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B.A 2nd Year (DSC-1)

प्रमोद का चरित्र चित्रण

प्रमोद जैनेंद्र द्वारा रचित उपन्यास त्यागपत्र का प्रमुख पात्र है। वह उपन्यास का कथा वाचक है। प्रमुख रूप से प्रमोद कथा का पात्र है परंतु वह एम. दयाल चीफ जस्टिस है, जिसकी यह कथा है अर्थात् उपन्यास की प्रस्तावना में जो सर एम. दयाल की बात कही गई है, यह उपन्यास उन्हीं की आत्मकथा है। एम. दयाल ही प्रमोद थे जो हरिद्वार में संन्यासी बनकर रहे थे। इस उपन्यास की कथा प्रमोद की बुआ मृणाल के जीवन की त्रासदी पर आधारित है।

डॉ.जैनेंद्र प्रमोद के विषय में लिखते हैं,”प्रमोद मृणाल के बढ़ते हुए दर्द का तापमापक  है।”

कहने का भाव है कि प्रमोद का समग्र व्यक्तित्व मृणाल से संबंध है। मृणाल के जीवन की वेदना एवं शोषण के साथ-साथ प्रमोद के मन की टीस और वेदना भी बढ़ती जाती है। प्रमोद उपन्यास का नायक होने के साथ-साथ कथावाचक भी है। वह बुआ मृणाल के साथ घटित तमाम घटनाओं का साक्षी है। अंत में वह बुआ के दर्दनाक एवं पीड़ामय जीवन के अंत के लिए स्वयं को दोषी मानता है और जज के पद से त्यागपत्र देकर सन्यासी हो जाता है। प्रमोद अनेक बार अपनी बुआ के उद्धार की चेष्टा करता है।वह समाज की जूठन एवं अपराधियों के बीच से मृणाल को निकालकर सभ्य समाज में लाना चाहता है परंतु तथाकथित सभ्य समाज के अवगुणों के कारण वह पूर्ण रुप से बुआ के प्रति समर्पित नहीं हो पाता। वह सामाजिक मान मर्यादा एवं पद-सम्मान के द्वंद में फंस कर रह जाता है। असहाय और रोगी बुआ के खर्चे के लिए कुछ रुपए एक वकील के पास छोड़कर वापस उसी समाज में लौट आता है।वह संवेदनशील तो है परंतु सामाजिक रूढ़ियां उसका पीछा नहीं छोड़ती। वह आत्मचिंतन से ग्रसित पात्र है।

नंददुलारे वाजपेई के शब्दों में, “प्रमोद की उच्चाभिलाषा, उसकी सहानुभूति आदर्शवादिता और जजी भी मृणाल की विद्रोही ज्वाला और ज्योति के समक्ष निष्प्राण और अर्थहीन है। मृणाल में समर्पण और बलिदान की पुकार है, प्रमोद में एक थोथे गौरव का वृथा संसार।” प्रमोद की चारित्रिक विशेषताओं को निम्नलिखित बिंदुओं द्वारा स्पष्ट किया जा रहा है-

स्नेह शील एवं संवेदनशीलः

प्रमोद बेहद संवेदनशील एवं अपनी बुआ के प्रति स्नेहशील है। वह अपनी बुआ की पीड़ा को भली-भांति महसूस करता है।  बुआ के प्रति अपनी माँ के व्यवहार से भी वह परिचित है तथा माँ के इस अमानवीय व्यवहार के प्रति वह अपना रोष भी प्रकट करना चाहता है परंतु भय के कारण ऐसा कर नहीं पाता। जब मृणाल के प्रेम प्रसंग के विषय में प्रमोद की माँ को पता चलता है तो वह मृणाल को बेंत से मार-मारकर बेहोश कर देती है। प्रमोद इस संवेदनशील संदर्भ को प्रस्तुत करते हुए कहता है, “बदन का कपड़ा बेहद मार से झीना हो गया है। जगह-जगह नील उभर आए हैं। कहीं लहू भी झलक आया है। बुआ गुमसुम पड़ी है। मुझे वहां थोड़ी देर रहना भी असह्य हो गया। मुझसे कुछ भी बोला नहीं गया। बुआ के गले लग कर वही थोड़ा रो लेता तो ठीक होता।”  घर के सारे लोग जब मृणाल को चरित्रहीन मानकर उससे संबंध तोड़ लेते हैं तब भी वह उसके प्रति संवेदनशील बना रहता है। अंत तक वह अपने सर्वस्व की बाज़ी लगाकर भी अपनी बुआ के दुर्भाग्य पर विजय प्राप्त करना चाहता है।

