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द्वितीय वर्ष यूनिट 2

राजभाषा का अर्थ एवं स्वरूप एवं उसकी विशेषताएँ

राजभाषा किसी देश या राज्य की वह भाषा होती है जो सभी राजकीय प्रयोजनों में प्रयुक्त होती है | राजभाषा अर्थात राज-काज की भाषा, शासकीय काम-काज की भाषा | अत: प्रशासन की भाषा को राजभाषा का दर्जा दिया जाता है | साधारण शब्दों में कहा जाये तो ‘राजभाषा’ वह भाषा है जो सरकारी कार्यालयों में प्रयुक्त होती है तथा सम्पूर्ण शासन व्यवस्था इसमे अपने क्रियाकलाप करती है |

आचार्य देवेंद्र नाथ शर्मा के अनुसार, “ सरकार के शासन, विधान, कार्यपालिका और न्यायपालिका क्षेत्रों में जिस भाषा का प्रयोग किया जाता है, उसी राजभाषा कहते हैं| यही कार्यालयी भाषा भी कहलाती है | ”

अत: राजभाषा को शासक की भाषा के अर्थ में भी लिया जा सकता है | केंद्र की राजभाषा को संघभाषा भी कहा जाता है | प्रशासन तथा न्याय की भाषा होने के कारण सरकारी दृष्टि से राजभाषा का बहुत महत्व होता है | राजभाषा का प्रयोग मुख्य रूप से चार क्षेत्रों में किया जाता है :-

  1. शिक्षा क्षेत्र
  2. शासन
  3. न्यायपालिका
  4. जनसंचार

राजभाषा का अर्थ एवं परिभाषाएँ :-

राजभाषा एक पारिभाषिक शब्द है जिसका अर्थ है “ सरकारी कामकाज के लिए प्रयुक्त भाषा ”

हिंदी में ‘राजभाषा’ शब्द अंग्रेजी के ‘आफिशियल लैंग्वेज’ (Official Language) के पर्याय के रूप में प्रयुक्त होता है | इस शब्द का प्रयोग क़ानूनी तौरपरस्वतंत्र भारत के संविधान में सर्वप्रथम किया गया | भारत की स्वतंत्रता और राष्ट्रीयता की रक्षा करने के जो अनेक साधन हैं उनमें राजभाषा की स्वीकृति प्रशासन के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है |

जिस भाषा के द्वारा केंद्र, प्रशासन संबंधी कार्यभार संभाले और संचालन करें, वही राजभाषा है| आज जनतंत्रात्मक- समाजवादी व्यवस्था पर आधारित स्वतंत्र शासन का युग है, जहाँ सरकार, विधानमंडल और प्रशासन सभी जनता के सेवक मात्र हैं | एक राजभाषा के द्वारा ही केंद्र प्रशासन का कार्य कर, समस्त जनता पर व्यापक प्रभाव डाल सकती है |

भारत के संविधान, अध्याय ‘17’, अनुच्छेद ‘343’ के अनुसार ‘ संघ की राजभाषा देवनागरी लिपि में लिखी हिंदी होगी | यहाँ संघ की राजभाषा से तात्पर्य संघ के विधानांग, कार्यांग तथा न्यायांग आदि तीन प्रमुख अंगो के कार्यकलाप में प्रयुक्त भाषा से है |

राजभाषा की परिभाषाएं :

राजभाषा को विभिन्न विद्वानों ने निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया है-

डॉ०  हरिमोहन के अनुसार,  “ राजभाषा का सीधा अर्थ है, जिस भाषा में राज-काज किया जाता है | केंद्रीय तथा प्रादेशिक सरकारों के द्वारा पत्र-व्यव्हार, राज कार्य और सरकारी लिखा-पढ़ी के कामों में इसी भाषा का व्यवहार किया जाता है| ”   

कोशकार रामचंद्र वर्मा के ‘ प्रमाणिक हिंदी कोश’ के अनुसार, “किसी देश में प्रचलित वह भाषा जिसका प्रयोग प्राय: सभी राजकीय कार्यो और न्यायालयों में होता है |”

डॉ०  श्याम सुंदर दास के ‘हिंदी शब्द सागर’ के अनुसार, “वह भाषा जो सरकारी कामकाज तथा न्यायालयों के लिए स्वीकृत हों |” 

