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B.A 2nd Year (DSC-1)

मृणाल का चरित्र चित्रण

‘त्यागपत्र’ उपन्यास जैनेंद्र कुमार द्वारा रचित प्रसिद्ध उपन्यास है। यह नायिका प्रधान उपन्यास है, इसकी नायिका मृणाल है। उपन्यास का कथा वाचक यद्यपि प्रमोद है परंतु वह गौण पात्र बनकर ही रह जाता है। मृणाल जैनेंद्र के संपूर्ण नारी पात्रों में एक विशिष्ट अविस्मरणीय पात्र है। मृणाल का जीवन उपन्यास का मूल बिंदु है, उसके जीवन की घटनाएं सर्वत्र छाई हुई है। मृणाल के जीवन की त्रासदी व्यक्ति और समाज की तक टकराहट और संघर्ष से उत्पन्न होती है। मृणाल मां-बाप विहीन एक नारी है जो अपनी भाई-भाभी के साथ रहती है। उसका एक भतीजा है प्रमोद जो उससे चार-पांच वर्ष छोटा है वह उसके हर सुख-दुख का साथी है। वह स्वभाव से हंसमुख और चंचल है तथा स्वतंत्र मानसिकता रखती है परंतु समय और समाज की मर्यादाएँ उसकी इस आकांक्षाओं के संसार को नष्ट भ्रष्ट कर देती है। वह अपनी सहेली शीला के भाई से प्रेम करती है परंतु भाभी द्वारा बेंत से पीटे जाने पर प्रेम को भूल जाती है और भाभी के अनुसार जीवन यापन शुरु कर देती है।

भाभी उसका विवाह एक दोहाजु अधेड़ उम्र के व्यक्ति से करवा देती है, जो उसे दुष्टचरित्रा मानकर अनेक प्रकार यातनाएं देता है और अंततः त्याग देता है। असहाय मृणाल दूसरों के घर में काम कर अपना पेट पालती है। एक कोयला बेचने वाला उसके प्रति सहानुभूति जताता है परंतु वह प्यार धोखे का ही एक रूप होता है। वह उसकी सारी कमाई लेकर एक दिन अचानक गायब हो जाता है। वह उस कोयले वाले के साथ भी पत्नीत्व धर्म को निभाती है। अंत में वह तथाकथित मर्यादाप्रिया सभ्य समाज को त्याग कर एक बदनाम बस्ती का हिस्सा बन जाती है। मृणाल जो भी चुनाव करती है वह मन से करती है और उन्हें निभाने की सामर्थ्य भी रखती है। मृणाल के संपूर्ण चरित्र को निम्नलिखित बिंदुओं द्वारा स्पष्ट किया जा रहा है

चंचल स्वभाव एवं कल्पनाशीलता

मृणाल बचपन से ही चंचल स्वभाव और कल्पना के लोग में जीने वाली तथा स्वतंत्र मानसिकता रखने वाली लड़की है। वह अपने जीवन को अपने ढंग से जीना चाहती है। खुले आसमान में पक्षियों की तरह विचरण करना चाहती है परंतु भारतीय समाज की नारी संबंधी मर्यादाएं उसकी स्वतंत्रता में बाधा बनती है। उसकी भाभी उसे तथाकथित सभ्य समाज में आदर्श नारी बनाना चाहती है और उसकी समस्त स्वतंत्र भावनाओं पर अंकुश लगा देती है। मृणाल के इन शब्दों से उसकी कल्पनाओं की उड़ान का आभास होता है, “मैं बुआ नहीं होना चाहती। बुआ!छी ! देख चिड़िया कितनी ऊंची उड़ जाती है। मैं चिड़िया होना चाहती हूं।…… उसके छोटे छोटे पंख होते हैं। पंख खोल कर वह आसमान में जिधर चाहे उड़ जाती है।”

सौंदर्य की प्रतिमा

प्रमोद अपनी बुआ के रूप सौंदर्य का वर्णन करते हुए कहता है कि बुआ बहुत अधिक सुंदर थी। यहां तक कि सभी उसके रूप को देखकर दंग रह जाते थे। उसकी हंसी में जीवन की सार्थकता नजर आती थी। प्रमोद के शब्दों में,“बुआ का तब का रूप सोचता हूं तो दंग रह जाता हूं। ऐसा रूप कब किसको विधाता देता है। पिताजी तो बुआ की मोहनी सूरत पर रीझ रीझ जाते थे। मुझे उसे देखकर कहानी की परियों का ध्यान हो आता और मैं मुक्त भाव से बुआ की ओर आकृष्ट हो जाता।

