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अनुवाद (Translation)का अर्थ एवं परिभाषाएँ

वर्तमान युग को अनुवाद का युग कहा जाए तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। भारत में अनुवाद की परम्परा प्राचीन काल से ही चली आ रही है। कहते हैं अनुवाद उतना ही प्राचीन जितनी कि भाषा। आज ‘अनुवाद’ शब्द हमारे लिए कोई नया शब्द नहीं है। विभिन्न भाषायी मंच पर, साहित्यिक पत्रिकाओं में, अखबारों में तथा रोजमर्रा के जीवन में हमें अक्सर ‘अनुवाद’ शब्द का प्रयोग देखने-सुनने को मिलता है। उत्तर-आधुनिक युग में अनुवाद की महत्ता व उपादेयता को विश्वभर में स्वीकारा जा चुका है। वैदिक युग के ‘पुन: कथन’ से लेकर आज के ‘ट्रांसलेशन’ तक आते-आते अनुवाद अपने स्वरूप और अर्थ में बदलाव लाने के साथ-साथ अपने बहुमुखी व बहुआयामी प्रयोजन में सफल हुआ है। प्राचीन काल में ‘स्वांत: सुखाय’ माना जाने वाला अनुवाद कर्म आज संगठित व्यवसाय का मुख्य आधार बन गया है। दूसरे शब्दों में कहें तो अनुवाद प्राचीन काल की व्यक्ति परिधि से निकलकर आधुनिक युग की समष्टि परिधि में समा गया है। आज विश्वभर में अनुवाद की आवश्यकता जीवन के हर क्षेत्र में किसी-न-किसी रूप में अवश्य महसूस की जा रही है। और इस तरह अनुवाद आज के जीवन की अनिवार्य आवश्यकता बन गया है।

अनुवाद का अर्थ एवं परिभाषाएँः

अनुवाद शब्द की व्युत्त्पति भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा से संबंधित है। प्राचीन भारत में शिक्षा स्थल गुरुकुल थे। पढ़ने-पढ़ाने के क्रम में गुरु या आचार्य जो कुछ बोलते थे, किसी सुभाषित या मंत्र का उच्चारण करते थे तो शिष्य उन्हें दोहराते थे। इस प्रक्रिया को अनुवचन या अनुवाद कहा जाता था। अनुवाद संस्कृत का  तत्सम् शब्द है। यह संस्कृत कि वद् धातु में घञ् प्रत्यय लगने से ‘वाद’ बना है। इसके पीछे ‘अनु’ उपसर्ग जोड़ने से अनुवाद शब्द का निर्माण हुआ है अर्थात् अनुवाद शब्द दो शब्दों के मेल से बना है, ‘अनु’+’वाद’। अनु का अर्थ है पीछे या बाद में तथा वाद का अर्थ है कहना। अतः अनुवाद का मूल अर्थ है पुन्नःकथन या किसी के कहे को कहना।

भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों ने इसके लिए अलग-अलग शब्द प्रचलित किए हैं जैसे- मराठी में अनुवाद ‘भाषांतर’ कहलाता है, हिंदी में ‘अनुवाद’, उर्दू में ‘तर्जुमा’, मलयालम में ‘परिभाष’, तेलुगु में ‘अनुवादमु’  पंजाबी में ‘उल्था’ कश्मीरी में ‘तर्जुमा’, सिंधी में ‘अनुवाद’, बांग्ला में ‘तर्जुमा’, असमिया में ‘अनुवाद’, कन्नड़ में ‘भाषांतर’, उड़िया में ‘अनुवाद’ तथा गुजराती में ‘अनुवाद,’ इस प्रकार अनुवाद शब्द के लिए अनेक पर्यायवाची शब्द उपलब्ध हैं जो एक ही अर्थ व्यक्त करते हैं।

अनुवाद का सामान्य अर्थ है किसी एक भाषा में कही गई बात को दूसरी भाषा में कहना।अनुवाद एक भाषिक प्रक्रिया है अथवा भाषिक प्रक्रिया का परिणाम है जिसमें एक भाषा में अभिव्यक्त बात को दूसरी भाषा में संप्रेषित किया जाता है।

अनुवाद को अंग्रेजी में ट्रांसलेशन (Translation) कहा जाता है जो लैटिन भाषा के ट्रांस (Trans) तथा लेशन (Lation) शब्दों के संयोग से बना है। ट्रांस का अर्थ है पार ले जाना और लेशन का अर्थ है क्रिया अर्थात एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने वाली प्रक्रिया। इस प्रकार ट्रांसलेशन का अर्थ हुआ एक भाषा से दूसरी भाषा में ले जाने वाली प्रक्रिया। जिस भाषा का अनुवाद किया जाता है उसे स्त्रोत भाषा या मूल भाषा (Source Language) कहा जाता है, दूसरी ओर जिस भाषा में अनुवाद किया जाता है उसे लक्ष्य भाषा (Target Language) कहा जाता है।

