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त्यागपत्र उपन्यास में मूलतः किन समस्याओं को उठाया गया है?

‘त्यागपत्र’ उपन्यास मनोवैज्ञानिक कथाकार जैनेंद्र कुमार द्वारा रचित प्रसिद्ध उपन्यास है।  यह उपन्यास 1937 ईस्वी में प्रकाशित हुआ।  यह आकार  में जितना छोटा है, उससे कहीं अधिक व्यापक इसका उद्देश्य है। इसमें मृणाल नामक पात्र को माध्यम से स्त्री की यातनापूर्ण स्थिति को पूर्ण मार्मिकता एवं यथार्थवादी दृष्टि के साथ प्रस्तुत किया गया है। तत्कालीन समाज किस तरह की रूढ़िवादी परंपराओं और अनैतिकताओं का शिकार था, उन सभी का यथार्थ वर्णन लेखक द्वारा इस उपन्यास में किया गया है। यह उपन्यास चीफ जस्टिस एम. दयाल द्वारा लिखी गई आत्मकथा है। एम. दयाल का चरित्र उपन्यास में प्रमोद के नाम से चित्रित है। पूरा उपन्यास आत्मकथात्मक शैली में लिखा गया है।

त्यागपत्र मूलतः मृणाल की दर्द भरी कहानी है जिसमें समाज की रूढ़ियाँ, कठोर नैतिक मान्यताएँ एवं अमानवीय सामाजिक व्यवस्था का चित्रण हुआ है। यह कथा मृणाल के साथ आरंभ होती है और उसी के अंत के साथ समाप्त।

मृणाल स्वतंत्र विचारधारा की स्वामिनी है। प्रमोद अर्थात् एम. दयाल अपने बचपन से कहानी का आरंभ करते हैं। परिवार में उसके माता-पिता और तीन ब्वॉय थी।  तीन भावों में मृणाल ही जीवित थी।  प्रमोद की मां मृणाल को आदर्श नारी बनाना चाहती है और उससे कठोर, अमानवीय व्यवहार करती है। मृणाल अपने अनुसार, अपनी भावनाओं के अनुसार अपना जीवन यापन करना चाहती है परंतु समाज उसे अपने नियमों, बंधनों में जकड़े रखना चाहता है। मृणाल अपनी सहेली शीला के भाई से प्रेम करती है,  परंतु उसकी भाभी उसे बेंत मार मार कर बेहोश कर देती है।  वह भाभी के आगे आत्मसमर्पण कर देती है और अधेड़ उम्र के दोहाजु से विवाह स्वीकार कर लेती है।  पति के साथ वहां निश्चल भाव से रहना चाहती है परंतु वह भी उसे दुश्चरित्रा समझ कर उस पर अत्याचार करता है।  मृणाल समाजिक मान्यताओं के भय से मायके में भी नहीं रह पाती।  उसका  पति भी उसका त्याग कर देता है।  एक कोयले वाला उसकी सुंदरता पर मोहित हो उसकी रक्षा करता है और परिवार को त्याग कर मृणाल के साथ रहने लगता है।  मृणाल भी सामाजिक बंधनों को त्याग कर उसे पति मान कर उसके साथ रहने लगती है। कुछ समय पश्चात वह कोयले वाला भी उसका त्याग कर उसकी सारी संपत्ति हथिया कर चला जाता है। मृमाल उस समय गर्भवती होती है और मिशन अस्पताल में एक कन्या को जन्म देती है। समाज फिर उसकी रक्षा करने नहीं आता और उसकी कन्या शीघ्र ही मर जाती है।  मृणाल अब भी जीवांकांक्षा नहीं छोड़ती और बच्चों को पढ़ाने लग जाती है। वहां भी समाज की मान-मर्यादाएँ उसका पीछा नहीं छोड़ती। अंततः वह अपराधियों और चोर-उच्चकों की बस्ती में रहना प्रारंभ कर दी है और मृत्यु पर्यंत नहीं होती है।  इस प्रकार मृणाल की यह कहानी उसके आजीवन संघर्ष की कहानी है। कथावाचक प्रमोद मृमाल का भतीजा है जो समाज की मान्यताओं में बंधा है और चाह कर भी अपनी बुआ की सहायता नहीं कर पाता। अंत में वह आत्मपश्चाताप से इतना भर जाता है कि अपने न्यायाधीश के पद से त्यागपत्र दे देता है