संघर्षशीलता

मृणाल का संपूर्ण जीवन संघर्षों की दास्तान है।मां-बाप के बिना जीवन व्यतीत करना अपने आप में सबसे बड़ा संघर्ष है, उस पर भाभी द्वारा पग पग पर यातनाएं एवं प्रताड़नाएं देना तथा उसकी स्वतंत्र जीवन शैली में मर्यादाओं की बेड़ियां बांधना इस संघर्ष को और कड़ा कर देता। जिस व्यक्ति से उसका विवाह किया जाता है वह उससे उम्र में कहीं अधिक बड़ा है, फिर भी वह अपना पतिव्रता धर्म निभाती हुई उसके साथ जीवन यापन करना चाहती है परंतु वह उसे दुष्टचरित्रा मानकर त्याग देता है। वह जीवन यापन करने के लिए घर-घर काम करते हैं परंतु किसी पर बोझ नहीं बनना चाहती। कोयले वाला उसे चाहता है परंतु उसका प्यार भी धोखा ही होता है।

अंत में वह बदनाम बस्ती में जाकर बस जाती है जो उस सभ्य समाज से कहीं अधिक बेहतर है। मृत्यु पर्यंत वह उसी बस्ती में जीवन व्यतीत करती है और वहां के लोगों की सेवा सुश्रुषा भी। वह स्वयं इस द्वंद्वं में रहती है कि वास्तव में उसे क्या करना है और क्या नहीं। उसके इस द्वंद ग्रस्त संघर्ष को लेखक कुछ इस तरह व्यक्त करते हैं, “ज्यों-ज्यों जाने का दिन आता उनकी निगाह कुछ बंद थी सी जाती थी। जैसे सामने उन्हें और कुछ नहीं दिखता। ऐसी अपेक्षित पुछती हुई सी निगाह से देखती मानव प्रश्न रोककर भी उत्तर मांगती हो कि मैं कुछ चाहती हूं, पर अरे कोई बताएगा कि क्या।”

स्वतंत्र निर्णय पर चलने की क्षमता

विवाह के बाद जब मृणाल को उसके प्रति द्वारा त्याग दिया जाता है परंतु वह वहां किसी भी तरह उस पर बोझ बन कर रहना नहीं चाहती और न ही वह वापिस मायके आती है। वह समाज की मर्यादाओं को तोड़ना भी नहीं चाहती और उन मर्यादाओं में बंद कर भी नहीं रहना चाहती। वह जो निर्णय लेती है अंत तक उस पर कायम रहती है, “ब्याह के बाद मैंने बहुत सोचा बहुत सोचा।सोचकर अंत में यही पाया कि मैं छल नहीं कर सकती, छल पाप है। हुआ जो हुआ, ब्याहता को पतिव्रता होना चाहिए।” अपने निर्णय पर चलने की कीमत उसे भले ही पग-पग पर चुकानी पड़ती है परंतु वह अपने दृढ़ निश्चय पर कायम रहती है।

स्त्री धर्म में विश्वास

मृणाल पूर्ण रूप में भारतीय नारी है जो स्त्री धर्म में पूर्ण विश्वास रखती है। वह मानती है कि त्याग, दया, ममता, बलिदान यह सब स्त्री के धर्म है जिनका पालन उन्हें हर परिस्थिति में करना पड़ता है। जब उसका अधेड़ उम्र का पति उसे त्याग देता है तब भी वह उसे अपना धर्म मान कर स्वीकार कर लेती है। जब प्रमोद उससे कहता है कि उसने पति द्वारा त्यागे जाने का विरोध क्यों नहीं किया, और उससे अपनी सुरक्षा के लिए कुछ मांगा क्यों नहीं, तो वह कहती है कि वह उसके धर्म में नहीं आता। मृणाल के शब्दों में, “जिसको तन दिया उससे पैसा कैसे लिया जा सकता है यह मेरी समझ में नहीं आता। धन देने की जरूरत मैं समझ सकती हूं।धान स्त्री का धर्म है नहीं तो उसका और क्या धर्म?”

स्वाभिमानी नारी

मृणाल स्वाभिमानी नारी है। अपना जीवन अपने सामर्थ्य के दम पर व्यतीत करना जानती है। पति द्वारा जब उसे यातनाएं दी जाती है, तब वह मायके आकर यह महसूस करती है कि वहां भी उसे पहले जैसे रहने की आजादी नहीं मिल सकती। शादी के बाद लड़की मायके वालों के लिए पराई हो जाती है। वह कहती है, “मैं घर नहीं आ सकती थी। एक बार घर आकर मैं समझ गई थी कि वैसे मायके आना ठीक नहीं है। स्त्री जब तक ससुराल की है तभी तक मायके की है।” इसीलिए वह पति द्वारा त्यागे जाने पर भी वापस घर लौट कर नहीं जाती क्योंकि वह न तो पति पर बोझ बनना चाहती है और न ही भाई-भाभी पर। वह आत्मनिर्भर होकर जीवन व्यतीत करना चाहती है इसीलिए वह घर-घर जाकर काम भी करती है। उसका स्वाभिमानी चरित्र इन शब्दों से पूर्ण तरह व्यक्त होता है,“मैं स्त्री धर्म ही मानती हूं। उसका स्वतंत्र धर्म में नहीं मानती। क्यों पतिव्रता को चाहिए कि पति उसे नहीं चाहता तब भी वह अपना भार उस पर डाले रहे? उन्होंने कहा मैं तेरा पति नहीं हूं तब मैं किस अधिकार से अपने को उन पर डाले रहती।”

