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बी. ए./बी. कॉम प्रथम वर्ष अनिवार्य हिन्दी

अनुवाद के प्रमुख प्रकार

वर्तमान युग में अनुवाद एक स्वतंत्र विषय के रूप में अपनी विशेष पहचान बना चुका है। विश्व सभ्यता के विकास में अनुवाद की सराहनीय भूमिका रही है।यह भूमिका साहित्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र तक ही नहीं अपितु सामाजिक सांस्कृतिक और अन्य कई संदर्भों में भी सराहनीय रही है क्योंकि अनुवाद ही वह अकेला माध्यम है जिसकी सहायता से विभिन्न सभ्यताओं और संस्कृतियों, धर्म एवं सामाजिक स्तरों से देश-विदेश में संवाद स्थापित हो जाता है।आज के इस वैज्ञानिक युग में विज्ञान के क्षेत्र में अनेक अनेक भाषाओं में जो निरंतर चिंतन, अध्ययन, अनुसंधान और लेखन कार्य हो रहा है उसे अन्य भाषा-भाषियों तक पहुंचाने के लिए भिन्न-भिन्न भाषाओं में उसके अनुवाद की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार कहानी, उपन्यास, निबंध, नाटक आदि सृजनात्मक साहित्य की देश अथवा समाज विशेष की सांस्कृतिक संपदा का बोध हमें तब तक नहीं हो पाता जब तक कि उन सभी श्रेष्ठ कृतियों का अपनी भाषा में अनुवाद उपलब्ध ना हो। इस्तकार अनुवाद एक महत्वपूर्ण विषय है।

अनुवाद का अर्थ व परिभाषा

अनुवाद का अर्थ है एक भाषा के कथ्य को उसी रूप में दूसरी भाषा में ले जाने की प्रक्रिया। अंग्रेजी में इसके लिए ट्रांसलेशन(Translation) शब्द का प्रयोग किया जाता है अनुवाद अर्थात ‘अनु’+’वाद’।अनु का अर्थ है पीछे या बाद में और वाद का अर्थ है कहना अर्थात यह भाषा की बात को दूसरी भाषा में कहना ही अनुवाद कहलाता है।अंग्रेजी का ट्रांसलेशन शब्द ‘ट्रांस’ (Trans) और ‘लेशन’ (Lation) दो शब्दों से बना है का ‘Trans’ का अर्थ है ‘पार’ या ‘दूसरी ओर’ और ‘Lation’ का अर्थ है ‘ले जाने की क्रिया’ इस प्रकार का Translation का अर्थ हुआ एक भाषा की सामग्री को दूसरी भाषा में ले जाने की क्रिया।

डॉ. पूरनचंदन के अनुसार,”एक भाषा का दूसरी भाषा में प्रस्तुतीकरण की प्रणाली अनुवाद कहलाती है।”

भोलानाथ तिवारी के अनुसार,“एक भाषा में व्यक्त विचारों को यथासंभव समान और सहज अभिव्यक्ति द्वारा दूसरी भाषा में व्यक्त करने का प्रयास अनुवाद है।”

डॉ. जॉनसन के अनुसार,“translation is to change into another language retaining the sense”अर्थात मूल भाव की रक्षा करते हुए एक भाषा के कथ्य को दूसरी भाषा में बदलना अनुवाद है।

उपरोक्त परिभाषा के आधार पर कहा जा सकता है कि अनुवाद एक भाषा की सामग्री को दूसरी भाषा में उसी रूप में प्रस्तुत करने का नाम है। यह प्रस्तुतीकरण शाब्दिक न होकर भावात्मक होता है, समान ना होकर समतुल्य होता है।आदर्श अनुवाद वही है जो मूल रचना की शैली और भाव को अपनाकर किया जाए तथा अनुवाद से पाठक को ही आनंद आए जो मूल रचना से मिला था।

अनुवाद के प्रकार

अनुवाद करने की अपनी-अपनी विधि है। विषय के अनुसार अनुवाद भिन्न-भिन्न क्षेत्र में अलग-अलग तरीकों से किया जाता है। अनुवाद की प्रमुख प्रकार इस प्रकार है-

