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मुक्तिबोध द्वारा रचित कविता भूल-गलती

गजानन माधव मुक्तिबोध आधुनिक युग में प्रगतिवादी और प्रयोगवादी कविता में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से सुधरी और मानवतावादी परंपरा को आगे बढ़ाया। सौंदर्य प्रेम और मानव-मात्र का सुख-दुख उनके काव्य के शाश्वत् विषय हैं। उनका काव्य आत्मान्वेषण और आत्माभिव्यक्ति की खोज का काव्य है। वे किसी वाद के गुलाम नहीं थे। उन्हें प्रगतिवाद और नई कविता के बीच का सेतु भी माना जाता है। अंधेरे में आत्म की खोज, विचार और कर्म का द्वंद्व, परम अभिव्यक्ति की खोज, शोषण मुक्त समाज की कल्पना, पूंजीवाद का विरोध, शोषितों के प्रति सहानुभूति तथा फैंटसी शिल्प द्वारा समाज और व्यवस्था की वास्तविकताओं का चित्रण उनके काव्य के प्रमुख बिंदु है।

भूल-गलती नामक उनकी कविता उनके काव्य संग्रह चाँद का मुँह टेढ़ा में से ली गई है। यह कविता मानव मात्र की अस्मिता की खोज की कविता है। कवि कहता है कि मानव अपनी भूलों और गलतियों के कारण भ्रष्ट व्यवस्था को जन्म देते हैं और वही भ्रष्ट व्यवस्था क्रूर तानाशाह की तरह मानव की सभी अच्छाईयों को कुचलकर या तो उन्हें अपना सहायक बना लेती है या फिर अपना गुलाम। कवि कहना चाहता है कि जो सही मायनों में ईमानदार है और जिसके भीतर क्रांति की ज्वाला विद्यमान है उसे कोई भी बुरी व्यवस्था कुचल नहीं सकती और सही समय पाकर कोई क्रांतिकारी मनुष्य उठ खड़ा होता है और चुनौती देता है, उस भ्रष्य व्यवस्था और शासक को। यह व्यक्ति शोषित मन की आशा बनकर उभरता है। भूल-गलती नामक यह कविता हमारे भ्रष्ट तंत्र का सजीव चित्र प्रस्तुत करती है। इस कविता की विशेषताओं को निम्नलिखित बिंदुओं द्वारा स्पष्ट किया जा रहा हैः

क) भ्रष्टाचार का भला नाम ‘भूल-गलती’ :-

कवि ने इस कविता का नाम भूल-गलती भ्रष्टाचार के पर्याय के रूप में रखा है। आज यह भ्रष्टाचार रूपी भूल-गलती हमारे दिलों के सिंहासन पर पूर्ण रूप से विराजमान हो चुकी है और समस्त व्यवस्था और उसके उपकरणों को अपने स्वार्थ हेतु उपयोग कर रही है। यह भ्रष्टाचार किसी क्रूर तानाशाह की तरह सब कुछ अपने स्वार्थ की वेदि पर स्वाह करने को तैयार है। कविता का एक उदाहरण देखिएः-

भूल-गलती
आज बैठी है जिरहबख्तर पहनकर
तख्त पर दिल के
चमकते हैं खड़े हथियार उसके दूर तक
आँखें चिलकती है नुकीले तेज पत्थर सी।

ख) भ्रष्ट व्यवस्था का सजीव चित्रण :-

यह कविता हमारे भ्रष्ट तंत्र का सजीव चित्र प्रस्तुत करती है। यह भ्रष्ट तंत्र हमारी व्यक्तिगत अथवा सामाजिक भूल-गलतियों का परिणाम है। यह भ्रष्ट तंत्र ईमान को कुचलने-दबाने का प्रयास करता है तथा इसके अधीन हर वर्ग का व्यक्ति मुँह बंद किए हर तरह का शोषण सहने को विवश है। इस भ्रष्ट तंत्र को तानाशाह का विकराल स्वरूप प्रस्तुत करते हुए मुक्तिबोध लिखते हैः-

लोहे का जिरहबख्तर पहन,
खूंखार हाँ, खूँखार आलीजाह,
वो आँखों की सच्चाई निकाले डालता
सब बस्तियाँ दिल की उजाड़े डालता,
करता, हमें वह ढेर।

ग) ईमानदारी की निर्भयता का चित्रण :-

मुक्तिबोध चित्रित करते हैं कि इस भ्रष्टाचार के दरबार में ईमानदारी को लोहे की बेड़ियों में जकड़कर लाया गया है। ईमानदारी की निडरता और निर्भयता देखते ही बनती है। तानाशाही शासक द्वारा ईमानदारी को तरह-तरह की प्रताड़नाएँ दी जा रही है, परंतु वह भी सब कुछ सह रही है और तानाशाह की आँखों में आँखें गड़ाए खड़ी है। वह किसी भी सूरत में इस भ्रष्ट व्यवस्था का अंग नहीं बनना चाहतीः-