उपन्यास के संक्षिप्त कथा सार के उपरांत लेखक द्वारा उठाए गए प्रमुख समस्याओं को निम्नलिखित बिंदुओं द्वारा स्पष्ट किया जा रहा है

1. नारी जीवन की त्रासदी की मार्मिक कथाः

1940 के दशक में नारी की स्थिति को लेखक ने बड़ी मार्मिकता से उद्घाटित किया है।  उस समय बालिकाओं को शिक्षा नहीं दी जाती थी, पर्दा प्रथा थी  और स्त्री को आदर्श बनाना परिवार का लक्ष्य था।  मृणाल की भाभी भी उसे कड़े अनुशासन में रखकर आदर्श नारी बनाना चाहती थी।  मृणाल की स्वतंत्रता थी उसका विवाह अधेड़ उम्र के दोहाजु व्यक्ति से कर दिया जाता है।  पति द्वारा उसका त्यागा जाना,  कोयले वाले से प्रेम और बाद में धोखा तथा अंत में एक बदनाम बस्ती में जाकर बसना यह सब नारी को सामाजिक बंधनों में जकड़ने का परिणाम था।  भारतीय नारी की परवशता,  अनमेल विवाह की पीड़ा,  सामाजिक प्रताड़ना,  आर्थिक पराधीनता से उत्पन्न नारी जीवन की विवशताओं को लेखक ने बड़ी मार्मिक एवं यथार्थ अभिव्यक्ति दी है।

2. पवित्रता का प्रश्नः

यह उपन्यास भारतीय समाज की पवित्रता और पाप प-ण्य विषयक धारणा को प्रश्नचिह्नित करता है।  जो समाज शारीरिक पवित्रता को श्रेष्ठ समझता हो और मानसिक रूप से मैला हो, उस समाज में मृणाल जैसी स्वतंत्र मानस वाली नारी की दुर्दशा संभावनाीय है।  मृणाल मन की पवित्रता पर अधिक विश्वास रखती है और इसी पवित्रता के साथ आजीवन संघर्षरत रहती है।  बदनाम बस्ती में जाकर भी वह यह सिद्ध करती है कि बाहर से अपवित्र दिखने वाले लोग सभ्य कहलाए जाने वाले समाज से कहीं अधिक पवित्र और पुनीत होते है। मृणाल कहती है, “जो बाहर हो वही भीतर।  भीतर पशु हो तो इस जलवायु में आकर बाहर की मनुष्यता एक क्षण नहीं ठहरेगी। मनुष्य हो तो भीतर तक मनुष्यता ही होगी।  कलई वाला सदाचार यहां खुलकर उधड़ रहता है।  यहां खरा कंचन ही टिक सकता है।”

