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बी.ए. तृतीय वर्ष (GE-1)

नवजागरण का भारतीय साहित्य पर प्रभाव

जागरण का अर्थ है जागृत होना, नींद से जागना, जनमानसिकता में नवचेतना,  स्वतंत्र चिंतन,  ऐसी चेतना जो पहले कभी न आई हो। जागरण शब्द का अर्थ है जब कोई देश, जाति या समाज अपनी वास्तविक परिस्थितियों और उसके कारणों का ज्ञाता हो जाता है एवं  अपनी उन्नति और रक्षा के लिए सचेत हो जाता है। नवजागरण के लिए प्रायः कई पर्यायवाची शब्दों का प्रयोग किया जाता है जैसे-पुनर्जागरण, पुनरुत्थान, नवजीवन, नवजागृति, नवोत्थान आदि। परंतु आधुनिक संदर्भों में देखे तो अंग्रेजी शब्द रिनेसाँ का पर्यायवाची नवजागरण है। नवजागरण एक अवधारणा है, जिसका विकास भिन्न-भिन्न देशों में विभिन्न ऐतिहासिक परिस्थितियों, कालों एवं विभिन्न रूपों में हुआ। रिनेसां का काल प्रायः पश्चिमी युरोप जिसमें इटली, फ्रांस, ब्रिटेन, स्पेन, जर्मनी जैसे देश आते हैं, इनकी सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रगति का काल माना जाता है। इस काल में कला, संगीत, साहित्य और विज्ञान के क्षेत्र में परिवर्तन हुआ। सर्वप्रथम पुनर्जागरण का आरंभ इटली से हुआ।  

भारत में नवजागरण 19वीं शताब्दी के आसपास आरंभ हुआ।  उस समय भारत  विदेशी शासन के पराधीन था।  अतः पराधीनता से  मुक्ति हेतु समाज में एक नवीन चेतना आई  जिसे नवजागरण का नाम दिया गया।  नवजागरण का  श्रेय राजा राम मोहन राय को जाता है जिन्होंने ब्रह्म समाज की स्थापना की और समाज सुधार संबंधी अनेक विचार एवं धारणाओं का विकास किया। नवजागरण में नए, तर्कसंगत, विवेकसम्मत एवं युग के अनुरूप विचारों और व्यवहारों को अपनाने पर बल दिया गया। भारतीय नवजागरण  को लेकर विद्वानों में अलग-अलग धारणाएं  है-

डॉ अमरनाथ के अनुसार, “ भारत में नवजागरण को लेकर अलग-अलग  अवधारणाएं हैं।  कुछ लोग मानते हैं कि पहला नवजागरण गौतम बुद्ध के आविर्भाव के साथ आया है।  बुद्ध ने पुरानी जड़ अवधारणाओं को तोड़कर मनुष्य मनुष्य के भीतर के भेद को मिटाया जिसका प्रभाव मध्य एशिया तक फैल गया।  दूसरा नवजागरण भक्ति काल में दिखाई पड़ता है।  तीसरा नवजागरण अंग्रेजी सभ्यता के संपर्क में आने के बाद, खासतौर पर 1857 के प्रथम स्वाधीनता आंदोलन के बाद शुरू हुआ जिसका केंद्र खासतौर पर बंगाल था।  ब्रह्म समाज,  आर्य समाज,  प्रार्थना समाज,  थियोसॉफिकल सोसायटी  जैसे विविध आंदोलन तथा विवेकानंद, रवींद्र नाथ टैगोर,  महात्मा गांधी, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, महर्षि अरविंद आदि विचारक इसके प्रमुख सूत्रधार थे।” 

शंभू नाथ के अनुसार, “भारतीय नवजागरण के अनेक दुर्भाग्यों में से एक यह भी है कि इसे सौ वर्ष से ज्यादा न मिल सके जबकि पश्चिमी देशों को तीन-तीन चार-चार सौ वर्ष मिले। वहां विज्ञान, प्रौद्योगिकी, सुधारवाद, अनुभववाद, आदर्शवाद, अंतरराष्ट्रीयवाद आदि को पनपने का पूरा अवसर मिला। नवजागरण वहां विकसित राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग के नेतृत्व में आया तथा स्वतंत्र राजनीतिक वातावरण में पनपा।” 

