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बी.ए. प्रथम वर्ष (DSC-1)

रामभक्ति काव्य धारा

हिंदी साहित्य के भक्तिकाल में निर्गुण और सगुण दो काव्यधाराएँ विकसित हुई। सगुण काव्यधारा के अंतर्गत भगवान विष्णु के दो अवतारों कृष्ण और राम को आराध्य मानकर कवियों ने साहित्य सृजन किया। स्वामी वल्लभाचार्य के पुष्टि मार्ग के संरक्षण में कृष्ण भक्ति शाखा पल्लवित-पोषित हुई तो स्वामी रामानंद ने संपूर्ण उत्तरी भारत में रामभक्ति लहर का प्रवर्तन किया। रामानंद के प्रयासों से ही हिंदी के भक्तिकालीन साहित्य में रामभक्ति साहित्य का विकास हुआ।

रामभक्ति विकास के  सम्यक अध्ययन से राम के रूप के विकास की तीन अवस्थाएं स्पष्ट परिलक्षित होती है- ऐतिहासिक, साहित्यिक और सांप्रदायिक।  राम का ऐतिहासिक रूप लगभग पाँच शताब्दी ईसा पूर्व वाल्मीकि रामायण में अक्षुण्ण है।  उनका साहित्यिक रूप एक शताब्दी ईसा पूर्व भाग से लेकर कालिदास आदि संस्कृत कवियों द्वारा रचा गया है। 

रामानुजाचार्य की शिष्य परंपरा में  राम भक्ति के सांप्रदायिक विकास को देखा जा सकता है। रामानुजाचार्य के शिष्य स्वामी रामानंद ने ‘श्री संप्रदाय’ की स्थापना की तथा समस्त जनमानस के लिए रामभक्ति के कपाट खोल दिए। रामानंद और उनके शिष्यों द्वारा प्रचारित राम कथा के वातावरण में गोस्वामी तुलसीदास का महान रामकाव्य सामने आया। रामभक्ति के विकास में तुलसीदास का सर्वाधिक योगदान है। इनके द्वारा रचित ‘रामचरितमानस’ हिंदी साहित्य का गौरव ग्रंथ है।

तुलसीदास के अतिरिक्त अग्रदास, प्राणचंद चौहान, हृदय शर्मा, माधवदास, मलूकदास, लालदास तथा नाभादास, केशवदास आदि कवि रामकाव्य धारा के अन्य महत्त्वपूर्ण कवि हैं। इन कवियों की प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार है-

  • अग्रदासः अष्टायाम
  • प्राणचंद चौहानः रामायण महानाटक
  • हृदयशर्माः हनुमाननाटक
  • माधवदासः गुणरामरासो
  • मलूकदासः रामावतार लीला
  • लालदासः अवधविलास
  • नाभादासः भक्तमाल 
  • केशवदासः रामचंद्रिका

इन कवियों की रचनाओं का अनुशीलन करने के बाद राम काव्यधारा की विशेषताओं को निम्नलिखित बिंदुओं द्वारा स्पष्ट किया जा रहा है-

राम के सगुण स्वरूप की आराधनाः

राम भक्त कवियों ने विष्णु के अवतार राम की आराधना की है। राम परम ब्रह्म स्वरूप हैं। वे पाप विनाश और धर्म उद्धार के लिए युग युग में अवतार लेते हैं। राम शील, शक्ति और सौंदर्य का समन्वय है। वे भक्तों के संरक्षक तथा दुष्टों के संहारक है। तुलसी के राम मर्यादा पुरुषोत्तम है और आदर्श के प्रतिष्ठापक हैं। वे लिखते हैं-

धरम के हेतु जनमंगल के हेतु भूमि
भारू हरिषे को अवतार लियो नर को
नीति और प्रीति प्रतिपाल चालि प्रभु भावुः
लोकवेद राखिवै को पनु रघुवर को।

वैसे तो तुलसीदास ने राम के सगुण रूप की ही आराधना की है, परंतु उन्होंने निर्गुण निराकार रूप को भी माना है। उन्होंने तो विष्णु को ही राम का अवतार बताया है। तुलसी के राम के चरणों में देवी देवता भी वंदना करते हैं-