3. सामाजिक मान्यताएं एवं रूढ़िवादिताः

त्यागपत्र में समाज की मान्यताएं एवं रूढ़ीवादी परंपराएँ खोखली नजर आती है।  किस तरह समाज के नियम, मर्यादाएँ, परंपराएँ, रूढ़ियाँ, नैतिक बंधन आदि व्यक्ति की स्वतंत्रता में बाधा बनते हैं उन सभी परिस्थितियों का लेखक में बड़ी गंभीरता से वर्णन किया है। यह मान्यताएं एवं रूढ़िवादी मानसिकता विशेष रुप से नारी को लेकर ही अधिक कठोर हो जाती है।  एक नारी आजीवन स्वयं को साबित करने में सब कुछ झेलती रहती है परंतु दूसरों को कोई दोष नहीं देना चाहती।  मृणाल को जब उसके पति द्वारा त्यागा जाता है तो वह कहती है, “पति को मैंने नहीं छोड़ा।  उन्होंने मुझे छोड़ा है।  मैं स्त्री धर्म ही मानती हूं। उसका स्वतंत्र धर्म में नहीं मानती।” इन्हीं सामाजिक मान्यताओं और रूढ़िवादी मानसिकताओं के कारण मृमाल कठिन परिस्थितियों में भी अपने मायके आकर नहीं रह सकती क्योंकि  यह समाज की दृष्टि में सही नहीं होगा वह कहती है, “मैं घर नहीं आ सकती थी।  एक बार घर आकर मैं समझ गई थी कि वैसे मायके जाना ठीक नहीं है।  स्त्री जब तक ससुराल की है अभी तक मायके की है।  ससुराल से टूटी तब मायके से तो आप ही मैं टूट गई थी।”

4. व्यक्ति का आत्म संघर्षः

इस उपन्यास में लेखक ने मुख्यतः व्यक्ति के आत्म संघर्ष एवं जीने की इच्छा को अभिव्यक्ति प्रदान की है। मृणाल के जीवन की त्रासदी भी व्यक्ति और समाज की टकराहट और संघर्ष से उत्पन्न होती है। वह अपने मूल्यों,  विचारों मान्यताओं के प्रति ईमानदार रहते हुए कष्ट पूर्ण एवं कठिन जीवन मार्ग का अनुसरण करती है।  प्रमोद भी आजीवन मनोवैज्ञानिक द्वंद्व और संघर्ष से ग्रसित रहता है।  प्रमोद का यह द्वंद्व इन पंक्तियों में स्वतः ही परिलक्षित हो रहा है, “पूछता हूं मानव के जीवन की गति क्या अंधी है?…..मानव चलता जाता है और बूंद-बूंद दर्द इकट्ठा होकर उसके भीतर भरता जाता है।…..किसी को मार्ग सूझता नहीं और मानव अपने क्षुधा-तृष्णा, राग- द्वेष, मान-मोह में भटकता फिरता है।”

5. पारंपरिक नारी संबंधी दृष्टिकोण का खंडनः

मृणाल के माध्यम से लेखक ने परंपरागत नारी के मिथक को तोड़ा है। मृणाल समाज से विद्रोह नहीं करती परंतु आत्मपीड़न और आत्मदान द्वारा समाज की खोखली मान्यताओं का विरोध करती है।  वह विवाह संस्था का सम्मान करती है तो दूसरी ओर इस संस्था की कमजोरियों को भी उद्घाटित करती है।  मृणाल वास्तव में तत्कालीन समाज की नारियों से कहीं आगे की सोच रखती है। मृणाल के शब्दों में,    “मैं समाज को  तोड़ना-फोड़नानहीं चाहती। समाज टूटा तो फिर हम किस के भीतर बनेंगे? या किस के भीतर बिगड़ेंगे? इसलिए मैं इतना ही कर सकती हूं कि समाज से अलग होकर उसकी मंगलाकांक्षा में खुद ही टूटती रहूँ।”

6. मानवीय संबंधों का यथार्थ चित्रणः

प्रस्तुत उपन्यास में लेखक ने पारिवारिक एवं सामाजिक मानवीय संबंधों के यथार्थ को उद्घाटित किया है।  मृणाल बचपन से मृत्युपर्यंत इन संबंधों की मार को झेलती है।  प्रमोद से स्नेह मिलता है परंतु वह भी सामाजिक व्यवस्थाओं में बंधा होता है।  अधेड़ उम्र के पति के साथ वह पतिव्रता धर्म निभाती है परंतु वह उसका त्याग कर देता है। असहाय मृणाल का कोयले वाले को अपनाना और बाद में धोखा खाना भी मानवीय संबंधों की विद्रूपता को दर्शाता है।  समाज के सारे संबंध किस तरह  कठिन समय आने पर  साथ नहीं देते हैं, इस कारण लेखक ने बड़े ही सटीक लहजे में किया है।  मैं डाल के शब्दों में, “प्रमोद सच्ची सच्ची कहो तो मैं पराई हो गई हूं।  तुम सब लोगों के लिए मैं पराई हो गई हूँ।  तेरी मां ने मुझे धक्का देकर पराया बना दिया है।”

