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द्वितीय वर्ष यूनिट 2

राजभाषा हिन्दी के समक्ष आने वाली कठिनाइयाँ

14 सितंबर,1949 को हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिया गया | प्रत्येक वर्ष लोगों में जागरूकता लाने हेतु तरह-तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं| हिन्दी भाषा से तो प्रारंभ से ही सौतेला व्यवहार किया जा रहा है, हिन्दी को राजभाषा घोषित करने से पहले भी, इसे बहुत ही विरोध का सामना करना पड़ा | विशेषकर दक्षिण भारतीय राज्यों ने हिन्दी भाषा का कड़ा विरोध किया, जो कि शिक्षा नीतियों में भी देखा जा सकता है | इसके अलावा  हिन्दी के साथ अंग्रेजी भाषा को 15 बर्ष के लिए राजभाषा के रूप में जगह दी गई, जिसके परिणामस्वरूप कुछ राज्यों ने अंग्रेजी को ही आज तक राजभाषा बनाए रखा है | इसके बावजूद भी हिन्दी, अंग्रेजी, चीनी, स्पेनिश, अरबी और फ्रेंच के साथ दुनिया में सबसे अधिक बोलचाल में लाई जाने वाली भाषा है | हिन्दी आज स्थानीय स्तर से लेकर अंतर्राष्ट्रीय वैश्विक स्तर तक स्थान प्राप्त कर रही है | ऐसे में भी हिन्दी का विकास राजभाषा के रूप में आज भी बाधित हो रहा है, इसके अनेक कारण हैं:-

भूमंडलीकरण ने हिन्दी के बाजार को विकसित किया है | हिन्दी आज राजभाषा और राष्ट्रभाषा के साथ साथ बाजार, व्यापार व संचार की भाषा बनती जा रही है | हिन्दी आज वैश्विवक पहचान बनाने में सफल हो चुकी है परंतु राजभाषा के रूप में अनेक ऐसे आंतरिक और बाहरी कारण है जिनके कारण इसका स्वरूप बाधित हो रहा है | इन कारणों का वर्णन इस प्रकार है:-

(1) आर्थिक कठिनाइयाँ

राजभाषा के रूप में हिन्दी के विकास मार्ग में सबसे पहली समस्या है आर्थिक अभावग्रसता | ऐसा माना जाता रहा है कि अंग्रेजी पढ़-लिखकर ही आजीविका प्राप्त की जा सकती है | यही मानसिकता हिन्दी को दूर और अंग्रेजी को न चाहते हुए भी निकट ला रही है | प्राथमिक स्तर से अंग्रेजी पढ़ाने की होड़ सरकारी विद्यालयों में लगी है | जब भाषा का संबंध आजीविका के साथ जोड़ा जाता है तब आम जनता भी उसी को अपनाने का प्रयास करती है | अंग्रेजों के समय से ही नौकरियों में अंग्रेजी जानने वालों को वरीयता मिलती आई है, आज भी वही जारी है | अत: जब तक हिन्दी का ज्ञान नौकरियों के लिए अनिवार्य नहीं होगा और हिन्दी के माध्यम से परीक्षा और साक्षात्कार को स्वीकृति नहीं मिलेगी तब तक हिन्दी का विकास रुका रहेगा |

(2) राजनीतिक कारण

राजनीतिक कारणों से ही आज हिन्दी का स्वरूप पिछड़ा हुआ है | स्वाधीन भारत में राजनेताओं द्वारा धर्म, सम्प्रदाय और भाषा के आधार पर ही सत्ता हासिल करने का प्रयास किया जा रहा है | हिन्दी को संवैधानिक दर्जा देने के लिए जो संघर्ष करना पड़ा वह भी राजनीतिज्ञों द्वारा लगाई गई अड़चनों का ही परिणाम था | भाषा के आधार पर देश में राज्यों का बंटवारा किया जाने लगा | देश ने त्रिभाषा का सूत्र अपना लिया | क्षेत्रीय भाषाओं ने सीधे हिन्दी को चुनौती तो नहीं दी परंतु अंग्रेजी का समर्थन कर उसका वर्चस्व बढ़ा दिया | भारत के प्रांत अंग्रेजी और प्रांतीय भाषा के पक्षधर रहे |

(3) पराधीनता की पृषठभूमि

भारत सैकड़ों वर्ष बाहरी शासकों का गुलाम रहा | लगभग 200 वर्षों तक अंग्रेजी शासकों ने यहाँ अपनी धाक जमाए रखी | परिणामस्वरूप देश आजाद तो हो गया परंतु अंग्रेजी और अंग्रेजीयत की छाप वैसे ही कायम रही या यूं कहा जा सकता है की यह छाप स्वाधीनता के बाद और गहरी होती चली गई | लार्ड मैकाले द्वारा स्थापित शिक्षा प्रणाली ने हिन्दी की पकड़ को इतना कमजोर कर दिया है कि वर्तमान पीढ़ी को मैकाले के वंशज कहा जाए तो कोई अतियुक्ति नहीं होगी |