सोई दशरथ सुत भगत हित, कौशलपति भगवान।

समन्वय की विराट चेष्टाः

राम भक्ति काव्य में न केवल धार्मिक भावनाओं का समन्वय किया गया है बल्कि समाज के विपरीत ध्रुवों जैसे ब्राह्मण-शुद्र, शैव-वैष्णव, निर्गुण-सगुण, राजा-रंक, भाग्य और पुरुषार्थ, द्वैत-अद्वैत, भोग-त्याग, देवता व राक्षस आदि में भी समन्वय स्थापित किया गया है। तुलसीदास उच्च कोटि के समन्वयवादी थे। उनका साहित्य समन्वय की विराट चेष्टा कहा जा सकता है। जीवन और जगत के सभी क्षेत्रों में समन्वय स्थापित करने का सुंदर और सफल प्रयत्न उनकी काव्य रचनाओं में मिलता है। निर्गुण और सगुण में समन्वय स्थापित करते हुए भी लिखते हैं-

अगुनहि-सगुनहि कछु नांहि भेदा। गावहिं मुनि पुरान बुध वेदा। अगुन प्ररूप अलख अज जोई। भगत प्रेम बस सुगन सो होई।

तुलसीदास ने राम की उपासना के साथ-साथ शिव, गणेश आदि देवताओं की स्तुति भी की है। तुलसी ने सेतुबंध के अवसर पर राम द्वारा शिव की पूजा करवाई है। वे कहते हैं-

शिव द्रोही मम दास कहावा, सो नर मोहि सपनेंहुं नहिं भावा।

इसी तरह जाति और धर्म के आधार पर बंटे समाज में समन्वय स्थापित करते हुए हुए लिखते हैं-

प्रेम पुलकि केवट कहि नामू। कीन्ह दूरि ते देख प्रनामू।
राम सखा रिणी बरवास भेंटा। जनुमहि लूठत सनेह समेटा।

इस तरह तुलसीदास का काव्य ज्ञान, भक्ति और कर्म के बीच समन्वय स्थापित करने का सुंदर प्रयास है।

भक्ति भावनाः

राम भक्त कवि राम के शील, शक्ति और सौंदर्य पर मुग्ध है। इनकी रचनाओं में श्रीराम के प्रति अनन्य भाव का प्रेम व दास्य भाव की भक्ति प्रकट हुई है। भक्ति रस को राम काव्य का अंगीरस कहा जा सकता है। तुलसीदास कभी तो बालक श्रीराम तो कभी उनके तीनों भाइयों भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न को अपने हृदय में बिठाना चाहते हैं-

अवधेस के बालक चारि सदा, तुलसी मन मंदिर में बिहरै।

तो कभी वह श्रीराम की महानता व गुरूता का वर्णन करते हुए स्वयं को दीन-हीन बताने लगते हैं और श्री राम की कृपा की कामना करते हैं-

राम सो बड़ो कौन है, मो से छोटो कौन राम सो खरो कौन है, मो से छोटो कौन

तुलसीदास लिखते हैं कि सेवक और सेव्य भाव के बिना प्रभु की भक्ति असंभव है-

सेवक-सेव्य भाव बिना, भव न तरिए उरगारि।

तुलसीदास की संपूर्ण जीवन का आधार श्री राम की भक्ति है और उन्हीं की शरण में जाकर मुक्ति संभव है। इस भक्ति भाव को प्रकट करते हुए हुए लिखते हैं-

एक भरोसो एक बल एक आस विसवास
एक राम घनश्याम हित चातक तुलसीदास।

लोकधर्म और मर्यादा की स्थापनाः

राम भक्त कवियों ने राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा है। तुलसीदास के राम काव्य में राम एक मर्यादा में बंधे दिखाई देते हैं। वे अपने स्वार्थ, सुख आदि को भी त्याग देते हैं ताकि वे अपनी मर्यादा का निर्वाह कर सकें। वे आदर्शवादी पुत्र हैं, पति हैं, भाई हैं, आदर्श राजा और भक्तवत्सल हैं। केवल राम ही नहीं तुलसीदास ने सीता, लक्ष्मण, उर्मिला, दशरथ, भरत आदि सभी पात्रों को सामाजिक मर्यादाओं में बंधा हुआ बताया है। इन सभी पात्रों के माध्यम से ही तुलसीदास ने जनसाधारण को मर्यादा के महत्व से अवगत कराया है। ‘कवितावली’ में ग्राम बुधएँ वन जाती हुई सीता से उसके साथ चलने वाले पुरुषों का पता पूछती है तो सीता उनका परिचय संकेत से देती है क्योंकि पति का नाम प्राय- पत्नियां नहीं लेती, इसी मर्यादित दृष्टिकोण को स्थापित करते हुए तुलसीदास लिखते हैं-

