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मुक्तिबोध द्वारा रचित एक रग का राग

‘एक रग का राग’ कविता गजानन माधव मुक्तिबोध के काव्य संग्रह ‘भूरि-भूरि खाक धूल’ में संकलित अत्यंत प्रासंगिक कविता है | इस कविता में कवि कहते हैं कि मनुष्य के भीतर के आत्म-संस्कार, आत्म-आलोचना और आत्मा की आवाज आज भ्रष्ट व्यवस्था में दब चुकी है या कुचली जा रही है | यह मनुष्य की रगों को सचेत करने वाली कविता है | यह ‘रग का राग’ या पुकार कभी-कभार जोर मारती है और मनुष्य को सही अर्थों में मनुष्य बने रहने, स्वाभिमान से जीने के लिए प्रेरित करती है | यह कविता कवि की सत्य की खोज की भूख और जिंदगी के अभावों और दबावों में उसके दब जाने, मिट जाने की कथा कहती है | वर्तमान जीवन में किस तरह मनुष्य भोजन और मौज- मस्ती को ही जीवन मानने लग गया है | दूसरों की निंदा और आत्मप्रशंसा ही मुख्य कार्य हो गया है | आज के भौतिकवादी युग में आदर्श और संवेदनाओं का कोई काम ही नहीं रह गया है | जीवन सत्यों को जोड़कर एक आदर्श जीवन जीने की लालसा ही समाप्त हो चुकी है | जीवन के जहर से शरीर,मन सभी सुन्न पड़ चूकें हैं | आज जागृति का आधार चाय की प्याली बनकर रह गई है | कवि आदर्शविहीन, मूल्यहीन जीवन पर दुख: प्रकट करता है | यह एक व्यंग्यात्मक कविता है जो समाज की वास्तविकताओं का उद्घाटन करती है | इस कविता के संदेश एवं कथ्य को निम्नलिखित बिंदुओं द्वारा स्पष्ट किया जा रहा है :-

(1) भ्रष्ट व्यवस्था में दबती आत्म-चेतना

कवि इस कविता के माध्यम से यह स्पष्ट कर रहा है कि वर्तमान समाज पूरी तरह भ्रष्टाचार की गिरफ्त में है| मनुष्य की आत्मचेतना इस भ्रष्ट व्यवस्था में दब चुकी है| कवि इस आत्मचेतना को जागृत करने की बात करता है ताकि मनुष्य की रगों में जोश और स्वाभिमान के रक्त का संचार हो सके और वह इस भ्रष्ट व्यवस्था के प्रति आवाज उठा सके :-

“सुन्न हुई नाड़ियाँ,
गयी आब,पानी अब गया सुख
हृदय में उदासी की फैली हैं
मटमैली
कीचड़ की खाड़ियाँ”

(2) सामाजिक व्यवस्था की विकृतियों का उद्घाटन

कवि एक समाजनिष्ठ, चिंतनशील व्यक्ति है जो समाज में गिरते जीवन मूल्यों तथा बढ़ती विकृतियों के प्रति जनसाधारण को जागृत करना चाहता है| वह लिखते हैं कि यह समाज वैचारिक और आत्मिक रूप से मुर्दा होता जा रहा है| सामाजिक व्यवस्था की शोषण प्रकिया अत्यंत क्रूर एवं जटिल है| कवि इस शोषण तंत्र की प्रक्रिया से पूरी तरह परिचित है तथा अन्य लोगों को भी उससे परिचित करवाना चाहता है :-

“चाहो तो समाजी शोषण-क्रिया की सब –
पाचन क्रिया की सब- आंतड़ियाँ टेबल पर रख दो”

(3)सताधारियों की स्वार्थपरक नीतियों का विरोध

मुक्तिबोध ने इस कविता में सताधारियों की शोषण प्रकिया और स्वार्थपरक तथा दमनकारी नीतियों के प्रति विरोध प्रकट किया है| यह सत्ताधारी वर्ग अपने खजानों को भरने तथा आम आदमी का शोषण करने में व्यस्त है| वह पैसा कमाना ही जीवन की सार्थकता समझ रहा है| उसका एकमात्र लक्ष्य यही है कि वे धनार्जन के रास्ते से क्षणभर भी विचलित न हों और उन्हे उनका विवेक बिल्कुल न सताए अर्थात् अर्थ के लिए अनर्थ करते हुए उनकी आत्मा उन्हें जरा भी न कोसे :-

“कोई सरगर्मी अब छू नहीं पाती है,
हमें तो अपने बैंक नोटों की;
सत्यों में,
बू-खूब आती है|”

(4)वर्तमान जीवन शैली पर व्यंग्य

इस कविता में कवि ने मनुष्य की विवेकशीलता, आत्मचिंतन और आत्म अनुसंधान की वृति के खो जाने पर शोक प्रकट करती है| आज मनुष्य सुविधा भोगी, आत्मग्रस्त और दंभी हो गया है| उसकी जीवन शैली ‘खाओ पियो और ऐश करो’ पर ही आधारित हो गई है:-

“वैसे यह जिंदगी भोजन है मौज है”
“जब तक चाय न मिले, हमारी न होती कभी हाय! सुप्रभात है !!”

