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बी.ए. प्रथम वर्ष (DSC-1)

रासो साहित्य की विशेषताएँ

हिंदी साहित्य में रासो काव्य परंपरा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।  हिंदी साहित्य का सर्वप्रथम  काव्य इतिहास है। रासो साहित्य का संबंध आदि काल से है।  आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने रासो ग्रंथों के आधार पर ही  इस काल को वीरगाथा काल नाम दिया था। रासो शब्द का अर्थ क्या है, इस बारे में विद्वानों ने अलग-अलग मत दिए हैं जो इस प्रकार है-

गार्सा द तासी ने रासो शब्द की उत्पत्ति राजसूय शब्द से मानी है।  उनकी धारणा है कि राज्य शब्द पृथ्वीराज रासो की प्रतिलिपियों पर लिखा हुआ था।  इसके साथ ही राजा लोगों में  यज्ञ करने की प्रवृत्ति होती थी और उन  यज्ञों को  राजसूय यज्ञ कहा जाता था।  यह ग्रंथ राजाओं की वीरता पर आधारित है  इसीलिए रासो राजसूय का ही प्रतीक है।

डॉ. ग्रियर्सन ने रासो शब्द की उत्पत्ति  राजादेश शब्द से मानी है।  जिसका अर्थ है राजा के आदेश से लिखा गया काव्य।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने रासो शब्द की उत्पत्ति रसायन शब्द से मानी है।  इसके पीछे यह धारणा है कि बीसलदेव रासो में रसायन शब्द का प्रयोग बार-बार किया गया है और यही रसायन शब्द आगे चलकर राष्ट्र के रूप में प्रयुक्त हुआ।डॉ. ग्रियर्सन ने रासो शब्द की उत्पत्ति  राजादेश शब्द से मानी है।  जिसका अर्थ है राजा के आदेश से लिखा गया काव्य।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने रासो शब्द की उत्पत्ति रासक शब्द से मानी है। रासक संस्कृत परंपरा का उदाहरण है। अपभ्रंश भाषा में 29 मात्राओं का एक छंद होता है,  जिसका प्रयोग  श्रृंगार एवं वीरता पर रचनाओं के लिए किया जाता है।  रासो ग्रंथ भी इसी रासक छंद में लिखे गए हैं, इसीलिए रासो शब्द की उत्पत्ति रासक से ही मानी जानी चाहिए।  द्विवेदी जी की यह धारणा सर्वमान्य हो गई।

रासो साहित्य मूलतः सामंती व्यवस्था, प्रकृति और संस्कार से उपजा साहित्य है, जिसका संबंध पश्चिमी हिंदी प्रदेश से है।  इसे देश भाषा काव्य के नाम से भी जाना जाता है। इस साहित्य के रचनाकार हिंदू राजपूत राजाओं के आश्रय में रहने वाले चारण या भाट कवि थे। समाज में उनका सम्मान था क्योंकि उनका जुड़ाव सीधे राजा से होता था।  आदिकाल की राजनीतिक परिस्थितियां असंतुलित व अव्यवस्थित थी।  हर्षवर्धन के शक्तिशाली राज्य की समाप्ति के पश्चात केंद्रीकृत शक्तियों का अभाव हो गया।  पश्चिमी भारत में गहरवाल, चौहान, चंदेल, परिहार आदि राज्यों की स्थापना हुई।  यह राज्य आपसी प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या रखते थे।  पूरा देश छोटे-छोटे राज्यों में बंट गया था और इन राज्यों के राजा एक दूसरे के साथ युद्धरत रहते थे।  आपसी लड़ाई और मुसलमानों के आक्रमण से देश आक्रांत था।  ऐसे समय में राजाओं के आश्रित कवि इस तरह की रचनाएं लिख रहे थे, जो युद्धक्षेत्र में अपने राजा, आश्रय दाता, वीर पुरुषों तथा सैनिकों के मनोबल को बढ़ाएं और उन्हें युद्ध के लिए प्रेरित करती रहे।  आदिकाल के इन चारण भाट कवियों ने न केवल वीरतापूर्ण युद्ध घटनाओं का बढ़ा चढ़ाकर वर्णन किया बल्कि अपने आश्रय दाता वह वीर सैनिकों की वीरता का भी ओजपूर्ण वर्णन किया है। इन कवियों ने युद्ध की यथास्थितियों का भी बारीकी से चित्रण किया है, क्योंकि ये स्वयं युद्धभूमि में राजा के साथ रहते थे। यही वीरतापूर्ण रचनाएं रासो ग्रंथों के नाम से प्रसिद्ध हुई।  रासो काव्य की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार है-

 1- दरबारी साहित्यः

रासो काव्य रचनाएं लिखने वाले कवि प्रायः दरबारी कवि थे। अपने सुख के लिए नहीं बल्कि अपने स्वामी के सुख के लिए काव्य की रचना की है।  प्रायः तत्कालीन सभी राजपूत राजाओं के दरबारों में आश्रित चारण या भाट रहते थे जो अवसर आने पर अपने राजाओं की प्रशंसा व उनके युद्ध कौशल का चित्रण करते थे। अतः आदिकालीन साहित्य को दरबारी साहित्य भी कहा जा सकता है।