उदाहरण के लिए यदि हिंदी की किसी पुस्तक का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद करना है तो हिंदी भाषा मूल भाषा हुई और अंग्रेजी भाषा लक्ष्य भाषा कहलाएगी। जो व्यक्ति अनुवाद करता है उसे अनुवादक कहा जाता है और एक अच्छे अनुवादक को स्त्रोत भाषा और लक्ष्य भाषा पर पूर्ण अधिकार होना अनिवार्य है, साथ ही साथ जिस सामग्री के विषय का वह अनुवाद कर रहा है उसके संपूर्ण परिवेश की जानकारी का भी ज्ञान होना आवश्यक है।

साधारण शब्दों में कहा जाए तो अनुवाद का मूल अर्थ हुआ पहले कही गई बात को दोहराना। अनुवाद दो भाषाओं के बीच एक सांस्कृतिक सेतु की तरह है जिस पर चलकर दो भिन्न भाषाएं आपसी समय और दूरी के अंतराल को पार कर भावात्मक एकता में स्थापित होती है।

परिभाषाएंः

विभिन्न विद्वानों ने अनुवाद को निम्नलिखित शब्दों में परिभाषित किया है-

शब्दार्थ चिंतामणि कोश के अनुसार,”प्राप्तस्य पुनः कथने”अर्थात पहले गए गए कथन को फिर से कहना।

भार्गव हिंदी शब्दकोश के अनुसार, “अनुवाद का अर्थ है पुनर उल्लेख दोहराव अनुकरण या भाषांतर।

देवेंद्र नाथ शर्मा के अनुसार,”विचारों को एक भाषा से दूसरी भाषा में रूपांतरित करना अनुवाद है।”

भोलानाथ तिवारी के अनुसार,“किसी भाषा में प्राप्त सामग्री को दूसरी भाषा में भाषांतरण करना अनुवाद है।”

डॉ. पूरन चंदन के अनुसार,“एक भाषा से दूसरी भाषा में प्रस्तुतीकरण की प्रणाली अनुवाद कहलाती है। यह ऐसी कला है जिसमें एक भिन्न पृष्ठभूमि वाले पाठक के लिए किसी रचनाकार का किसी और भाषा में भाषांतरण होता है।”

जैनेंद्र के अनुसार,“अनुवाद का मतलब है किसी बात को एक से दूसरी भाषा में उतारकर कहना। आवश्यक है कि वह बात दूसरी भाषा वाले के पास पहुंच जाए, बात का भाव सही-सही पहुंचे और बीच में कहीं वह अपना प्रभाव न खोए।”

अज्ञेय के अनुसार, “हमारे विचारों तथा तात्पर्य को एक भाषा से दूसरी भाषा में प्रस्तुत करना ही अनुवाद है।”

कैटफोर्ड के अनुसार,“किसी एक भाषा की पाठ्य सामग्री को किसी दूसरी भाषा में उसी रूप में रूपांतरित करना ही अनुवाद है।”

न्यूयार्क के अनुसार,“अनुवादक शिल्प है जिसमें भाषा में लिखित संदेश के स्थान पर दूसरी भाषा में उसी संदेश को प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया जाता है।”

उपरोक्त परिभाषा से स्पष्ट है कि अनुवाद वह परिकल्पना है जिसमें किसी एक भाषा की सामग्री को दूसरी भाषा में उसी रूप तथा भाव एवं शिल्प के समतुल्य रखा जाता है। जब मूल भाषा की सामग्री को लक्ष्य भाषा में रूपांतरित किया जाता है तब यह ध्यान रखा जाता है कि उसका मूल भाव नष्ट न हो और पाठक को वही आनंद प्राप्त हो जो मूल पाठ को पढ़कर होता है। संक्षेप में कहा जाए तो अनुवाद एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें स्रोत भाषा की सामग्री को दूसरी भाषा अर्थात लक्ष्य भाषा में रूपांतरित किया जाता है।अनुदित किए गए पाठ को मूल पाठ और रूपांतरित किए गए पाठ को अनुदित पाठ कहा जाता है। मूल पाठ और अनुदित पाठ में अर्थ और भाषा शैली विशेष की समतुल्य ता होनी चाहिए अर्थात दोनों में भाव और शिल्प की दृष्टि से अधिक अंतर नहीं होना चाहिए।

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