                          भारत में दो प्रकार की सुधारवादी धारणाओं का प्रचलन था- एक वे जो समाज सुधार हेतु अतीत से प्रेरणा लेना देना चाहते थे और ‘वेदों की ओर चलो ‘ का संदेश देते थे और दूसरे वे थे जो पश्चिमी विचारधारा के अनुसार विकास करना चाहते थे। इस प्रकार भारतीय नवजागरण में पुनरुत्थान और नवजागरण के भाव एक साथ चल रहे थे। भारतीय नवजागरण की प्रमुखतः तीन विशेषताएं थी-

  1. मानवतावाद
  2. धर्मनिरपेक्षता
  3. प्राचीन संस्कृति पर निर्भरता

नर नारी की समानता, आर्थिक दृष्टि से सबको समान अवसर देना, सांस्कृतिक दृष्टि से सभी को व्यक्तिगत आजादी प्रदान करना तथा सभी को शिक्षा के समान अवसर प्रदान करना भी नवजागरण चेतना के प्रमुख अंग थे। नवजागरण में विज्ञान पर आधारित तर्कसंगत विचारों को महत्ता प्रदान की गई और भाग्यवाद, परलोकवाद,  पुनर्जन्मवाद तथा अन्य अंधविश्वासों को नकारने पर बल दिया गया। भारतीय नवजागरण के विचारकों ने नए विचारों और धारणाओं को भारतीय संस्कृति की नींव पर स्थापित किया।

भारतीय साहित्य और नवजागरणः

भारतीय इतिहास एवं साहित्य में नवजागरण 19वीं शताब्दी के अंतिम दशकों में प्रारंभ हुआ।  यही समय है जब भारतीय भाषाओं के साहित्य में भी नवजागरण और स्वाधीनता आंदोलन का गहरा प्रभाव पड़ा।  भारतीय भाषाओं में नवजागरण के अनुकूल नए विषयों को अपनाने,  समाज सुधार के विभिन्न आयामों पर  लिखने तथा स्वाधीनता संग्राम के नेताओं और घटनाओं पर  विवेचन करने की परंपरा चली।  ब्रिटिश राज की सत्ता का केंद्र कोलकाता अर्थात बंगाल रहा इसलिए अंग्रेजी शिक्षा के प्रभाव और प्रतिरोध में नवजागरण और पुनरुत्थान की शक्तियां सर्वप्रथम वही दिखाई पड़ी।  तत्पश्चात् हिंदी, मराठी, गुजराती पश्चिम भारतीय क्षेत्रों एवं तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम के दक्षिणी क्षेत्रों और बांग्ला, असमिया आदि के पूर्वी क्षेत्रों में इन आंदोलनों की गूंज एक साथ सुनाई पड़ी। भारतीय साहित्य पर नवजागरण के प्रभाव को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से स्पष्ट किया जा रहा है-

1- भारतीय नवजागरण एवं राष्ट्रीय चेतनाः

भारत में नवजागरण फॉर्म प्रारंभ राजा राममोहन राय के लेखन से माना जाता है।  यह केवल नवीन जीवन पद्धति,  नवीन अर्थव्यवस्था  और सामाजिक व्यवस्था का पक्षधर बनकर ही नहीं बल्कि इसमें राष्ट्रीयता के भावों को भी विकसित करने में सहायता की।  इस राष्ट्रीय चेतना के विकास में हिंदी भाषा और साहित्य ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।  मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में,  हम कौन थे,  क्या हो गए और क्या होंगे अभी,  के अनुसार अपने गौरव की अपनी अस्मिता की खोज होने लगी।  लगभग सभी भारतीय भाषाओं के साहित्यकार  पराधीनता से मुक्ति हेतु एवं राष्ट्रीय चेतना विकसित करने के लिए साहित्य रचना करने लगे।  भारतीय नवजागरण ने साहित्य को एक नवीन लेखन भूमि प्रदान की।  नवजागरण का आधार वर्तमान स्थितियां और उन स्थितियों में सुधार था, साथ ही वे नए विचारों को अपनाने पर बल दे रहे थे।  तत्कालीन साहित्य इन्हीं सुधारो एवं विचारों का व्याख्यान करता है।