प्रगतिशील विचारधारा रखने वाली नारी

मृणाल के माध्यम से लेखक ने परंपरागत नारी के मिथक को तोड़ा है। मृणाल प्रगतिशील चेतना वाली नारी है जो परिस्थितियों से हार कर नहीं बैठती बल्कि डट कर उनका सामना करती है। वह किसी का विरोध नहीं करती, और न ही किसी से कुछ अपेक्षा रखती है। वह संभ्रांत समाज की अव्यवस्थाओं को उद्घाटित करती है तथा तथाकथित सभ्य सुसंस्कृत समाज की स्त्री संबंधी मर्यादाओं को प्रश्नचिह्नित करती है। वह जिस बदनाम बस्ती में जाकर रहती है तथाकथित सभ्य समाज उसे सही नहीं समझता। परंतु वह यह साबित करती है कि इस बदनाम बस्ती में रहने वाले लोग सभ्य एवं संभ्रांत कहे जाने वाले समाज से कहीं अधिक बेहतर है, क्योंकि वह समय आने पर साथ देते हैं न कि कठिन परिस्थितियों में साथ छोड़ते हैं। जब प्रमोद उसे उस बस्ती से निकाल कर अपने घर वापस ले जाना चाहता है तो वह कहती है, “प्रमोद तुमने महाभारत तो पढ़ा होगा।युधिष्ठिर ने जब स्वर्ग गए तो कुत्ते को नहीं छोड़ गए थे। यह बता तेरा घर कितना बड़ा है इन सब को ले चलेगा? यह कुत्ते नहीं है और इनका मुझ पर बड़ा उपकार है।” इस तरह मृणाल अपने समाज की नारियों से कहीं आगे की सोच रखती है।

समर्पण और आत्म संस्कार की मूर्ति

मृणाल आत्मसंस्कार और समर्पण की मूर्ति है। वह समाज से विद्रोह नहीं करती और न ही समाज की मर्यादाओं को तोड़ना चाहती है। आत्मपीड़न, आत्मदाह तथा आत्म संघर्ष द्वारा समाज की खोखली व जर्जर मान्यताओं का विरोध करती है। वह किसी को दुखी नहीं करना चाहती और न ही किसी पर बोझ बनकर रहना चाहती है। इसके लिए उसे आजीवन दुख और यातनाएं भी झेलनी पड़ती है। वह विवाह संस्था का सम्मान करती है तो दूसरी ओर इस संस्था की कमजोरियों को भी उद्घाटित करती है। वह कहती है, “मैं समाज को तोड़ना छोड़ना नहीं चाहती हूं। समाज टूटा तो फिर हम किस के भीतर बनेंगे? यह किसके भीतर बिगड़ेंगे?इसलिए मैं इतना ही कर सकती हूं कि समाज से अलग होकर उसकी मंगल आकांक्षा में खुद ही टूटती रहूं।”

जीवन की सार्थकता को स्पष्ट करती

मृणाल जीवन की सार्थकता को अपने ढंग से पूछती है और प्रस्तुत करती है। वह संघर्षपूर्ण मार्को बनाती है तथा आजीवन अपने मूल्यों के साथ जीती और मरती है। वह अपनी दुरावस्था के लिए किसी को दोष नहीं देती। वह कहती है, “जो समाज में है समाज की प्रतिष्ठा कायम रखने का जिम्मा भी उन पर है। उनका कर्तव्य है कि जो उच्छिष्ट है या उच्छिष्ट बनना पसंद करते हैं, उन्हीं को जीवन के साथ में प्रयोग करने की छूट हो सकती है। प्रमोद यह बात तो ठीक है कि सत्य को सदा नए प्रयोगों की अपेक्षा है लेकिन उन प्रयोगों में उन्हीं को पढ़ना चाहिए जिनकी जान की अधिक दर नहीं रह गई है।”

इस प्रकार कहा जा सकता है कि मृणाल का चरित्र जीवनपर्यंत संघर्ष की कहानी प्रस्तुत करता है। मृणाल स्वतंत्र विचारधारा की स्वामिनी है और अपने जीवन मूल्यों के आधार पर जीवन व्यतीत करना चाहती है। मृणाल आत्मनिर्भर होकर जीना चाहती है परंतु समाज उसे पग-पग पर प्रताड़ित करता है और कठिन परिस्थितियों में कभी उसके साथ खड़ा नहीं होता।अपने मूल्यों, विचारों, मान्यताओं के प्रति ईमानदार रहते हुए कष्ट पूर्ण एवं संघर्षपूर्ण जीवन मार्ग का अनुसरण करती है।

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