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बी.ए. द्वितीय वर्ष (अनिवार्य हिंदी)

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जीवन परिचय एवं काव्यगत विशेषताएँ

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ हिन्दी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माने जाते हैं। महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जन्म सन् 1896 में बंगाल राज्य की महिषादल नामक रियासत की मेदिनीपुर नामक गांव में हुआ।  उनके पिता राम सहाय त्रिपाठी मूलतः उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के गढ़कोला नामक गांव के निवासी थे तथा आजीविका के लिए महिषादल चले आए थे।  वे पेशे से सिपाही थे।  निराला की प्रारंभिक शिक्षा महिषादल में ही हुई।  निराला जाति से कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे। वसंत पंचमी पर उनका जन्मदिन मनाने की परंपरा 1930 ई. में प्रारंभ हुई। उनका जन्म मंगलवार को हुआ था। जन्म-कुण्डली बनाने वाले पंडित के कहने से उनके बचपन का नाम सुरजकुमार रखा गया। अभी निराला 3 वर्ष के ही थे कि उनकी माता का निधन हो गया। इनके पिता कठोर स्वभाव के और अत्यधिक अनुशासन प्रिय थे।  1913 ई. में इनके पिता का निधन हो गया।

निराला की शिक्षा यहीं बंगाली माध्यम से शुरू हुई। हाईस्कूल पास करने के पश्चात् उन्होंने घर पर ही संस्कृत और अंग्रेज़ी साहित्य का अध्ययन किया। हाईस्कूल करने के पश्चात् वे लखनऊ और उसके बाद गढकोला (उन्नाव) आ गये। प्रारम्भ से ही रामचरितमानस उन्हें बहुत प्रिय था। वे हिन्दी, बंगला, अंग्रेज़ी और संस्कृत भाषा में निपुण थे और श्री रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द और श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर से विशेष रूप से प्रभावित थे। 1911 ई. में इनका विवाह मनोहरा देवी से हुआ। रायबरेली ज़िले में डलमऊ के पं. रामदयाल की पुत्री मनोहरा देवी सुन्दर और शिक्षित थीं, उनको संगीत का अभ्यास भी था। पत्नी के ज़ोर देने पर ही उन्होंने हिन्दी सीखी। इसके बाद अतिशीघ्र ही उन्होंने बंगला के बजाय हिन्दी में कविता लिखना शुरू कर दिया। बचपन के नैराश्य और एकाकी जीवन के पश्चात् उन्होंने कुछ वर्ष अपनी पत्नी के साथ सुख से बिताये, किन्तु यह सुख ज़्यादा दिनों तक नहीं टिका और उनकी पत्नी की मृत्यु उनकी 20 वर्ष की अवस्था में ही हो गयी।

1914 ई. का वर्ष निराला के जीवन में भयंकर उथल-पुथल का समय था। पहले महायुद्ध के बाद जो महामारी फैली उसमें इनके चाचा, भाई और भाभी का भी देहांत हो गया। 19 वर्ष की अल्पायु में इनकी प्रिय पुत्री सरोज का भी देहांत हो गया। पारिवारिक जीवन में इस प्रकार के आघातों से निराला का जीवन दुःखमय हुआ। इसके बाद का उनका सारा जीवन आर्थिक-संघर्ष में बीता। निराला के जीवन की सबसे विशेष बात यह है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने सिद्धांत त्यागकर समझौते का रास्ता नहीं अपनाया, संघर्ष का साहस नहीं गंवाया। निराला स्वच्छन्द प्रकृति के थे और स्कूल में पढ़ने से अधिक उनकी रुचि घूमने, खेलने, तैरने और कुश्ती लड़ने इत्यादि में थी। संगीत में उनकी विशेष रुचि थी। अध्ययन में उनका विशेष मन नहीं लगता था।सामाजिक और साहित्यिक संघर्षों को झेलते हुए भी इन्होंने कभी अपने लक्ष्य को नीचा नहीं किया।