1. पर्याय के आधार पर अनुवादः

अनुवाद में पर्याय के आधार पर अनुवाद की आवश्यकता रहती है। मूल भाषा के शब्दों को समझ कर लक्ष्य भाषा में उसके समतुल्य शब्द खोजना और प्रयोग करना आवश्यक होता है। हिंदी में अनेक पर्यायवाची शब्द हैं जैसे कमल, अरविंद, वारिज, ‘नीरज’, ‘अंबू’ आदि। अंग्रेजी में इनके लिए ‘Lotus’ शब्द प्रचलित है। हिंदी में इन शब्दों का प्रयोग अलग अलग संदर्भ में होता है। अतः सही पर्यायवाची शब्द का चयन करना तथा उसे संदर्भ के अनुकूल बनाना ही आदर्श अनुवाद कहलाता है।

2. विषय वस्तु पर आधारित अनुवादः

विषय वस्तु के आधार पर अनुवाद के निम्नलिखित भेद हैं-

  • तकनीकी साहित्य का अनुवाद जिसमें तकनीकी विषयों की शब्दावली का अनुवाद विशेषज्ञों के लिए होता है

  • सरकारी साहित्य का अनुवाद जिसके अंतर्गत सरकारी अभिलेखों का अनुवाद किया जाता है।

  • विधि साहित्य का अनुवाद जिसमें विधि से संबंधित विषयों का अनुवाद वैधानिक शब्दावली के अनुसार किया जाता है।

  • सृजनात्मक साहित्य का अनुवाद जिसमें कविता नाटक उपन्यास यात्रा कहानी संस्मरण आदि का अनुवाद शामिल है।

  • दर्शन शास्त्रों का अनुवाद जिसके अंतर्गत तर्कपूर्ण शब्दावली के अनुरूप दर्शन शास्त्र से संबंधित विषयों का अनुवाद किया जाता है।

  • इतिहास के अनुवाद के अंतर्गत ऐतिहासिक ग्रंथों का अनुवाद किया जाता है।

  • राजनीतिक विषय के अंतर्गत राजनीतिक विषयों, मामलों, राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय संधियों का अनुवाद शामिल है।

  • संचार क्षेत्र में अनुवाद के अंतर्गत समाचार एजेंसी हो रेडियो दूरदर्शन टेलीविजन आदि से संबंधित सामग्री का अनुवाद किया जाता है।

3. शब्दानुवादः

जब मूल भाषा की सामग्री के प्रत्येक शब्द का अनुवाद उसी रूप में लक्ष्य भाषा में किया जाता है उसे शब्द अनुवाद कहते हैं। यहां अनुवादक का लक्ष्य भाषा के विचारों को रूपांतरित करने से अधिक शब्दों को यथावत अनूदित करने से होता है। शब्दनुवाद मुख्यतः दो प्रकार का होता है-

  • निम्न कोटि का अनुवाद
  • उच्च कोटि का अनुवाद
    • निम्न कोटि के अनुवाद के अंतर्गत एक शब्द को वाक्य संरचना का ध्यान रखे बिना वैसे ही रूपांतरित कर दिया जाता है, जो कई बार हास्यप्रद भी हो जाता है। उदाहरण के लिए ‘दिल बाग बाग होना’ का अनुवाद कर दिया जाता है, ‘I am feeling garden and garden’ जबकि इसका सही अनुवाद है ‘I am feeling elated’. इसी तरह Flying Visit का अर्थ ‘हवाई यात्रा’ नहीं होता जबकि इसका अर्थ है ‘अचानक निरीक्षण करना।’ एक अन्य उदाहरण में जैसे ‘Cheque has been passed’ का अर्थ ‘चेक उत्तीर्ण हो गया’ नहीं होगा जबकि ‘चेक पास हो गया है’, होगा। इस प्रकार प्रत्येक शब्द के अनुवाद में मूल भाव कई बार खो जाता है।

    • उच्च कोटि के शब्दानुवाद के अंतर्गत विज्ञान, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, धर्म शास्त्र तथा विज्ञान के क्षेत्र से जुड़े अनेक विषय शामिल है। इसे कोशगत या मशीनी अनुवाद भी कहा जाता है इस अनुवाद में भाव पर कम और अभिधात्मक अर्थ पर अधिक ध्यान दिया जाता है।