डॉ०  भोलानाथ तिवारी के अनुसार, “राज्यभाषा ‘आफिशियल लैंग्वेज’ अंग्रेजी में ऐसी भाषा जिसका प्रयोग राज्य के कार्यो में होता है”

डॉ०  संजीव जैन के अनुसार , “राजभाषा वह भाषा है जिसका प्रयोग केंद्रीय सरकार अपने कार्य व्यापार तथा अन्य प्रदेशों के साथ सरकारी कामकाज या पत्र-व्यवहार के लिए करती है| यह भाषा देश के बहुसंख्यको की भाषा होती है | देश के अन्य प्रांतो के लोग भी इसे समान्य रूप से समझते हैं |” 

उपरोक्त परिभाषाओं के अध्ययन के उपरांत कहा जा सकता है की राजभाषा एक पारिभाषिक शब्द है | यह संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त एक ऐसी तकनीकी, लिखित एवं औपचारिक भाषा है जो ‘रजिस्टर’ के रूप में किसी देश की सरकार के विधानांग, कार्यांग एवं न्यायांग के कार्यान्वयन के लिए माध्यम के रूप में प्रयुक्त होती है|                                                    

राजभाषा हिन्दी

14 सितंबर 1949 को भारतीय  संविधान  द्वारा  हिन्दी को राजभाषा  के रूप में स्वीकृति प्रदान की गई | भारत का संविधान 26 जनवरी ,1950 को लागू हुआ और तभी से देवनागरी  लिपि में लिखित विधिवत् भारत संघ की राजभाषा है | किसी भी स्वाधीन  देश के लिए जो महत्व उसके राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का है, वही उसकी राजभाषा  का है | भारतीय  संविधान में धारा  343 से 351 तक हिन्दी राजभाषा संबंधी व्यवस्थाएं की गई हैं |

भारत की संविधान सभा का पहला अधिवेशन 9 दिसम्बर 1946 को शुरू हुआ | 4 जुलाई 1947 को जो प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया उसमें जवाहर लाल नेहरू ने संघीय संसद में कार्यवाही की भाषा हिन्दी या उर्दू या अंग्रेजी रखने की बात कही |

संविधान सभा के प्रारम्भिक दिनों में मौलिक अधिकार संबंधी उप-समिति ने गांधी जी के विचारों के अनुसार, निम्नलिखित सूत्र स्वीकृत किए गए :

“ राष्टभाषा के रूप में नागरिक की इच्छानुसार, देवनागरी या फारसी लिपि में लिखित हिन्दुस्तानी, संघ की प्रथम राजभाषा होगी | अंग्रेजी उस अवधि के लिए द्वितीय राजभाषा होगी , जिसका निर्णय संघ विधि द्वारा करेगा | संघ के सभी शासकीय अभिलेख दोनों लिपियों में हिन्दुस्तानी तथा अंग्रेजी में भी तब तक रखें जाएंगे, जब तक संघ विधि द्वारा कोई दूसरा निर्णय न करें”

19 अप्रैल 1947 को डॉ. अम्बेडकर ने अपनी विमत टिप्पणी में यह मत प्रकट किया कि हिन्दुस्तानी न केवल संघ की बल्कि सभी इकाइयों की भाषा स्वीकृत की जाए |

सन् 1946 में संविधान सभा बनी जिसमें मुखयत: राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य थे | साथ ही मुस्लिम लीग तथा अन्य स्वतंत्र सदस्य भी थे| संविधान सभा की पहली बैठक दिनांक 9/12/1946 को हुई और दिनांक 11/12/1946 को बाबू प्रसाद की अध्यक्षता में यह निर्णय सन् 1946 में ही ले लिया था कि राजभाषा ‘हिन्दुस्तानी’ या ‘अंग्रेजी होगी, पर कोई भी सदस्य अध्यक्ष की अनुमति से सदन में अपनी ‘मातृभाषा’ में भाषण दे सकेगा | 14 जुलाई 1947 को संविधान सभा के चौथे सत्र के दूसरे दिन ही यह संशोधन प्रस्तुत किया गया था कि ‘हिन्दुस्तानी’ के स्थान पर ‘हिन्दी’ शब्द रखा जाएगा | इस विषय पर हुए मतदान में 63 वोट थे और हिन्दुस्तानी के पक्ष में 32 और इसी प्रकार देवनागरी के संदर्भ में हुए मतदान के पक्ष में 63 तथा विपक्ष में 18 वोट पड़े | 10 नवंबर 1948 की स्टीयरिंग कमेटी में यह निश्चय किया गया कि संविधान हिन्दी में भी तैयार होना चाहिए | फरवरी 1948 में ‘संविधान’ का जो प्रारूप प्रस्तुत हुआ उसमें राजभाषा विधेयक की कोई धारा नहीं थी | मात्र इतना उल्लेख था कि  संसद की भाषा अंग्रेजी या हिन्दी होगी |   