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की पहली नियुक्ति महिषादल राज्य में ही हुई। उन्होंने 1918 ई. से 1922 ई. तक यह नौकरी की। उसके बाद संपादन, स्वतंत्र लेखन और अनुवाद कार्य की ओर प्रवृत्त हुए। 1922-23 के दौरान कोलकाता से रामकृष्ण मिशन द्वारा प्रकाशित ‘समन्वय’ का संपादन किया, 1923 ई. के अगस्त से ‘मतवाला’ के संपादक मंडल में कार्य किया। इसके बाद लखनऊ में गंगा पुस्तक माला कार्यालय में उनकी नियुक्ति हुई जहाँ वे संस्था की मासिक पत्रिका ‘सुधा’ से 1935 ई. के मध्य तक संबद्ध रहे। 1935 से 1940 तक का कुछ समय उन्होंने लखनऊ में भी बिताया। इसके बाद 1942 ई. से मृत्यु पर्यन्त इलाहाबाद में रह कर स्वतंत्र लेखन और अनुवाद कार्य किया। निपट निर्धनता, उपेक्षा और अस्वस्थता की दशा में 15 अक्तूबर, 1961 ई. में इनका देहांत हो गया।

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की रचनाएँः

निराला एक बहुमुखी प्रतिभा संपन्न एवं प्रखर साहित्यकार थे। उन्होंने साहित्य की अनेक विधाओं पर लेखनी चलाई है। उनकी प्रमुख रचनाएं इस प्रकार है-

काव्य रचनाएंः

‘परिमल’, ‘गीतिका’, ‘अनामिका’, ‘तुलसीदास’, ‘कुकुरमुत्ता’, ‘अणिमा’, ‘नए पत्ते’, ‘अर्चना’, ‘आराधना’, ‘गीत कुंज’, ‘सांध्य काकली’

‘तुलसीदास’ काव्य निराला का खंडकाव्य है अन्य सभी रचनाएं मुक्तक काव्य के अंतर्गत रखी गई है।

उपन्यास साहित्यः

‘अप्सरा’, ‘अलका’, ‘प्रभावती’, ‘निरुपमा’, ‘काले कारनामे’’

कहानी संग्रह:

‘लिली’, ‘सखी, ‘चतुरी चमार’, ‘सुकुल की बीवी’

नाटक:

‘समाज’ , ‘शकुंतला’

जीवनी:

‘ध्रुव-भीष्म’, ‘राणा प्रताप’

आलोचनात्मक ग्रंथ:

निबंध साहित्य:

‘प्रबंध पद्य’, ‘प्रबंध प्रतिमा’, ‘चाबुक’, ‘प्रबंध परिचय’

रेखाचित्र:

‘कुल्ली भाट’, ‘बिल्लेसुर बकरिहा’

निराला की साहित्यिक विशेषताएं-

1- व्यक्तिगत सुख-दुख की अभिव्यक्ति का काव्य

निराला छायावादी कवियों में ऐसे कवि हैं जिन्होंने अपनी रचनाओं में अपने व्यक्तिगत सुख-दुख की अनुभूतियों को व्यक्त किया है। उनका पूर्ण जीवन दुख, करुणा एवं निराशा के साथ साथ संघर्ष एवं विषमताओं के साथ बीता, इन्हीं सभी की अभिव्यक्ति उन्होंने अपने काव्य में की है। ‘जूही की कली’, ‘मैं अकेला’, ‘राम की शक्ति पूजा’, ‘स्नेह निर्झर बह गया’, ‘सरोज-स्मृति’ असंख्य उनकी ऐसी रचनाएं हैं जिनमें व्यक्तिगत सुख-दुखों को सुंदर अभिव्यक्ति के साथ पिरोया गया है। एक उदाहरण देखिए-

स्नेह निर्झर बह गया है
रेत ज्यों तन रह गया है
आम की यह डाल जो सुखी दिखी
कह रही है, “अब यहां पिक या शिखी”
नहीं आते, पंक्ति मैं वह हूं लिखी
नहीं जिसका अर्थ
जीवन ढह गया है।

2- आत्म गौरव एवं आत्माभिमान का काव्यः

निराला का संपूर्ण काव्य आत्म गौरव एवं अभिमान का काव्य है। अपने उग्र स्वभाव एवं आत्माभिमान के कारण वह धीरे-धीरे अपने समकालीनों से कटते गए। निर्भय होकर सच्ची बात कहने के कारण उन्होंने साहित्य जगत में अनेक शत्रु बना लिए। इस कारण कई बार उनकी उपेक्षा भी हुई, जिसके कारण उनका आहत अभिमान और अधिक बढ़ गया। वे लिखते हैं-