सुनि सुंदर बैन सुधारस-साने सयानी जानकी भली
तिरछे करि नैन, दे सैन, तिन्हें समुझाई कछु, मुसकाई चली।

लोककल्याण की भावनाः

लोक कल्याण की दृष्टि से राम काव्य अत्यंत महत्वपूर्ण एवं उपादेय है। साहित्य में जीवन की अनेक उच्चारण भूमियां प्रस्तुत की गई है। इन्होंने गृहस्थ जीवन की उपेक्षा नहीं की बल्कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए आदर्श और मर्यादित जीवन स्तर स्थापित करने का प्रयास किया है। राम और सीता का चरित्र लोक कल्याण की भावना से जुड़ा हुआ है। आदर्श की प्रतिष्ठा राम के जीवन का एकमात्र लक्ष्य है।समाज का मार्गदर्शन उच्च मूल्यों की स्थापना एवं रक्षा का कार्य राम काव्य में देखा जा सकता है

लोगन भलो मानव जो, भला होन की आस।
करत गगन को गेंदुआ, सो सठ तुलसीदास।

तुलसीदास केवल शास्त्र ज्ञाता ही नहीं थे बल्कि अपने परिवेश से जुड़े हुए समाज सुधारक भी थे। उन्होंने राम काव्य का केवल लेखन ही नहीं किया बल्कि जगह-जगह रामलीला का प्रचलन भी करवाया। त्योहार, उत्सव आदि पर लोग जीवन की झांकी तुलसीदास जी निरंतर दिखाते चलते हैं।

युगीन समस्याओं का चित्रणः

एक सजग व अच्छा साहित्यकार कभी भी अपने युग इन परिस्थितियों की अवहेलना नहीं कर सकता। रामभक्त कवियों ने अपनी रचनाओं में तत्कालीन समस्याओं का निरूपण किया है। तुलसीदास ने अपनी सामाजिक समस्याओं को केवल समझा ही नहीं बल्कि उन्हें दूर करने का प्रयास भी किया है। तत्कालीन युग के राजनीतिक वातावरण के कारण जनसाधारण का जीवन बड़ा कष्टमय था। चाटुकारों को दरबारों में स्थान दिया जाता था, सत्ता अयोग्य हाथों में पहुंच गई थी।अधिकांश लोग बेरोजगार थे, यहां तक कि भिखारियों को भी भीख नहीं मिलती थी। जनता की साधारण कमाई लूट ली जाती थी। तुलसीदास ‘विनय पत्रिका’ में इन परिस्थितियों का उद्घाटन करते हुए लिखते हैं-

खेती न किसान को, भिखारी को न भीख, बलि,
बनिक को बनिज, न चाकर को चाकरी।
जीविका बिहीन लोग सीद्यमान सोच बस,
कहैं एक एकन सों, ‘कहाँ जाई, का करी?’
बेदहूँ पुरान कही, लोकहूँ बिलोकिअत,
साँकरे सबै पै, राम! रावरें कृपा करी।
दारिद-दसानन दबाई दुनी, दीनबंधु!
दुरित-दहन देखि तुलसी हहा करी॥

इस प्रकार तुलसीदास ने अपने समय के कटु सत्यों से जनमानस को अवगत करवाते हुए आदर्श विहीन, संस्कृति-रहित और मर्यादा-पतित जनता को सही मार्ग दिखाने का प्रयास किया।

रसयोजनाः

राम काव्य में मुख्य रूप से सभी नौ रसों का वर्णन हुआ है परंतु भक्ति भाव की प्रधानता के कारण इसमें शांत रस की प्रधानता है। तुलसीदास के रामचरितमानस में सभी रसों का समायोजन मिलता है। युद्ध वर्णन में वीर, रौद्र तथा भयानक रस। राम और सीता के संयोग और वियोग की स्थितियों में मर्यादित श्रृंगार रस, रा के बालजीवन वर्णन में वात्सल्य रस का व्यापक चित्रण हुआ है। वात्सल्य रस का एक उदाहरण देखिए-