 2- संदिग्ध रचनाएंः

इस काल में प्राप्त होने वाली रचनाओं को विद्वानों ने संदिग्ध रचनाएं माना है।  विशेष रुप से जो वीर ग्रंथ है उनकी प्रमाणिकता को लेकर विद्वानों में मतभेद है।  इन ग्रंथों में चार प्रमुख ग्रंथ है पृथ्वीराज रासो बीसलदेव रासो खुमान रासो तथा परमाल रासो।  इन काव्य रचनाओं में शताब्दियों तक परिवर्तन होते चले गए पृथ्वीराज रासो में कुछ ऐसी घटनाएं हैं जो किसी भी दृष्टि से प्रामाणिक प्रतीत नहीं होती और उसी तरह खुमान रासो को राष्ट्र परंपरा की प्रथम रचना कहा गया है परंतु इसमें 16 वीं शताब्दी तक की घटनाएं दी गई है।

 3- ऐतिहासिकता का अभावः

कहने को तो यह रचना ऐतिहासिक है परंतु इनमें ऐतिहासिकता का अभाव है।  इन रचनाओं में ऐतिहासिक राजाओं की वीरता का वर्णन तो किया गया है परंतु कवि ने अपनी तरफ से भी कुछ ऐसे तथ्य जोड़ दिए हैं जिनका इतिहास से कोई संबंध नहीं है।  इनमें ऐतिहासिकता का कम और कल्पना का विकास अधिक हुआ है।

 4- युद्धों का सजीव वर्णनः

इस काल के चारण कवि केवल कलम के ही धनी नहीं थे बल्कि आवश्यकता पड़ने पर वह तलवार निकालकर अपनी वीरता का परिचय भी देते थे।  यह कवि अपने आश्रय दाताओं के साथ युद्ध क्षेत्र में जाते थे।  अतः इनकी रचनाओं में अपनी आश्रय दाताओं की युद्ध कौशल के साथ साथ युद्ध भूमि का सजीव सुंदर और यथार्थ वर्णन बन पड़ा है।  उदाहरण के लिए परमाल रासो में आल्हा-ऊदल की 52 लड़ाइयों का जो चित्रण हुआ है वह अद्भुत बन पड़ा है।

 5- आश्रय दाताओं का यशोगानः

इस काल के सभी कवियों ने अपने आश्रय दाताओं की वीरता एवं चरित्र का अतिश्योक्तिपूर्ण वर्णन किया है। यह कभी ओजस्वी भाषा द्वारा अपने आश्रय दाता की वीरता, उसके युद्ध कौशल और ऐश्वर्य का वर्णन करते हुए दिखाई देते हैं। यह कभी आशय दाताओं के मित्र और सलाहकार भी होते थे अतः उनकी आजीविका आश्रयदाता पर ही निर्भर होती थी। दूसरे इस युग में सौ-पचास गांव को ही राजा अपना राष्ट्र मान लेता था और पड़ोसी राज्य के पतन को देखकर राजा और राजकवि दोनों ही प्रसन्न होते थे। इसीलिए भी यह कवि अपने राजाओं की वीरता का अतिशयोक्ति पूर्ण शैली में वर्णन करते थे।

 6- वस्तु वर्णन और प्रकृति वर्णनः

रासो कवियों ने अनेक प्रकार के वर्णन किए हैं।  इन कवियों ने अपनी रचनाओं में राजाओं की शूरवीरता, पराक्रम, युद्ध, शत्रु विजय, रण सज्जा, आखेट आदि का वर्णन किया है, साथ ही अपने राजाओं को सिंह के समान वीर माना है।  इन चारण कवियों की प्रकृति में बड़ी रुचि रही है। इन्होंने प्राकृतिक दृश्यों का मानवीकरण किया है तो कहीं-कहीं प्रकृति को दूत के रूप में भी प्रस्तुत किया है।  श्रृंगार वर्णन करते हुए जहां संयोगावस्था में प्रकृति का सुखद चित्रण किया गया है वहीं वियोगावस्था में प्रकृति चित्रण दुखदाई हो जाता है।

 7- जन जीवन के प्रति उपेक्षा का भावः

रासो कवि केवल अपने राजा तक जुड़े थे उन्हें जनता के सुख-दुख तथा व्यथा से कुछ भी लेना देना नहीं था।  इनका साहित्य राज दरबार तक ही सीमित रह गया था जन जीवन के प्रति यह पूर्णता  उपेक्षा का भाव प्रति थे।

 8- काव्य रूप और भाषाः

आदि काल में प्रबंध और मुक्तक दोनों प्रकार की काव्य रचनाएं उपलब्ध होती है बीसलदेव रासो आदि काल का प्राचीनतम प्रबंध काव्य है जिसमें नायिका की विरह व्यथा का चित्रण हुआ है। पृथ्वीराज रासो एक अन्य प्रबंध काव्य है।

 रासो काव्य में जिस भाषा का प्रयोग हुआ है उसे विद्वानों ने डिंगल पिंगल का नाम दिया है। डिंगल राजस्थानी और अपभ्रंश का मिश्रित रूप है। यह वीर रस की रचनाओं के लिए प्रयुक्त भाषा है।  दूसरी ओर पिंगल भाषा अपभ्रंश और ब्रज का मिश्रित रूप है। श्रृंगार वर्णन के लिए रासो कवियों ने पिंगल भाषा का ही प्रयोग किया है।

 9- रस, छंद एवं, अलंकारः

रासो साहित्य वीर रस के साथ साथ पूरा रस का सुंदर वर्णन प्रस्तुत करता है।  इसमें रासक नामक एक छंद का प्रयोग हुआ है जिससे इस काव्य को रासो काव्य का नाम दिया गया है। इसके अतिरिक्त दोहा,  तोटक,  छप्पय,  कवित्त,  सवैया आदि असंख्य छंदों का प्रयोग इन काव्य रचनाओं में किया गया है।  जहां तक अलंकारों की बात है अनुप्रास, यमक, श्लेष, उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, संदेश, अतिशयोक्ति आदि अलंकारों की प्रधानता किस काव्य में मिलती है।

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