    4. भावानुवादः

    भावानुवाद मूल रचना के भाव को पूर्णता अनुदित रचना में अभिव्यक्त करता है। जैसे ‘Charge’ शब्द का अर्थ है, ‘भार डालना’, ‘कार्यभार सौंपना’ तथा ‘बैटरी चार्ज’ आदि। अब संदर्भ के अनुरूप मूल भाषा का भाव समझते हुए ही ‘Charge’ शब्द का अनुवाद अर्थ प्रयोग किया जाएगा। यहां शब्दार्थ प्रयुक्त नहीं होता है जैसे- 

    ‘Black Board’ का अर्थ ‘काला फट्टा’ नहीं होगा बल्कि ‘श्यामपट्ट होगा’, “House Breaker’ का अर्थ ‘मकान तोड़ने’ वाला न होकर ‘परिवार तोड़ने वाला’ होगा, ‘Oilseeds’ का अर्थ ‘तेल के बीज न होकर’, ‘तिलहन’ होगा और ‘White Ant’ का अर्थ ‘सफेद चींटी’ न होकर ‘दीमक’ होगा। भावानुवाद में अनुवादक को कुछ घटनाओं में बढ़ाने या जोड़ने की स्वतंत्रता होती है। विशेष रूप से साहित्यिक रचनाओं के अनुवाद में इसका प्रयोग होता है। मुहावरों तथा लोकोक्तियों के अनुवाद में भी बावानुवाद ही प्रयुक्त होता है। जैसे- ‘A cat has nine lives’, का भावानुवाद है विपरित परिस्थितियों में जीवित रहना। ‘It was raining cats and dogs’, का भावानुवाद है, ‘मूसलाधार बारिश हो रही थी’। 

    ‘A drop in the Ocean’, का भावानुवाद है, ‘ऊँट के मुँह में जीरा’

    ‘It is no use crying over spilt milk’ का भावानुवाद है अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।.

    5. सारानुवादः

    लंबी रचनाओं. लंबे भाषणों. राजनीतिक वार्ताओं, काव्य रचनाओं का उनके कथ्य तथा मूल तत्वों की पूर्णता रक्षा करते हुए संक्षेप में प्रस्तुत करने की प्रक्रिया सारानुवाद कहलाती है। इसमें मूल लेख की मुख्य बातों को सार रूप में लिखकर अनूदित किया जाता है। यह स्वतंत्र अनुवाद है। इसमें संक्षिप्तता, सरलता और स्पष्टता रहती है। लोकसभा और राज्यसभा में चलने वाले विवादों का सारानुवाद ही किया जाता है।

    6. छायानुवादः

    छायानुवाद में अनुवादक मूल रचना को पढ़कर इसका जो प्रभाव उसके मन और मस्तिष्क पर पड़ता है, उसी के आधार पर अनुवाद करता है। फिट्सगजेराल्ड ने उमर खय्याम की रुबाईयों का अनुवाद ऐसे ही किया है। एक-एक रुबाई का अनुवाद कई प्रकार से किया गया है। इसमें मूल कृति की छाया मात्र ही दिखाई पड़ती है।

    7. व्याख्यानुवादः

    व्याख्यानुवाद में मूल कृति की व्याख्या भी अनुवाद के साथ साथ की जाती है। संस्कृत-हिंदी में टीका साहित्य इसी प्रकार का अनुवाद है। यहां अनुवादक व्याख्याकार भी होता है। वह मूल कृति की बातें स्पष्ट करने के लिए अपनी ओर से उद्धरण, प्रमाण या उदाहरण भी जोड़ सकता है।

    8. आशु अनुवादः

    आशु अनुवाद को तुरंत अनुवाद भी कहा जाता है जो आशु अनुवाद करता है उसे दुभाषिया कहते हैं। यह दुभाषिया आम जनता की भाषा में मुख्य बात का अनुवाद करता चलता है। दुभाषिए के पास सोचने समझने के लिए कुछ ही क्षण होते हैं। लोकसभा, राज्यसभा, चुनाव रैलियों, राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर आशु अनुवाद को की मांग रहती है। पर्यटन केंद्रों पर भी दुभाषिए अथवा आशु अनुवाद की आवश्यकता होती है।

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