2- साहित्य में समाज सुधार और नव जागरणः

भारत में नवजागरण व्यापक समाज सुधार लेकर आया।  स्वाधीनता के लिए किया जाने वाला संघर्ष विदेशी शासन से मुक्ति के साथ-साथ सामाजिक-धार्मिक रूढ़ियों,  असमानताओं  और पिछड़ेपन से मुक्ति का संग्राम भी बन गया। इन सुधारों की प्रेरणा कुछ तो पश्चिमी विचारों के संपर्क में आने से मिली और कुछ परंपराओं के अध्ययन मनन से। नवजागरण मानवतावादी चेतना का भी प्रतीक बनकर उभरा। जहां तक साहित्य की बात है इसका प्रारंभ भारतेंदु युग से माना गया है। इस युग का पूरा साहित्य समाज सुधारों पर आधारित था, जिनमें स्वचेतना का विकास, अंधविश्वासों का खंडन, नवीन शिक्षा पद्धति का विकास, सती प्रथा की समाप्ति,  बाल-विवाह का विरोध,  विधवा विवाह को मान्यता दिलाना, वैज्ञानिक तर्कसंगत विचारों को मान्यता आदि प्रमुख हैं।  इन सभी विषयों को लेकर भारतीय साहित्य में लेख आने प्रारंभ हो गए।  अनेक सांस्कृतिक एवं साहित्यिक संस्थाएं स्थापित हुई जिनके माध्यम से नवजागरण का संदेश जन-जन तक पहुंचा।

3- स्वतंत्रता संग्राम और नवजागरणः

स्वाधीनता संग्राम का आधार राष्ट्रीयता का भाव है।  उनका पहला चरण ही 1857 का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम रहा।  हिंदी नवजागरण की सबसे पहली विशेषता हिंदी प्रदेश की जनता में स्वातंत्र्य चेतना का जागृत होना है।   तत्कालीन समय के मानसिक एवं भावनात्मक निराशा के वातावरण से निकालकर भारतीयों को अपनी संस्कृति और सभ्यता पर गर्व करना नवजागरण के नेताओं, स्वाधीनता सेनानियों तथा स्वाधीनता संग्राम हेतु लिखने वाले साहित्यकारों ने ही सिखाया। आजादी की लड़ाई में आत्माभिमान और आत्मगौरव की स्थापना नवजागरण द्वारा ही संभव हो पाई  और साहित्यकारों ने युगीन चेतना को स्पष्ट करते हुए जन भावनाओं को व्यक्त करने का कार्य किया।

4- साहित्य में उपनिवेशवाद का विरोधः

नवजागरण का साहित्य पर एक अन्य प्रभाव यह पड़ा कि अब साहित्यिक रचनाओं में उपनिवेशवाद का विरोध होने लगा।  नवजागरण काल में उपनिवेशवाद की कटु आलोचना और सामाजिक धार्मिक रूढ़ियों का विरोध आधुनिक हिंदी कविता की पहचान बना।  अंग्रेजों की भूमि व्यवस्था द्वारा भारतीय ग्रामीण व्यवस्था का बिखरना, स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत,  गांधीवादी विचारधारा का देश पर बढ़ता प्रभाव आदि ने उपनिवेशवादी व्यवस्था के विरोध में मार्ग प्रशस्त किया। साहित्य में भाषा धर्म प्रांत और संप्रदाय के भेद मिट गए और समस्त साहित्यकारों ने आजादी की लड़ाई को लेखनी द्वारा लड़ना प्रारंभ किया।  उपनिवेशवादी मानसिकताओं की  जड़ों को खंगाल कर साहित्य ने  जन चेतना को सचेत करने का कार्य किया।

5- भारतीय नवजागरण और हिंदी भाषाः

हिंदी नवजागरण का प्रमुख एजेंडा हिंदी की राहत याद करना था।  हिंदी को राजभाषा और राष्ट्रभाषा बनाने के लिए आंदोलन इसी समय चले।  रामविलास शर्मा के अनुसार किसी भी समाज का नवजागरण उसके जातीय स्वरूप को स्पष्ट करता है।  हिंदी प्रदेश का नवजागरण हिंदी जाति का नवजागरण है।  नवजागरण से प्रभावित साहित्य के बारे में रामविलास शर्मा लिखते हैं, “इस साहित्य में किसानों को लक्ष्य करके उन्हें संगठित और आंदोलित करने की दृष्टि से जितना गद्य-पद्य लिखा गया है उतना दूसरी भाषाओं में नहीं लिखा गया।”  हिंदी साहित्य में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने जिस आधुनिक युग को प्रारंभ किया उसकी जड़ें नवजागरण और स्वाधीनता आंदोलन में ही बसी थी। हिंदी क्षेत्र में नवजागरण मूलतः आत्मपहचान का संघर्ष बनकर आया। इसे साहित्यकारों ने अपने साहित्य में प्रमुख स्थान दिया। हिंदी राष्ट्रीय एकता स्थापित करने में  महत्वपूर्ण सूत्र धार बनी।