अध्ययनशीलः

प्रमोद पढ़ने-लिखने में अत्यधिक रूचि रखता है। वह जीवन में एक अच्छा मुकाम हासिल करना चाहता है। अपनी अध्ययनशील प्रवृत्ति के कारण ही वह समाज का एक नामी वकील बनता और उसके बाद जज के पद पर आसीन होता है। वह अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए किसी प्रकार की बाधा को स्वीकार कर उसमें बंधना नहीं चाहता। यहाँ तक कि वह बुआ की स्थिति से परिचित होते हुए चाह कर भी उसकी सहायता के लिए आगे नहीं आ सकता। उसके जीवन की इन परिस्थितियों को लेखक ने इस प्रकार व्यक्त किया है, “जिंदगी बहती चली गई। बी. ए. का इम्तिहान नजदीक था और मैं पोजीशन लाना चाहता था। बुआ की याद को मन में गहरी बिठाने से बचना चाहता था…..यह ख्याल तो चेतना में बंधा था, बिखरा नहीं था कि इम्तिहान होना है, उसमें नामवरी के साथ पास होना है और आगे बढ़ना है।”

सामाजिक मान्यताओं में बंधाः

प्रमोद समाज की मान-मर्यादा और पद लालसा में बंधकर रह जाता है। वह मृणाल की सहायता करना चाहता है, उसे चरित्रहीनता के कलंक से उबारना चाहता है परंतु सामाजिक मान्यताओं एवं परिवार वालों की बंदिशे उसे ऐसा करने नहीं देती है। वह चाहकर भी उन मान्यताओं को तोड़ नहीं सकता। वह कई बार सोचता है,समाज की जिस मान्यता पर मैं ऊँचा उठ खड़ा हुआ हूँ वह स्वयं किसके बलिदान पर खड़ी है, इस बात को जितना ही समझकर देखता हूँ उतना ही मन तिरस्कार और ग्लानि से घिर जाता है। पर क्या करूँ? सोचता हूँ, उस समाज की नींव के कुरेदने से क्या हाथ आएगा?नींव ढीली ही होगी और ऐसे हाथ आने वाला कुछ नहीं है।” अंततः उसे इस बात का एहसास होता है कि बुद्धिमता की प्रतिष्ठा के लिए जिन सामाजिक नियमों और धन, पद, मान के मोह में वह बंधा रहा उन्होंने उसी आत्मा की आवाज को कहीं भीतर दबा कर रख दिया। इसी महासंताप के कारण वह अपने न्यायधीश के पद से त्यागपत्र भी दे देता है।

द्वंद्व ग्रस्त या आत्मचिंतन में ग्रसितः

प्रमोद चिंतनशील एवं द्वंद्वंग्रस्त प्राणी है। वह आजीवन पाप-पुण्य, सत्य-असत्य, पवित्र-अपवित्र, कर्तव्य-अकर्तव्य के फेर में उलझा रहता है। इसी द्वंद्वं के चलते वह बुआ मृणाल की कठिन परिस्थितियों में उसका सहायक नहीं बन पाता। वह चाहता तो है कि वह बुआ की सहायता करे, उसे बदनाम बस्ती से निकाल कर सभ्य समाज में पुनः प्रतिष्ठा दिलाए परंतु वह अपनी उस दुनिया का त्याग नहीं कर पाता जहाँ वस्तुओं का मान बंधा है। प्रमोद के चरित्र की इस आत्मचिंतन की प्रवृत्ति को लेखक ने इन शब्दों में व्यक्त किया है,“मन में एक गांठ सी पड़ती जाती थी। वहां ना खुलती थी ना घुलती थी। बल्कि कुछ करो वह और उलझती और कसी ही जाती थी।सृष्टि गलत है समाज गलत है जीवन ही हमारा गलत है। यह सारा चक्कर उटपटांग है। इसमें तर्क नहीं है संगति नहीं है कुछ नहीं है।”