वह कैद कर लाया ईमान
सुल्तानी निगाहों में निगाहें डालता
बेखौफ़ नीली बिजलियों को फेंकता।

घ) आजादी की भावनाओं को कुचलती व्यवस्था :-

कवि कहता है कि यह भ्रष्ट व्यवस्था मानव की आजादी की भावनाओं का सबसे बड़ी शत्रु है। यह सच्चाई नहीं देखना चाहती। यह सच को अंधा बना देती है और व्यक्ति की स्वतंत्र भावनाओं को कुचलना ही अपना लक्ष्य समझती है। आम आदमी की कमजोरियाँ, भय और आशंकाओं को यह कवच की तरह धारण कर उन्हें अपना गुलाम बनाए रखती है। मुक्तिबोध के शब्दों मेः-

हम सब कैद हैं,
उसके चमकते ताम झाम में,
शाही मुकाम में।

ङ) बुद्धिजीवी वर्ग की स्वार्थपरता का चित्रण :-

कवि इस कविता के माध्यम से बुद्धिजीवी कहलाए जाने वाले वर्ग की स्वार्थपरता का भी यथार्थ चित्रण करते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि बड़े-बड़े बुद्धिजीवी, दार्शनिक, जमींदार, शायर और कवि, बड़े-बड़े सिपाही सभी भ्रष्टाचार के दरबार में मूक-बधिर बने बैठे हैं। वे तानशाही की शोषित नीतियों का विरोध नहीं करते बल्कि उनका पूर्ण समर्थन करते हैं।  वे सभी अपने स्वार्थों की पूर्ति हेतु इस भ्रष्ट व्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाते जाते हैं। कवि के शब्दों में,

सब खामोश!
सब खामोश।
मनसबदार,
शायर और सूफ़ी,
अलगजाली, इब्नेसिन्ना, अलबरूनी,
आलिमो फ़ाज़िल, सिपहसालर, सब सरदार
है खामोश।

च) क्रांति की चाह :-

कविता के अंत में भ्रष्टाचार के दरबार से किसी बेनाम व्यक्ति का भाग जाना, कवि के हृदय में छिपी क्रांति की चाह है। कवि पूर्णत परिलक्षित करते हैं कि क्रांति की चिंगारी और सच्चाई की आग ही वह साधन है जिसके द्ववारा शोषणकारियों के तख्त को पलटा जा सकता है। मुक्तिबोध तानाशाह का विरोध करने वाले उस बेनाम व्यक्ति के विषय में लिखते हैः-

मुहैया कर रहा लश्कर,
हमारी हार का बदला चुकाने आएगा
संकल्प धर्माचेतना का रक्तप्लावित स्वर।

छ) अस्मिता की खोज का काव्य :-

वास्तव में भूल-गलती नामक यह कविता अस्मिता की खोज का काव्य है। कवि इसके माध्यम से आम आदमी की भावनाओं को जगाने का प्रयास करता है। क्रांति का प्रारंभ किसी आत्मचेता व्यक्ति द्वारा ही संभव है। जब कोई एक ईमानदार व्यक्ति क्रांति की मशाल उठाता है तो सारी भीड़ अपने आप उसके साथ जुड़ती चलती है क्योंकि यह भीड़ भी शोषण से मुक्ति की कामना रखती है और उसे पाने हेतु एक सही मार्गदर्शन चाहती हैः-

हमारे ही हृदय का गुप्त स्वर्णाक्षर
प्रकट हो विकट हो जाएगा।

ज) फैंटसी शिल्प :-

मुक्तिबोध का संपूर्ण काव्य फैंटसी शिल्प पर आधारित है। यह कविता ‘भूल-गलती’ भी फैंटसी के आधार पर समाज की वास्विकताओं का चित्रण करती है। यहाँ भ्रष्टाचार एक क्रूर बादशाह का प्रतीक है, जिसके दरबार में प्रत्येक वर्ग का व्यक्ति सिर झुकाए खड़ा है। इस दरबार से कोई एक शोषित व्यक्ति क्रांति का आह्वान करता है। वह कहीं दूर भागकर चला जाता है और वहाँ जाकर तानाशाह के विरूद्ध एक सेना तैयार करता है। यह कल्पना प्रत्येक समाज के मन में छुपी सुनहली आशा का प्रतिबिंब है, जहाँ उसे भ्रष्टाचार और शोषण से मुक्ति की उम्मीद नजर आती है।  

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