6- भारतीय भाषाएं और नवजागरणः

नवजागरण का प्रभाव भारतीय भाषाओं पर वैसा ही पड़ा जैसा हिंदी पर।  बांग्ला भाषा तो नवजागरण के केंद्र में रही क्योंकि ब्रिटिश सत्ता का प्रारंभ बंगाल अर्थात् कलकत्ता से हुआ था।  मराठी, गुजराती, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम, असमिया आदि भाषाओं में भी नवजागरण के आंदोलनों की गूंज सुनाई देने लगी।  भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों ने देश में  नव चेतना जागृत करने का हर संभव प्रयास किया।  इन्होंने अपने साहित्य के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना ही नहीं बल्कि तमाम समाज सुधारों को अभिव्यक्ति दी।नवजागरण के जो मूल बिंदु थे उन्हें भारतीय भाषाओं में हर विधा द्वारा व्यक्त किया गया।

7- नवजागरण के प्रमुख साहित्यकारः

नवजागरण की प्रमुख साहित्यकारों में भारतेंदु हरिश्चंद्र का नाम सर्वोपरि है। भारतीय नवजागरण के अग्रदूत के रूप में प्रसिद्ध भारतेन्दु जी ने देश की गरीबी, पराधीनता, शासकों के अमानवीय शोषण का चित्रण को ही अपने साहित्य का लक्ष्य बनाया। उनकी रचनाएं भारत दुर्दशा अंधेर नगरी आदि अंग्रेजी शासन की प्रतिरोधी रचनाएं हैं।  इसी तरह भारतेंदु मंडल के साहित्यकार, महावीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिलीशरण गुप्त, श्रीधर पाठक, सियारामशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद, निराला, सुभद्राकुमारी चौहान आदि ने अपनी साहित्यिक रचनाओं द्वारा नवजागरण के मूल्यों को अपनाया जिनमें राष्ट्रवाद की गूंज समाहित थी। इसके अतिरिक्त भारतीय भाषाओं में चंतुमेनन, रवींद्र नाथ टैगोर, बंकिमचंद्र चटर्जी, कुंवेपु, रामदास आदि साहित्यकारों ने नवजागरण को आधार बनाकर साहित्य रचना की।

8- भारतीय नवजागरण और हिंदी पत्रकारिताः

पत्र-पत्रिकाओं ने नवजागरण में  अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राजा राममोहन राय ने जन जागरण के लिए पत्रकारिता का सहारा लिया।  1821 ई. में उन्होंने ‘संवाद कौमुदी’ नामक पत्र बांग्ला में निकाला तो 1822 ईस्वी में ‘मिरातउल अखबार’ फारसी भाषा में निकाला तो 1829 में ‘बंगदूत’ पत्र हिंदी भाषा में प्रकाशित किया। नवजागरण के लगभग सभी सूत्रधारों ने पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से नव चेतना का विकास किया। आरंभिक साहित्यिक पत्रिकाओं जैसे उदंत मार्तंड प्रजा मित्र आदि में भी नवजागरण की भावना को बल मिला। भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनके मंडल के सभी कवियों तथा अन्य सभी समाज सुधारकों एवं नवजागरण के पुरोधाओं ने पत्रकारिता को साहित्य और जागरण का माध्यम बनाया।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि उन्नीसवीं सदी में और बीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों में हुए समाज सुधार आंदोलनों, देशभक्त-राष्ट्रवादी चेतना के उत्थान और साहित्य-कला-संस्कृति में हुई अनूठी प्रगति के दौर को नवजागरण की संज्ञा दी जाती है। इस दौरान समाज सुधारकों, साहित्यकारों और कलाकारों ने स्त्री, विवाह, दहेज, जातिप्रथा और धर्म संबंधी स्थापित परम्पराओं को चुनौती दी। इस घटनाक्रम ने समग्र भारतीय आधुनिकता की निर्मितियों पर अमिट छाप छोड़ी। इसी नवजागरण के दौरान भारतीय राष्ट्रवाद के शुरुआती रूपों की संरचनाएँ सामने आयीं।

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