दिए हैं मैंने जगत को फूल फल
किया है अपनी प्रभा से चकित चल

3- प्रेम एवं सौंदर्य का काव्यः

निराला की आरंभिक रचनाओं में प्रेम और सौंदर्य का प्रभावशाली वर्णन हुआ है। कई स्थानों पर उनका प्रेम निरूपण लौकिक होने के साथ-साथ अलौकिक भी बन गया है। ‘जूही की कली’ नामक कविता प्रेम और सौंदर्य का उत्कृष्ट उदाहरण है-

निर्दई उस नायक ने
निपट निठुराई की
कि झोंको की झाड़ियों से
सुंदर सुकुमार देह सारी झकझोर डाली

4- प्रकृति चित्रण:

अन्य छायावादी कवियों के समान निराला ने भी प्रकृति का बड़ा सुंदर एवं मनोहारी वर्णन किया है। वे प्रकृति के अद्भुत चितेरे थे। उनकी कविता में प्रकृति निर्जीव पदार्थ की तरह अंकित नहीं है बल्कि वह सजीव एवं प्राणवान है। बसंत हो या वर्षा, ग्रीष्म हो या शरद ऋतु उनकी कविता समान रूप से प्रकृति के भव्य रूपों का अंकन करती है। निराला के शब्दों में संध्या का भावपूर्ण चित्र देखिए-

दिवसावसान का समय
मेघमय आसमान से उतर रही है
वह संध्या सुंदर परी सी
धीरे, धीरे, धीरे

5- रहस्यानुभूति का काव्यः

निराला जी वेदांत दर्शन से अधिक प्रभावित थे और वे भक्ति को सर्वोपरि मानते थे। ‘पंचवटी प्रसंग’ में उन्होंने मुक्ति और भक्ति पर गंभीर विचार किया है, साथ ही इस कविता में उन्होंने भक्ति, योग, कर्म, ज्ञान आदि का समन्वय करने का प्रयास किया है

भक्ति-योग-कर्म-ज्ञान एक ही है
यद्यपि अधिकारियों के निकट मित्र दिखते हैं
एक ही है दूसरा नहीं है कुछ
द्वैत भाव ही है भ्रम

6- राष्ट्रीय भावना:

महाकवि निराला के काव्य में राष्ट्रप्रेम का स्वर अत्यंत प्रखर है।उन्होंने भारत की महान परंपराओं को कविता में स्थान दिया और भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ को काव्य में अंकित किया है। ‘खून की होली जो खेली’’,  ‘जागो फिर एक बार’, ‘भारती वंदन’, ‘वीणा वादिनी वर दे’, आदि कविताओं में कवि ने बार-बार देश प्रेम की भावना को व्यक्त किया है-

भारती जय विजय करें
कनक शस्य कमल धरे
लंका पददल शतदल
गर्जितोर्मि सागर जल
होता शुचि चरण यूगल
धवल धार हार गले

7- प्रगतिशील विचारधारा:

निराला केवल छायावादी कवि ही नहीं थे अपितु वे प्रगतिवादी कवि भी थे। उनका काव्य दलितों और कमजोर वर्गों के प्रति विशेष सहानुभूति रखता है। निराला के हृदय का करुण भाव समाज के उपेक्षित, कमजोर, पीड़ित एवं शोषित वर्गों की रक्षा को अर्पित है। ‘विधवा’ की पीड़ा उन्हें द्रवित करती है तो ‘भिखारी’ की दीनता एवं भूख उन्हें करुणा से भर जाती है। कड़कड़ाती धूप में इलाहाबाद के पथ पर पत्थर तोड़ती मजदूर नारी का करुण चित्रण पाठक के मन को अनायास ही छू जाता है

वह तोड़ती पत्थर
देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर
देख कर कोई नहीं
देखा मुझे उस दृष्टि से
जो मार खा रोई नहीं

8- व्यंग्य एवं हास्य का पुटः

निराला ने समाज में फैली विकृतियों एवं विद्रूपताओं का व्यंग्यात्मक चित्रण किया है। ‘कुकुरमुत्ता’ कविता में उनके तीक्ष्ण व्यंग्य को देखा जा सकता है। ‘कुकुरमुत्ता’ निम्न एवं कमजोर वर्ग का प्रतिनिधि है और वह पूंजीवादी गुलाब को चुनौती देता हुआ कहता है