(4) हिंगलिश का प्रभाव

 ‘हिंगलिश’शब्द ‘हिन्दी’ और ‘इंग्लिश’ का मिश्रण है जो भूमंडलीकरण और बाजारवाद की देन है |  हिंगलिश का प्रचार-प्रसार इतना अधिक हो गया है कि आज हिन्दी के समक्ष अपनी शुद्धता को कायम रखने की समस्या उत्पन्न हो गई है | विशेष रूप से संचार माध्यमों जैसे रेडियो, टी वी , सिनेमा, इंटरनेट आदि में इस हिंगलिश का स्वरूप व्यापक होतो जा रहा है | वर्तमान युवा पीढ़ी हिंगलिश के प्रयोग को ही अपना रही है | अत: हिन्दी का वास्तविक स्वरूप धुंधला पड़ता जा रहा है |

(5) संवैधानिक द्विभाषिकता

भारतीय संविधान में हिन्दी को राजभाषा के सिंहासन पर तो बिठा दिया गया परंतु 15 वर्ष तक सत्ता अंग्रेजी के हाथ में रहेगी, यह भी तय कर दिया | जब 15 वर्ष होने को आए तो 1963 में हिन्दी विरोधी आंदोलनों द्वारा दक्षिण भारत से आवाजें उठनी शुरू हुई और1965 तथा 1967 में यह प्रावधान कर दिया गया कि जब तक एक भी राज्य अंग्रेजी को राजभाषा बनाए रखना चाहता है रख सकता है | इसके परिणामस्वरूप हिन्दी का उतना विकास नहीं हो पाया जितना होना चाहिए था | इस द्विभाषिकता की नीति ने हिन्दी का स्तर कम कर दिया |

(6) व्याकरण की अज्ञानता

भारत जैसे बहुभाषी देश में हिन्दी बोल और समझ तो सभी सकते हैं परंतु व्याकरिणक शुद्धता से हर कोई पूर्णत: संबंध नहीं रखता है | अत: हिन्दी के शुद्ध उच्चारण, कारक और विभक्तियों के ज्ञान, संधि नियमों की जानकारी, समास, लिंग और वचन तथा वाक्य सरंचना के ज्ञान के अभाव के बिना हिंदी को सीखना सभी को कठिन लगता है | इसी कारण भी हिन्दी का विकास मार्ग अवरुद्ध होता है | उदाहरण स्वरूप हिन्दी में अनेक शब्दों का अस्पष्ट उच्चारण होता है जैसे ‘ज्ञ’ | कोई इसका उच्चारण ‘ग्य’ करता है, कोई ‘ग्यँ’, कोई ज़्यं | इसी प्रकार मात्राओं के ज्ञान में भी अशुद्धता अर्थ का अनर्थ कर देती है |

(7) तकनीकी शब्दावली का अभाव

आधुनिक ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी विषयों का उद्भव पाश्चात्य समाज की देन है | यदि इन विषयों का सही अनुवाद भी करते हैं तो कई शब्द ऐसे होते हैं जैसे, मोबाइल, कंप्यूटर, वर्ड, व्हाट्सअप, एप्स आदि जिनका अनुवाद नहीं हो सकता | अत: हिन्दी भाषा में पर्याप्त रूप से तकनीकी शब्दावली एवं पारिभाषिक शब्दकोशों का अभाव भी हिंदी के मार्ग में सबसे बड़ी कठिनाई है | आज इस दिशा में प्रयास जारी है |

(8) प्रामाणिक शब्दकोशों का अभाव

प्रामाणिक शब्दकोशों के अभाव के कारण कई बार हिंदी अनुवाद हास्यास्पद हो जाता है जैसे- ‘ माचिस की डिबिया’ के लिए ‘अगिनपेटिका’ रेलगाड़ी के लिए ‘ लोहपथगामीनी’ माचिस की तीली के लिए ‘अग्निशलाका’ आदि | ऐसे में शब्द और अधिक दुरूह हो जाते हैं और आम जन उनका प्रयोग करने से कतरातें हैं | तकनीकी शब्दों में एकरूपता लाने हेतु यह आवश्यक है कि प्रमाणिक एवं सर्वमान्य शब्दकोश तैयार किए जाएं |

(9) हिंदी के प्रति उदासीनता एवं लगाव की कमी

हिंदी भाषियों में हिंदी के प्रति वैसा उत्कर लगाव नहीं दिखता जैसा दक्षिणवासियों में है | हिंदी भाषा क्षेत्रों में, विशेषकर युवा पीढ़ी अंग्रेजी की दीवानी है | हिंदी की उपेक्षा और अंग्रेजी को अपनाना मानसिकता का हिस्सा एवं शान-ओ-शौकत का माध्यम बनता जा रहा है | अत: हिंदी के विकास हेतु उसे पूर्ण समर्पण के साथ अपनाना ही अनिवार्यता है |

निष्कर्ष

निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि हिंदी को राजभाषा के रूप में पूर्णत: स्थापित करने हेतु संविधान में दी गई व्यवस्थाओं में सर्वप्रथम द्विभाषिकता की स्थिती को समाप्त करना होगा | हिंदी का विकास आंदोलन से नहीं अपितु व्यवहारिक प्रयोग से होगा | सरकारी नौकरियों और शिक्षण के माध्यम के रूप में हिंदी का वर्चस्व स्थापित करना होगा| क्षेत्रीय भाषाओं की शब्दावली को अपनाते हुए उनके साथ निकटता स्थापित करने का प्रयास किया जाना चाहिए |

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