(5) निंदा रस की महत्ता : व्यंग्य

कवि मानता है कि वर्तमान समाज निंदा रस में डूब हुआ है| वह सदैव दूसरों की आलोचना और नुक़ताचीनी में लगा रहता है और स्वयं को सर्वश्रेष्ठ बनाने की होड़ में लगा रहता है। अपने भीतर की सच्चाईयोंको जानने का प्रयास कोई नहीं करता है :-

“व्यक्तिगत आलोचनशील
मन,
जोड़ता है निंदा धन,
जोड़ता है जहर और
कंकड़ और पत्थर और कंत मैं गुणिजन”

(6) समाज की पतनशीलता के कारणों का उद्घाटन 

कवि इस कविता में यह स्पष्ट कर रहा है कि अर्थ-लोलुपता अर्थात धन की लालसा ही इस समाज को पतन के गर्त में घसीटती जा रही है| आज पूंजीपति वर्ग, सुविधाभोगी वर्ग की सारी संवेदनाएँ, सारी प्रार्थनाएं  पैसे तक ही सीमित हो चुकी है :-

असल तो यह है कि , कोई अर्थ मर गया
देखते ही देखते, लेकिन वह जिंदगी का
नक्शा पेश कर गया॥ संवेदन यही है,
संवेदन का निवेदन यही है”

(7) अतीत के साथ वर्तमान की तुलना

कवि कहता है कि अतीत में भी समाज में बुराइयाँ  थी परंतु उन बुराईयों से लड़ा जाता था तथा सदैव उनसे दूर रहने का प्रयास किया जाता था परंतु आज मनुष्य ने इन्ही बुराइयों को जीवन का अंग बना लिया है और उन पर विजय प्राप्ति की लालसा ही खो दी है| आज का व्यक्ति अतीत की भांति इन बुराइयों का विरोध नहीं करता:-

“पूर्व युगों में भी खूब बुराइयाँ रही आयी
उनसे डरा जाता था, उनसे लड़ा जाता था किन्तु उसी अमंगल की आज सिर्फ
सहा जाता हास कह”

(8) खंडित जिंदगी का अभिशाप

कवि को इस बात का दुख: है कि आजादी के पश्चात भी भारतीय समाज में कोई सर्वांगीण, अखंड जीवन दृष्टि विकसित नहीं कर पाया| हमारे भीतर उत्साह, लग्न और त्याग भाव ही समाप्त हो गया है| जीवन के सत्य की खोज आज पेट भरने की चिंता मात्र है:-

“स्नायुतंत्र गति में मन-बुद्धि गिरफ्तार
खंडेरों में छुपे हुए,किसी तहखाने में अजाने,
खोजते हैं, किंवदंत खजाना और इस
पागल-सी खोज को कहते हम
सत्यानुसंधान”

(9) भाषा शैली

इस कविता की भाषा मिश्रित हिन्दुस्तानी है तथा ओजस्वी एवं भावपूर्ण है| इसकी शैली संवादात्मक एवं उद्बोधन परक है| मुक्त छंद का अपना एक विशिष्ट सौन्दर्य है| मुहावरों एवं लोकोक्तियों के साथ-साथ व्यंग्य का सटीक प्रयोग हुआ है:-

ह्रदय की लुटिया से दिमाग की
मोरी में,
पानी डाल, जमी हुई
कोई सब निकालना !!

अंध कौन, बहरा कौन,
एक नेत्र कौन कहाँ उट्ठा है
सब हमें मालूम,
कौन किस उल्लू का कितना बड़ा
पट्ठा है|

इस प्रकार कहा जा सकता है कि आज का मनुष्य मशीनी और कृत्रिम ज़िंदगी जी रहा है| वह उच्चतर जीवन मूल्यों से पूरी तरह मुँह फेर चुका है| आज के मनुष्य को ‘रग’ अर्थात आत्मा की पुकार सुनने की आवश्यकता है ताकि मनुष्य इस उबाऊ और अकर्मण्य और निर्थरक ज़िंदगी में कोई मकसद कोई लक्ष्य तय कर सके| वह समाज के प्रति अपना दायित्व निभा सके।

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