कबहूँ ससि माँगत अरि करै, कबहूँ प्रतिबिंब निहारि डरै।
कबहूँ करताल बजाई कै नाचत, मातु सबै मन मोद भरै।

इसी तरह राम और सीता के पुष्पवाटिका में प्रथम मिलन के प्रसंग में सीता के आभूषणों की ध्वनि से राम की मनःस्थिति का कवि ने अच्छा परिचय दिया है किंतु यहाँ भी उन्होंने मर्यादा का पूर्ण निर्वाह किया है। ‘कवितावली’ काव्य में विवाह के पश्चात् के वर्णन में श्रृंगार रस का उज्ज्वल रूप प्रस्तुत किया है-

राम को रूप निहारति जानकी, कंकन के नग की परिछांहिं।
यातै सुधि सबै भूलि गई, कर टेकी रहि पल टारती नांहि।

इसी प्रकार सीता हरण के बाद राम की वियोगावस्था की भी कवि ने अत्यंत मर्मस्पर्शी चित्रण किया है-

हे खग, मृग हे, मधुकर स्त्रेनी। तुम देखी सीता मृगनैनी।

करुण रस के भी अनेक प्रसंग उनके काव्य में देखने को मिलते हैं, जैसे दशरथ-विलाप, दशरथ-देहावसान, राम-वनवास, लक्ष्मण को शक्ति लगना इत्यादि। लंकाकांड और सुंदरकांड में वीर रस का प्रभावशाली चित्रण मिलता है।

विभिन्न काव्यरूपः

राम काव्य में हमें काव्य रचनाओं के विविध रूप देखने को मिलते हैं। रामकाव्य प्रबंध काव्य, खंडकाव्य, गीतिकाव्य, दृश्यकाव्य आदि रूपों में लिखा गया है। तुलसीदास एक सशक्त कवि थे। उन्होंने जितनी निपुणता प्रबंध काव्य लिखने में दर्शायी गई है, उतनी ही कुशलता से मुक्तक काव्यों की भी रचना की है। ‘रामचरितमानस’ तुलसीदास का ही नहीं वरन संपूर्ण भारतीय साहित्य का सर्वश्रेष्ठ प्रबंध काव्य है। ‘जानकीमंगल’, ‘पार्वतीमंगल’ खंडकाव्य हैं तो ‘कवितावली’, ‘दोहावली’ आदि मुक्तक काव्य के सर्वोत्तम उदाहरण है। ‘गीतावली’ गीतिकाव्य का श्रेष्ठ उदाहरण है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि भारतीय काव्य में प्रयुक्त होने वाली अधिकांश काव्य शैलियाँ केवल तुलसीदास की रचनाओं में ही देखी जा सकती है।

भाषा, छंद व अलंकारः

रामकाव्य मुख्य रूप से दो भाषाओं में रचित है-अवधी भाषा तथा ब्रजभाषा। तुलसीदास ने दोनों भाषाओं में अपने काव्य में रचनाएँ की है। ‘रामचरितमानस’ अवधी भाषा का सर्वश्रेष्ठ प्रबंध काव्य है। इसी तरह ‘कवितावली’, ‘गीतावली’, ‘विनयपत्रिका’ आदि ब्रजभाषा में रचित है। इसके अतिरिक्त उन्होंने अपनी रचनाओं में क्षेत्रीय भाषा के शब्दों का खुलकर प्रयोग हुआ है। अनकी काव्य भाषा लोकोक्तियों एवं मुहावरों से सुसज्जित है। उनकी भाषा का एक उदाहरण देखिए-

उदित उगयगिरि मंच पर, रघुवर बाल पतंग।
बिकसे संत सरोज सब, हरषै लोचन भृंग।

तुलसीदास की रचनाओं में दोहा, सोरठा, चौपाई, सवैया, कवित्त आदि छंदों का प्रयोग किया है। अलंकारों की दृष्टि से तुलसी ने अनुप्रास, यमक, श्लेष, पुनरुक्ति, विभावना, प्रतीप, उपमा, उत्प्रेक्षा, अन्योक्ति आदि का व्यापक प्रयोग हुआ है। तुलसीदास की काव्यकला के विषय में लिखा भी गया है-

कविता करके तुलसी न लसै, कविता लसी पा तुलसी की कला।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि रामकाव्यधारा में रचित काव्य भारतीय साहित्य का सर्वश्रेष्ठ काव्य है।