7. समाज की व्यवस्था पर प्रश्नचिह्नः

इस उपन्यास में संभ्रांत समाज की अव्यवस्थाओं को उद्घाटित किया गया है।  मृणाल आत्मनिर्भर होकर जीना चाहती है परंतु समाज उसे पग-पग पर प्रताड़ित करता है।  तथाकथित उच्च वर्गीय सभ्य समाज कठिन परिस्थितियों में उसका साथ नहीं देता और उसे चरित्रहीन कहकर ठुकराता है।  मृणाल का अंत में बदनाम बस्ती में चोर-उचक्कों के साथ रहना,  उनके बच्चों को पढ़ाना तथा निर्भयता से जीवन व्यतीत करना, तथाकथित सभ्य सुसंस्कृत समाज को प्रश्नचिह्नित करता है क्योंकि मृणाल उस बदनाम बस्ती को बेहतर समाज से कहीं अधिक अच्छा साबित करती है, “ यहां किसी को यह कहने का लोग नहीं है कि वह सच्चरित्र है।  यहां सच्चरित्रता के अर्थ में मानव का मूल्य नहीं माना जाता है।  दुर्जनता की मानो कीमत है। यहां छल असंभव है, जो कि छल शिष्ट समाज में जरूरी ही है।”

8. जीवन की सार्थकता का प्रश्नः

मृणाल और प्रमोद  दोनों ही जीवन की सार्थकता को अपने-अपने ढंग से कोसते नजर आते हैं। मृणाल संघर्षपूर्ण मार्ग को अपनाती है तथा अपने मूल्यों के साथ जीती और मरती है। वह अपनी दुरावस्था के लिए किसी को दोष नहीं देती।  प्रमोद बुआ की सहायता करना चाहता है, परंतु जीवन में मान, धन, पद भी चाहता है। अंततः वह पापों का प्रायश्चित करने के लिए नौकरी से त्यागपत्र देकर संन्यासी बन जाता है। इस तरह जीवन की सार्थकता दोनों के अलग-अलग मूल्यों को स्पष्ट करती है। एक उदाहरण देखिए, “ जो समाज में है, समाज की प्रतिष्ठा कायम रखने का जिम्मा भी उन पर है। उनका कर्तव्य है कि जो उच्छिष्ट हैं या उच्छिष्ट बनना पसंद करते हैं उन्हीं को जीवन के साथ नए प्रयोग करने की छूट हो सकती है। प्रमोद यह बात तो ठीक है कि सत्य को सदा नए प्रयोगों की अपेक्षा है, लेकिन उन प्रयोगों में उन्हीं को पड़ना चाहिए जिनकी जान की अधिक दर नहीं रह गई हैं।”

अतः कहा जा सकता है कि जैनेंद्र ने जीवन और समाज से जुड़े महत्त्वपूर्ण प्रश्नों को त्यागपत्र में यथार्थ अभिव्यक्ति प्रदान की है।  मृणाल नामक भाग्यहीना युवती के जीवन पर आधारित यह मार्मिक कथा अत्यंत प्रभावशाली बन सकी है। मृणाल की सूक्ष्म चारित्रिक प्रतिक्रियाओं, विवश इच्छाओं, दमित स्वप्नों तथा नुरुद्वेग विकारों की यह मनोवैज्ञानिक कथा अत्यंत मार्मिकता के साथ लेखक ने उभारा है। आत्मकथात्मक शैली के रूप में कही गई  यह रचना पाठक के मनोभावनाओं और संवेदनाओं को आंदोलित करने में समर्थ है।

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