अबे सुन बे गुलाब
भूल मत पर भाई तूने खुशबू रंगो आब
खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट
दाल पर इतरा रहा है कैपिटलिस्ट

9- सामाजिक चेतना और विद्रोह का काव्य:

निराला के काव्य की एक विशेषता यह भी है कि उनका संपूर्ण काव्य सामाजिक चेतना और विद्रोह का काव्य है। ‘वीणा वादिनी वर दे’ नामक कविता में कवि समाज में नवीन शक्ति का प्रादुर्भाव देखना चाहता है। वह समाज के शोषित और उपेक्षितों की कथा को व्यक्त करता है। अन्य छायावादी कवियों की अपेक्षा निराला अधिक विरोधी और स्वच्छंदतावादी दिखाई देते हैं। निराला उन पुरानी रूढ़ियों और जड़ परंपराओं को नष्ट करना चाहते थे जो समाज को खोखला करती जा रही है। काव्य जगत में मुक्त छंद का प्रवर्तक इसी विद्रोह और जड़ परंपराओं का विरोध है। ‘सरोज स्मृति’ में वे लिखते हैं-

तुम करो ब्याह तोड़ता नियम
मैं सामाजिक योग के प्रथम
लग्न में पढ़ूंगा स्वयं मंत्र
यदि पंडित जी होंगे स्वतंत्र

10- कला पक्ष:

काव्य जगत में मुक्त छंद को प्रतिष्ठित करने का श्रेय निराला को ही जाता है। उन्होंने कविता को छंदों की कैद से मुक्त करवाया। उनकी काव्य भाषा भावपूर्ण एवं विषय अनुकूल है। कहीं पर भी उर्दू मिश्रित भाषा का प्रयोग करते हैं तो कहीं संस्कृत निश्चित तत्सम शब्दावली का। खड़ी बोली हिंदी को काव्य की श्रेष्ठ भाषा सिद्ध करने का श्रेय भी निराला को ही जाता है।निराला जी लगातार भाषा से जलते रहे उन्होंने भाषा को अनुभूति से जोडा शब्द की आत्मा से तादात्म्य स्थापित किया। उनके काव्य प्रयोगों की विविधता और मौलिकता ने अनेक काव्य आयाम को जन्म दिया और एकही स्तर पर विविध भाषा प्रयोग कर सके।  भाव के अनुसार भाषा और लय का निर्वाह करने वाले निराला प्रचंड प्राण शक्ति, दुर्दमनीय जिजीविषा तथा सूक्ष्म संवेदन के कवि है। ‘राम की शक्तिपूजा’ कविता का उदारण देखिएः

रवि हुआ अस्त; ज्योति के पत्र पर लिखा अमर
रह गया राम-रावण का अपराजेय समर
आज का तीक्ष्ण शर-विधृत-क्षिप्रकर, वेग-प्रखर,
शतशेलसम्वरणशील, नील नभगर्ज्जित-स्वर,
प्रतिपल – परिवर्तित – व्यूह – भेद कौशल समूह
राक्षस – विरुद्ध प्रत्यूह,-क्रुद्ध – कपि विषम हूह,
विच्छुरित वह्नि – राजीवनयन – हतलक्ष्य – बाण,
लोहितलोचन – रावण मदमोचन – महीयान,
राघव-लाघव – रावण – वारण – गत – युग्म – प्रहर,

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि निराला का काव्य एक चित्रशाला है जहां जीवन और जगत के बहुरंगी स्वरूप को सुव्यवस्थित किया गया है। उनके काव्य में सुख-दुख, हास्य-करुणा, राग-विराग, शांति-विद्रोह, अध्यात्म-श्रृंगार, आदर्श और यथार्थ जैसे बहुरंगी चित्र अंकित है। उनकी आस्था मानवतावाद में थी और मानव जीवन को सुखमय एवं गौरव में बनाने के लिए ही उन्होंने साहित्य सृजन का काम किया। निःसंदेह वे महान व्यक्ति होने के साथ-साथ एक महान साहित्यकार थे इसीलिए उन्हें महाप्राण निराला के नाम से संबोधित किया जाता है।

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