोगों के सामने नहीं लाना चाहते तथा पढ़े-लिखे शोधार्थियों को भी वह शंका की दृष्टि से देखते हैं।  ऐसी स्थिति में सही आंकड़े प्राप्त करना दुष्कर हो जाता है।

5. पुनरावृति में असमर्थताः

अक्सर लोक गायक अपनी मस्ती में लोक गाथाओं या लोकगीतों का गान करते हैं।  सूर, ताल से निबद्ध भावावेश में गाए गए गीत कभी-कभी उसी रूप में संग्रह करना कठिन हो जाता है।  ऐसी स्थिति में किसी छूटी पंक्ति को पुनः गाने में गायक असमर्थ होता है।  इसी प्रकार स्त्रियों के मांगलिक अवसरों पर एक स्वर में गाए गए गीतों का भी उन्हें गायन करना या उन्हें लिपिबद्ध करना समस्या रहती है।

6. भाषा विषयक ज्ञान की कमीः

प्रत्येक समाज की भाषा व बोली अलग-अलग होती है।  संग्रह करता को समाज के इतिहास वह पूर्व परंपरा के साथ-साथ लोक बोलियों की जानकारी होना आवश्यक होता है। एक संग्रह करता के लिए प्रत्येक समाज की भाषा वह बोली को जानना असंभव है।   कई बार लोक गायक परंपरागत शब्दावली भूल जाते हैं तो उसमें अपनी ओर से कुछ ना कुछ जोड़कर उसे आगे बढ़ाते हैं। अतः संग्रहकर्ता के लिए उन छूटे गए अंशों को खोज कर निकाला सरल नहीं होता।

7. अनुसंधानकर्ताओं का उदार एवं अवसरवादी दृष्टिकोणः

विदेशी अनुसंधानकर्ताओं के उदार एवं अवसरवादी दृष्टिकोण के कारण लोक साहित्य से जुड़े कलाकारों को धन पाने की लालसा भी रहती है।  एक साधारण शोधकर्ता  कई बार धनराशि नहीं दे सकता।  अतः लोक कलाकार उसे जानकारी देने में आनाकानी करते हैं।  कई पहाड़ी प्रदेशों में लोक गायक प्रायः मदिरापान आदि के अभ्यस्त होते हैं और शोधार्थी के लिए इसकी व्यवस्था करना सहज नहीं होता।

8. प्रकाशकों की समस्याः

लोक साहित्य का प्रकाशन एक सबसे बड़ी समस्या है।  प्रकाशक वही छापता है जो बिकता है।  विभिन्न बोलियों में रचा गया लोक साहित्य पढ़ने वाले बहुत कम रह गए हैं।  सरकारी विभागों की ओर से भी प्रायः लोक साहित्य और लोक साहित्यकारों को उपेक्षा ही मिलती आई है जिसके कारण लोक साहित्य के प्रकाशन में बाधा उत्पन्न होती है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि लोक साहित्य का संग्रहण एक सबसे बड़ी समस्या और कठिन कार्य है।  वर्तमान युग में जटिल एवं भौतिकता प्रधानता बढ़ती जा रही है जिसके कारण सहज और स्वच्छ प्रवृत्तियों से जुड़े साहित्य का सरंक्षण कठिन होता जा रहा है।  लोक साहित्य के संकलन एवं सरंक्षण के लिए संग्रहकर्ता को क्षेत्र विशेष की परंपराओं का ज्ञान होना आवश्यक है, साथ ही वहां की भाषा पर भी अच्छा अधिकार हो तभी वह वहां की परंपराओं को पूर्णता लिपिबद्ध कर सकता है।  इसके साथ-साथ लोक साहित्य का संग्रह करने वाले व्यक्ति का व्यवहार सामाजिक होना जरूरी है ताकि वह स्थानीय जनता के प्रति सहानुभूति पूर्वक व्यवहार कर उनके विश्वासों, प्रथाओं और अंधविश्वासों के लिए सम्मान प्रदर्शित कर सके।  अन्यथा स्थानीय लोग आत्मीयता के भाव के बिना अपनी प्रथाओं और विश्वासों की जानकारी उसे नहीं देंगे।  इसके साथ-साथ संकलनकर्ता की दृष्टि निष्पक्ष व वस्तुनिष्ठ होनी चाहिए। अधिकांश में लोक साहित्य मौखिक या श्रुत परंपरा में ही जीवित रहता है। ऐसे मैं लोक साहित्य को लिपिबद्ध करना कठिन कार्य है।  जो उस क्षेत्र की बोली को जानता हो या उसके से विशेष की बोली का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन करने में समर्थ हो वही शुद्ध लिप्यंकन कर सकता है।  एक संग्रहकर्ता के लिए विषय बोध,  जिज्ञासा,  दूरदृष्टि,  आत्मानुशासन, ईमानदारी, वस्तुनिष्ठता, निर्भीकता,  धैर्यशील था,  समयनिष्ठा, व्यवहार कुशलता,  परिश्रम और संघर्षशीलता  तथा आधुनिक तकनीकों का जानकारी आदि गुणों का होना आवश्यक है।

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