उच्चाभिलाषी एवं आदर्शवादीः

प्रमोद उच्चाभिलाषी एवं आदर्शवादी प्रवृत्ति रखता है। वह जीवन में धन, मान व पद हासिल करना चाहता है और पाकर रहता है। वह समाज और उसकी मर्यादाओं में बंधकर चलने में विश्वास रखता है। वह अपने जजी के पद के अहम् से भी ग्रसित है। वह इसी उच्चाकांक्षा के रहते मृणाल की विपरित परिस्थितियों में सहायता नहीं कर पाता। प्रमोद के शब्दों में, “पति गृह कों छोड़ यहां गंदे व्यभिचार में रहने वाली नारी पति धर्म की बात करती है और उसको सुना हुआ एक पढ़ा-लिखा मुझ जैसा समझदार युवक उस नारी को लांछित नहीं करता बल्कि उसके प्रति और खिंचकर रह जाता है! ओ, असह्य है!….. मैं बी.ए. में पढ़ने वाला युवक ऊंचे विचार में रहता था। उच्चता की तरफ देखता था। मैं अपने महत्व से भरा था।उस महत्व से कुछ इधर-उधर जिसे निचाई समझता हूं वहां भी कुछ सच्चाई हो सकती है यह नहीं जानना चाहता था। जानकर सहना नहीं चाहता था। मुझको बड़ा जो बनना था।

दार्शनिक प्रवृत्ति

प्रमोद चिंतनशील व्यक्ति होने के साथ-साथ दार्शनिक स्वभाव का व्यक्ति है। वह जीवन और जगत् की समस्याओं पर गहराई से विचार-विमर्श करता है। वह संसार की सत्यता और असत्यता के प्रश्नों पर गंभीरता से चिंतन करता है, “पूछता हूं, मानव के जीवन की गति क्या अंधी है? वह अप्रतिरोध्य है। पर अंधी है यह तो मैं नहीं मानूंगा। मानव चलता जाता है और बूंद-बूंद दर्द इकट्ठा होकर उसके भीतर भरता जाता है। वही सार है।वही जमा हुआ दर्द मानव की मानस मणि है उसके प्रकाश में मानव का गति पथ उज्जवल होगा।”

सामाजिक रूढ़ियों की अपेक्षा मानव मूल्यों में आस्थाः

‘त्यागपत्र’ उपन्यास में प्रमोद सामाजिक रूढ़ियों के आलोचक एवं विरोधी के रूप में चित्रित हुआ है। जिस मृणाल को कुल कलंकिनी और व्यभिचारी मानकर परिवार के लोग भुला देते है, पति त्याग देता है, वह निरंतर उसकी चिंता करता है और उसके प्रति सहानुभूति भी रखता है। प्रमोद के मन में बुआ के आचरण के प्रति कोई कुंठा नहीं है, बल्कि वह इसी संताप से ग्रसित है कि वह बुआ की सहायता क्यों नहीं कर पाया। वह कहता है, “क्यों बुआ की मांग मुझसे पूरी न हुई।उन्होंने इतना प्रेम किया इतना विश्वास किया और एक सवाल मुझसे किया तब उसके जवाब में अपना धन मुझसे क्यों नहीं बहा डाला गया? क्यों मेरी मुट्ठी भिंच गई?..यह ठीक हुआ तो फिर क्यों उसके बाद मेरी आत्मा ताप से संतप्त नहीं रही?