इस विषय पर मुख्य बहस अगस्त से सितंबर 1949 में हुई | हिन्दी से संबंधित एक प्रारूप समिति बना दी गई जिसमें सर्वश्रीआयंगर, टी. ओ. कृष्णमाचारी अय्यर , श्री कन्हैयालाल माणिक लाल मुंशी, डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर तथा राव थे | 16 अगस्त को प्रारूप कमेटी ने रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें 10 वर्ष तक अंग्रेजी के चलते रहने की व्यवस्था की | बाद में 22 अगस्त को अंबेडकर जी ने नया फार्मूला रखा जिसमें,

  1. पंद्रह वर्ष की अवधि का प्रस्ताव था, जिसको बाद में संसद बढ़ा सकती थी |
  2. अंतर्राष्ट्रीय अंक
  3. उच्च न्यायालय में अंग्रेजी
  4. प्रादेशिक भाषाओं की सूची
  5. भाषा आयोग की व्यवस्था आदि |

डॉ रघुवीर ने अंग्रेजी के बहिष्कार का सुझाव देते हुए कहा, “मुझे डर है कि अगले पंद्रह वर्षों में इस देश में अंग्रेजी प्रभाव की जड़ उससे दुगनी मजबूत हो जाएगी, जितनी अपने डेढ़ सौ वर्षों के शासनकाल में अंग्रेजों ने कायम की थी।”

मुख्य बहस 12 से 14 सितंबर तक चली| मुंशी आयंगर के फार्मूले के नाम से विख्यात अनुच्छेद 343-351 तक है तथा साथ में संविधान के परिशिष्ट में दी गई अष्टम अनुसूची भी है |

14 सितंबर 1949 का दिन भाषा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण और युग ‘प्रवर्तक’ दिवस माना जाना चहिए | इसी दिन संविधान सभा ने एकमत से हिन्दी को भारतीय संघराज्य की राज्यभाषा के रूप में स्वीकृत किया | बाबू पुरुषोत्तम दास टंडन ही वह व्यक्ति थे, जिन्होंने इस विषय में सबसे अधिक लग्न से काम किया |

राजभाषा हिन्दी : महत्त्वपूर्ण तथ्य  

  1. अशोक के समय में ‘पालि’ राजभाषा थी |
  2. मुहम्मद गौरी से लेकर अकबर के समय तक हिन्दी और फारसी राजभाषा थी |
  3. ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1833 ई तक फारसी को राजभाषा बनाए रखा |
  4. ब्रिटिश शासन में लार्ड मैकाले के प्रयास से अंग्रेजी राजभाषा के पद पर सुशोभित हुई|
  5. पं. मदन मोहन मालवीय के प्रयत्नों से सन 1901 में संयुक्त प्रांत की कचहरी की भाषा के रूप में हिन्दी को उर्दू के समान अधिकार मिला |
  6. संविधान सभा में हिन्दी को राजभाषा बनाने का अंतिम निर्णय गोपाल स्वामी आयंगर का स्वीकार किया गया |
  7. अनुच्छेद 343-351 तक राजभाषा संबंधी प्रावधान संविधान के 17 वें भाग में किए गए हैं |
  8. संविधान की 8 वीं अनुसूची में 22 भाषाएं समिमलित हैं |
  9. संविधान के अनुच्छेद 351 में हिन्दी भाषा के विकास के लिए निर्देशों का उल्लेख है |

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि राजभाषा हिन्दी का स्वरूप अत्यंत व्यापक है | यह राजनीतिक महत्त्व की भाषा है जो राष्ट्रीय समस्याओं और बौद्धिक स्तर को सुलझाने में सक्षम हैं | यह सरकारी कामकाज की भाषा के साथ-साथ जनसामान्य के बीच, शिक्षित, अशिक्षित सभी वर्गों में परस्पर व्यवहार का माध्यम हुआ करती है |

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