आगे कहता है,”इस सबका अब मैं क्या करूं जब कि समय रहते प्रेम के प्रतिदान से में चूक गया. यह सब मैल है जो मैंने बटोरा है। मेल कि मेरी आत्मा की ज्योति को ढंक रहा है।”यह भी हुआ तो फिर क्यों उसके बाद मेरी आत्मा ताप से संतप्त नहीं रह?….क्यों मन में मानता रहा कि ठीक हूँ? क्यों कर्तव्य को दबाता रहा और अकर्तव्य करता रहा? उत्तर है कि मैं बुद्धिमान था, सरल नहीं था।

पश्चाताप से ग्रसित

बुआ तुम गई। तुम्हारे जीते जी मैं राह पर ना आया। अब सुनो मैं यह जजी छोड़ता हूं। जगत का आरंभ संभारंभ ही छोड़ दूंगा। औरों के लिए रहना तो शायद नए सिरे से मुझसे सीखा ना जाए, आदतें पक गई हैं, पर अपने लिए तो उतनी ही स्वलप्ता से रहूंगा जितना अनिवार्य होगा।…इसी के साथ सही करता हूं कि जजी से अपना त्यागपत्र मैंने दाखिल कर दिया है।

प्रमोद पश्चाताप से ग्रसित प्राणी है। जिस बुआ मृणाल के हर सुख-दुख का वह बचपन का साथी था उसी की स्थिति को उबारने के लिए वह कुछ न कर पाया। उसके पास धन, मान, पद सभी कुछ था फिर भी वह समाज की खोखली मर्यादाओं की सीमा लांघ नहीं सका। उसकी आत्मा की आवाज पर बुद्धिमता की आवाज हावी रही। जब मृणाल बदनाम बस्ती सी सदस्य बनकर रहती है तो वह उससे गुजारिश करती है कि यदि उसे कुछ करना है तो इन लोगों के उद्धार के लिए कोई प्रयास करे, उनकी किसी प्रकार आर्थिक सहायता करे परंतु वह ऐसा करने से हिचकिचाता है और वहाँ से चला जाता है। सत्रह वर्ष बाद जब मृणाल की मृत्यु का समाचार आता है तो वह सोचता है कि जिस बुआ ने उससे इतना प्रेम किया और विश्वास किया उसके प्रेम का प्रतिदान वह क्यों नहीं कर पाया। वह इसी पश्चाताप से ग्रसित होकर अपने न्यायधीश के पद से त्यागपत्र दे देता है क्योंकि जब वह बुआ के साथ न्याय नहीं कर पाया तो वह इस पद के लायक नहीं है, वह कहता है, “बुआ तुम गई। तुम्हारे जीते जी मैं राह पर न आया। अब सुनो मैं यह जजी छोड़ता हूँ। जगत का आरंभ-संभारभ ही छोड़ दूंगा। औरों के लिए रहना तो शायद नए सिरे से मुझसे सीखा न जाए, आदतें पक गई है, पर अपने लिए तो उतनी ही स्वलप्ता से रहूँगा, जितना अनिवार्य होगा। यह वचन देता हूँ।…..इसी के साथ सही करता हूँ कि जजी से अपना त्यागपत्र मैंने दाखिल कर दिया है।”

इस प्रकार कहा जा सकता है कि प्रमोद उपन्यास में एक गंभीर एवं चिंतनशील प्रवृत्ति वाला पात्र है जो जीवन और जगत् के सत्य-असत्य के फेर में उलझा रहता है। वह अपनी बुआ और बचपन की साथी मृणाल के प्रति संवेदनशील तो है परंतु समय आने पर उसकी सहायता नहीं कर पाता। वह सामाजिक मान-मर्यादाओं के बंधन में फंसकर स्वयं कभी इसके लिए ज़ोर नहीं दे पाता, क्योंकि वह दुविधा में पड़ा रहता है। उसके ह्रदय के किसी कोने में दबी स्वार्थवृत्ति भी उसे पीछे खींचती है। जीवन भर वह अपने आपको मृणाल की ओर से भुलावे में रखने में सफल होता है, परंतु मृणाल की अंतिम अवस्था उसे आंदोलित कर देती हैं और वह अपने पद जजी से त्यागपत्र देकर प्रायश्चित्त करता है।

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